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किसान उपज के अलावा फसलों की गुणवत्ता पर भी ध्यान दें - आनंद मिश्रा

आनंद मिश्रा की सफलता की कहानी

अगर किसी काम को पूरी लगन और निष्ठा के साथ की जाए तो सफलता मिल ही जाती है. उत्तर प्रदेश के रायबरेली में रहने वाले आनंद मिश्रा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी सैलरी वाली नौकरी होने के बावजूद उन्होंने खेती की ओर रुख किया. आनंद मिश्रा ने लाखों रुपए की नौकरी छोड़कर अपने गांव में नींबू की बागवानी शुरू की. शुरुआत में समस्याएं भी हुई लेकिन उन्होंने मेहनत करना नहीं छोड़ा. अभीतक कई बार सफल बागवानी के लिए लेमन मैन आनंद मिश्रा सम्मानित भी हो चुके हैं. ऐसे में आइये जानते हैं आनंद मिश्रा की सफलता की कहानी-

आप अपने बारे में हमें बताइए?

मेरा नाम आनंद मिश्रा है और मैं उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के डीह विकास खंड के गांव कचनावा का रहने वाला  हूं. मैंने व्यापार प्रबंधन की शिक्षा प्राप्त कर मल्टीनेशनल कंपनी में 13 साल नौकरी करने के बाद नौकरी करना छोड़ दिया, क्योंकि मेरा बचपन से ही खेती किसानी की ओर रुझान था और नौकरी के वजह से मैं अपने इस शौक को पूरा नहीं कर पा रहा था. नौकरी छोड़ने के बाद मैंने नींबू की बागवानी करने का काम शुरू किया है. और लोगों को इसके लिए मैं ट्रेनिंग भी देता हूं. 

नौकरी छोड़ने के बाद बागवानी करने का ख्याल आपके दिमाग में कैसे आया?

नौकरी छोड़कर जब मैं गांव आया तो खेती किसानी में मेरी रुचि और बढ़ गई, लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कौन सी फसल की खेती करूँ. इसके लिए मैंने कई प्रांतों व जिलों में भ्रमण किया और खेती-किसानी की पूरी जानकारी प्राप्त की. जिसके बाद मैंने थाई प्रजाति के नींबू की बागवानी करने के लिए सोचा. इसके लिए मैंने नीबू की उपयोगिता और उत्पादन की भी पूरी जानकारी प्राप्त किया. इसके बाद मैंने वाराणसी से पौधा खरीदा और गांव में साढ़े तीन बीघा भूमि पर कुल 900 पौधे लगाया. मौजूदा वक्त में मुझे नींबू के एक पौध से सालाना 20 से 25 किलो नींबू मिलता है.

आपने बागवानी के लिए नींबू को ही क्यों चुना?

नींबू एक ऐसा फल है जिसकी बाज़ारों में मांग साल के 12 महीने होती है. इस फल को सीधा बाजार में बेचा जा सकता है. इसका प्रसंस्करण करके अचार बनाया जा सकता है. जिस भी रूप में हम लोग चाहते हैं, उस रूप में इसको बेच सकते हैं. इस वजह से मैंने नींबू की बागवानी को चुना.

आप नींबू का मंडीकरण कैसे करते हैं?

शुरुआत में मुझे थोड़ी दिक्कत हुई थी, लेकिन अब व्यापारी खुद ही गांव आकर मेरे नींबू को खरीद कर ले जाते हैं.

आप नींबू की बागवानी के अलावा और क्या करते हैं?

नींबू की बागवानी के अलावा मैं सोशल मीडिया के जरिए कई राज्यों के किसान के साथ जुड़ा हुआ हूं जो नींबू की बागवानी के बारे में जानकारी मुझसे समय – समय पर लेते रहते हैं. इसके अलावा मैंने नींबू के पौधों की नर्सरी भी खोल रखी है.

कृषि जागरण के पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

मैं यही कहना चाहूँगा कि जो भी किसान बागवानी कर रहे हैं अगर वे धरती की व्यवस्था को सुधार लेंगे तो उनकी अर्थव्यवस्था खुद ही सुधार जाएगी. खेती व बागवानी करने के दौरान वो फसलों का एक डाटा तैयार जरूर करें, जिसमें फसल किस दिन बोई गई, कितनी बार सिंचाई की, कब रोग आया, कब फसल की कटाई हुई आदि. इस डाटा को रखने से फसल को रोगों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी.

इसके अलावा किसान फसलों की गुणवत्ता पर भी ध्यान दें, क्योंकि फसल सब उगाते हैं पर गुणवत्ता की वजह से किसी का उत्पाद 40 रुपए में बिकता है तो किसी का 20 रुपए इसलिए कोशिश करें कि ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़े और ग्रुप बनाएं और अपनी फसल को सही कीमत पर बेचें.


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