1. खेती-बाड़ी

Wheat farming: गेहूं की अगेती और पछेती बुवाई से जुड़ी हर जरूरी जानकारी

KJ Staff
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Wheat

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गेहूं रबी मौसम की मुख्य फसल है जिसका खाद्य पदार्थों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. भोजन के लिए उगाई जाने वाली धान्य फसलों मे गेहूं का उत्पादन विश्व में तीसरे स्थान पर होता है. गेहूं से आटा, रोटी, ब्रेड, दलिया, पास्ता, सेवईं आदि बनाए जाते हैं. इतना ही नहीं गेहूं के तने को भूसे के रूप में पशुओं को खिलाया जाता है. इसके दाने में 8-15 प्रतिशत प्रोटीन, 65-70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 1.5 प्रतिशत वसा, 2 प्रतिशत खनिज होती है.

सिंचित क्षेत्र में गेहूं की बुवाई का समय (Sowing time for wheat crop in irrigated zone)

सिंचित क्षेत्र में गेहूं की बुआई नवंबर के प्रथम पखवाड़े में की जाती है. इसकी बुवाई के लिए 15 से 25 नवंबर के बीच का समय सबसे उचित है. गेहूं के बीज को 2 से 3 सेमी. की गहराई में बोना चाहिए. पक्तियों के बीच की दूरी 20 सेमी. रखना सही रहता है. बोने के लिए बीज की मात्रा औसतन 100 किलो प्रति हेक्टेयर रखनी चाहिए.

सिंचित क्षेत्र में पछेती गेहूं बोने का समय और बीज दर(Sowing time for late crop of wheat in irrigated zone)

गेहूं की पछेती बुआई के लिए दिसंबर का प्रथम पखवाड़ा उत्तम हैं. पछेती बुवाई में औसतन 125 किलो बीज प्रति हेक्टेयर के दर से बोएं. कतार से कतार के बीच की दूरी 18 सेमी. रखें.

सिंचित और समय से बोई जाने वाले गेहूं की किस्में कौनसी हैं ?(What are the irrigated and timely sown varieties of wheat ?)

अधिक उत्पादन देने वाली प्रजातियों में ज्यादातर मैक्सिकन गेहूं की किस्में हैं. जो सिंचित अवस्था के लिए समय से और देर से बोने के लिये उत्तम है इन किस्मों की विस्तृत जानकारी निम्न प्रकार हैं:

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गेहूं की पछेती बुआई कब कर सकते हैं?(What is suitable time to sow the late wheat ?)

पछेती बुआई का तात्पर्य सिंचित गेहूं की उस अवस्था से है जहां नवंबर महीने में गेहूं की बुआई न कर पाने पर हम उचित जातियों का चुनाव कर दिसंबर महीने में बुआई करते हैं. दिसंबर में गेहूं की खेती के लिए शीघ्र पकने वाली और अच्छा उत्पादन देने वाली गेहूं की उन्नत किस्मों की जरूरत होती है. जिसकी जानकारी और विशेषताएं निम्न प्रकार हैं:

wheat sowing

बीजों का उपचारण कितना जरूरी ?(How important is the treatment of seeds?)

अगर अच्छी फसल चाहिए तो बुवाई से पहले बीजों का उपचार करना बेहद जरूरी होता है. और उपचारित करने के लिये कार्बोक्सिन 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी. एवं कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू पी. 2.5-3.0 ग्राम प्रति किलो बीज के लिए पर्याप्त होती है. साथ ही टेबूकोनोजाल 1 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करने पर कण्डवा रोग से बचाव होता है. जैव उर्वरकों मे पीएसबी और ऐजेटोबेक्टर कल्चर 5 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करने पर फास्फोरस की उपलब्धता के साथ-साथ नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है.

गेहूं की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक

गेहूं की बुआई के पहले खाद को 10 सेमी. की गहराई पर डालना चाहिये या बुआई के समय डबल पोर फड़क द्वारा बीज को 5-6 सेमी. नीचे डाल देना चाहिए. स्फूट और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय दें. नत्रजन की आधी मात्रा गेहूं बोने के समय एवं बची हुई आधी मात्रा को दो हिस्सों में बांटकर पहली और दूसरी सिंचाई के साथ यूरिया डालें. अगर सिंचाई की व्यवस्था कम हो तो नाईट्रोजन की शेष आधी मात्रा पहली सिंचाई के साथ देना उचित रहता है. अगर खेत में जस्ते की कमी हो तो इसके लिये जिंक सल्फेट की 25 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 2 से 3 साल के अन्तर में प्रयोग करें.

सिंचाई एवं जल प्रबंधन

सिंचाई का मुख्य उद्देश्य कम पानी से कम समय में ठीक-ठाक मात्रा में पानी का उपयोग करना हैं. सामान्यतः गेहूं की फसल को एक सिंचाई में 6-7 सेमी पानी की आवश्यकता होती हैं. 

खरपतवार प्रबंधन 

गेहूं की फसल में भरपूर उपज प्राप्त करने के लिए समय-समय पर बुआई करना चाहिए. इसकी बुवाई के लिए उन्नत जातियों का चयन जरूरी है. संतुलित खाद की मात्रा, उचित सिंचाई व्यवस्था करना और अन्य कृषि कार्य करना आवश्यक होते हैं. खरपतवार फसल के लिए आने वाले  प्रकाश, नमी और पोषक तत्वों को रोकते हैं जिससे फसल कमजोर रह जाति है और उत्पादन कम होता है.

