1. खेती-बाड़ी

मत्स्य पालन के साथ करें सिंघाड़ा के खेती, होगा दोहरा लाभ

अनवर हुसैन
अनवर हुसैन
Shighada

इस बार समय से मानसून के दस्त देने से फसल अच्छी होने की संभावना बढ़ी है. खरीब फसलों के साथ बरसात के मौसम में परंपरगत खेती के अतिरिक्त लाभ पाने के लिए सिंघाड़ा की बुवाई भी शुरू कर सकते हैं. बरसात के मौसम में घर के आस-पास तालाब व नदी-लाने सभी पानी से लबालब भर जाएंगे. इन जलाशयों में सिंघाड़ा की खेती शुरू कर सकते हैं. मत्स्य पालन करने वाले तालाब में भी सिंघाड़ा के बेल लगाना ज्यादा फायदेमंद होगा और किसानों को इससे दोगुणा लाभ होगा. सिंघाड़ा की खेती चूंकि मीठे पानी वाले तालाबों में होता है, इसलिए इसे पानी फल के नाम से भी जाना जाता है. पोषक तत्वों से भरपूर सिंघाड़ा की बाजारों में हमेशा मांग बनी रहती है. इसलिए कि यह कई औषधीय गुणों से भरपूर है और व्यवासियक तौर पर इसका आटा भी तैया किया जा रहा है. सिंघाड़ा को सुखा कर जो आटा तैयार किया जाता है उसका इस्तेमाल कई तरह के व्यंजन व आयुर्वेदिक दवा बनाने में किया जाता है.

खेती की विधिः वैसे तो बरसात के मौसम में ही सिंघाड़े की खेती शुरू होती है. किसान अपने आस-पास के नहरों, पोखरों और तालाबों में सिंघाड़ा के बेल डाल सकते हैं. मछली पालन केंद्र में व्यापक पैमाने पर सिंघाड़ा की खेती शुरू की जा सकती है. पश्चिम बंगाल में मछली पालन वाले तालाबों में सिंघाड़ा की खेती होती रही है. कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया, पूर्व व पश्चिम मेदिनीपुर आदि जिलों में बरसात शुरू होने के साथ ही मछली पालन केंद्रों में सिंघाड़ा की बुवाई शुरू हो गई है. राज्य में किसानों समेत मछुआरे व मछली व्यवसायी भी सिंघाड़ा की खेती में रुचि ले रहे हैं. बरसात में सिंघाड़ा की खेती शुरू होने से पहले अप्रैल मई में ही जलाशयों में सिंघाड़ा की नर्सरी तैयार कर ली जाती है.

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बरसात में अपने आस-पास के तालाब व जलाशयों में सिंघाड़ा की खेती करने के इच्छुक किसान नर्सरी पाने के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र जिला कृषि के दफ्तर से भी संपर्क कर सकते हैं. व्यवासियक तौर पर सिंघाड़ा की खेती करने वाले किसान मीठे पानी के तालाब या किचड़युक्त जलाशय में बीज डाल देते हैं. दो माह के अंदर सिंघाड़ा के बेल तैयार हो जाता है. बरसात में जुन- जलाई में सिंघाड़ा का बेल निकाल लिया जाता है और उसे खेती के लिए चुने गए तालाब व अन्य जलाशयों में डाल दिया जाता है. बेल डालने के दो माह के अंदर सिंघाड़ा तैयार हो जाता है. सितंबर से लेकर नवंबर दिसंबर तक सिंघाड़ा की बिक्री होती है. बिहार, झारखंड, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और मध्यम प्रदेश आदि राज्यों में सिंघाड़ा की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर इसकी नर्सरी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है.पश्चिम बंगाल में मछली पालन केंद्रों का भरमार है. नदी नालों की भूमि होने के कारण पश्चिम बंगाल में उच्च गुणवत्ता वाले सिंघाड़ा की खेती व्यापक पैमाने पर होती है. यहां के किसान एक ही तालाब में मत्स्य पालन के साथ सिंघाड़ा की भी खेती करते हैं. अन्य राज्यों के किसान भी मछली पालन वाले तालाब में सिंघाड़ा की खेती शुरू कर दोहरा लाभ कमा सकते हैं.

मुनाफाः परंपरागत खेती करने वाले ग्रामीण किसान सिंघाड़े की खेती की कर अच्छी खासी आय कर सकते हैं. इसमें कम लागत आती है. मछली पालन के साथ सिंघाड़ा की खेती से दोहरा लाभ होता है. किसानों के पास सिंघाड़ा की खेती करने के लिए अपना तालाब या जलाशय नहीं है तो वे ग्राम पंचायत से इसके लिए संपर्क कर सकते हैं. ग्राम सभा सिंघाड़ा के खेती के लिए तालाब और जलाशय किसानों को पट्टा पर उपलब्ध कराती है. इसके लिए मामुली शुल्क देकर कोई भी किसान ग्रामसभा की मदद से तालाब पट्टा पर ले सकता है और सिंघाड़ा की खेती शुरू कर सकता है. प्रति हेक्टेयर भूमि से 25-30 टन सिंघाड़ा का फल तोड़ना संभव है.

English Summary: Water harvesting should be done with fisheries, there will be double benefit

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