खरपतवार नियंत्रण के तरीकें

1.हाथ से खरपतवार को निकालना के लिए हाथों या खुरपी का इस्तेमाल किया जा सकता है.

2.कृषि यंत्रों से खरपतवार का नियंत्रण पंक्ति पद्धति में बाये गये खेतों में ही कर सकते हैं. इसके लिये तादुत्तीह गुरमा या हैंड वीडर गेहूं में पहली सिंचाई के पहले या बाद में किसानों द्वारा आसानी से चलाकर खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता हैं.

यांत्रिक विधि

यह पद्धति सबसे प्रभावी पद्धति हैं. मृदा में बुआई के तुरंत बाद या बुआई के 30-35 दिनों के अंदर खरपतवार नाशी सकरी पत्ती वाले खरपतवारों को दवा के प्रयोग से समाप्त किया जा सकता है.

1.गुल्ली डंडा (फैलेरिस माइनर) को नियंत्रित करने के लिए आइसोप्रोट्यूरान का प्रयोग 0.75 किलोग्राम की दर से बुआई के 30-35 दिन के भीतर करें.

2.पैंडीमैथीलीन एक प्रीइमरजेन्स (स्टाम्प) का प्रयोग 1 किलोग्राम / हे0 की दर से बोआई के 24 घंटे के भीतर करें.

गेहूं के रोग और उनके रोकथाम

गेहूं का अल्टरनेरिया झुलसा रोग

इस रोग का लक्षण पत्तियों पर दिखाई देता है, जिससे सभी पत्तियां सूखने लगती हैं. प्रायः यह रोग पुरानी पत्तियों से होकर नई पत्तियों तक पहुंचता है.

इसकी रोकथाम के लिए मैकोजब या डायथेन एम-45 या इन्डोफिल एम-45 नामक दवा की 2 कि.ग्रा. मात्रा 800-1000 ली. पानी में अथवा प्रोपीकोनाजोल टिल्ट 0.25 प्रतिशत क्रियाशील तत्व की 500 मिली. मात्रा का 800-1000 लीटर पानी के साथ प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें.

गेहूं का कंडुवा रोग

इस रोग से बालों में दाने की जगह एक प्रकार का काला चूर्ण भर जाता है. यह रोग दाने के अन्दर रहने वाले कवक के द्वारा होता हैं. इस रोग से बचने के लिए बीज को बोने के पहले उपचारित करना चाहिए. बीज को बीटावेक्स या बाविस्टीन नामक दवाई की 2.5 ग्राम मात्रा को एक किलो ग्राम बीज की दर से उपयोग में ला सकते हैं. इसके अलावा बीज को मई-जून के महीने में जब तेज धूप हो, सुबह 4 घंटे तक पानी में भिगोने के बाद धूप में अच्छी तरह सुखा लें. ऐसा करने से बीज के अंदर मौजूद कवक नष्ट हो जाता है.

भ्रुण पर काली चित्ती रोग 

यह फफूंद द्वारा फैलने वाला रोग है, जिसकी वजह से गेहूं के दानों के भ्रुण तल में भूरे या काली चित्ती दिखाई देती है, जो बीज की अंकुरण क्षमता को घटाता हैं इससे खेत में पौधों की संख्या में कमी आती है. और उपज कम मिलती है.

गेहूं में कीट प्रबंधन

गेहूं की बुवाई बीजोपचार के बाद बोनी चाहिए, जिन क्षेत्रों में दीमक, जड़माहों, वायरवर्म, कटुआ इल्ली, झींगुर और सफेद ग्रव का प्रकोप होता है वहां बीजों को क्लानपायरीफास 20 ई.सी. 0.5 ग्राम या एन्डोसल्फान 35 ई.सी. 2.5 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर बुवाई करें या लिन्डेन 1.3 प्रतिशत पाउडर 20-25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय भुरकाव करें. देरी से की गई बुआई की फसल में (दिसम्बर-जनवरी) जड़माहो का प्रकोप अधिक रहता है.

गेहूं की कटाई

गेहूं की कटाई बीज के परिपक्व होने पर ही करना चाहिए, फसल की कटाई के समय बीज में नमी की मात्रा 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए.

बीज को सुखाना

बीज को भण्डारण के समय कीटों से बचाने के लिए दानों को 10-12 प्रतिशत तक आर्द्रता प्रतिशत तक सुखाएं. 

भंडारण

गेहूं के सूखे हुए बीज को जूट वाली बोरियों में भण्डारण करना उचित होगा. इन बोरों को आर्द्रता रहित, साफ-सुथरे गोदामों में भंडारित करना चाहिए. गोदामों में कीड़ों, चूहों का प्रकोप न हो इसके लिए कीटनाशक, फ्यूमीगेशन और चूहों के मारने के लिए जिंक फास्फाइड का इस्तेमाल करें.

लेखक

सुमन्त प्रताप सिंह और श्रद्वा सिंह 1

प्रबल प्रताप सिंह 2

कामिनी सिंह 3

1.आचार्य नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या (उ0प्र0), 224229

2.बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (उ0प्र0),

3 भाकृअनुप - भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ

English Summary: varieties of wheat and sowing time

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