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टिशू कल्चर खेती तकनीक: किसानों के लिए मुनाफ़े का सौदा, जानिये कैसे

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टिशू कल्चर के बारे में तो कई लोगों ने सुना होगा लेकिन दरअसल यह क्या है, इसके बारे में शायद हर एक किसान या बागवान नहीं जानता होगा. आज हम आपको इसी टिशू तकनीक के बारे में बताने जा रहे हैं कि यह क्या है और किस तरह से आप इसके ज़रिये अच्छा मुनाफ़ा कमा सकते हैं. आपको बता दें कि यह तकनीक अपनाकर आप अपने उत्पादन को बढ़ा सकते हैं और साथ ही अपने उत्पाद की गुणवत्ता में भी सुधार लाकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

टिशू कल्चर तकनीक से खेती के ये हैं फ़ायदे

  • किसानों को मिलते हैं ऐसे छोटे पौधे जो किसी भी तरह के कीट और रोग से मुक्त होते हैं.

  • पौधों में किसानों को एक के बाद एक, दो अंकुरण मिल सकते हैं और इससे खेती की लागत में भी कमी आती है.

  • सभी पौधों में एक ही तरह का विकास होता है. इसका मतलब यह है कि सभी पौधे एक समान होते हैं और यही वजह है कि उत्पादन में भी अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिलती है.

  • इतना ही नहीं, कम समय में फसल भी तैयार हो जाती है, लगभग 9 से 10 महीने के बीच.

  • साल भर छोटे विकसित पौधे उपलब्ध होने की वजह से रोपाई भी साल भर की जा सकती है.

  • किसान कम समय में ही इस तकनीक से मिलने वाली नई किस्मों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

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टिशू कल्चर तकनीक की क्या है प्रक्रिया?

अब हम आपको यह बताने जा रहे हैं कि आख़िर इस टिशू कल्चर में क्या होता है, इसकी प्रक्रिया क्या है. पौधे के ऊतकों (Tissue) का एक छोटा टुकड़ा उसके बढ़ते हुए ऊपरी हिस्से से लिया जाता है. इस टिशू के टुकड़े को एक जैली (Jelly) में रखा जाता है जिसमें पोषक तत्व और प्लांट हार्मोन होते हैं. आपको बता दें कि ये हार्मोन पौधे के ऊतकों में कोशिकाओं (Cells) को तेजी से विभाजित करते हैं और इनसे कई कोशिकाओं का निर्माण होता है. इन सभी कोशिकाओं को एक साथ एक ही जगह पर इकट्ठा किया जाता है जिसे कैलस (Callus) भी कहा जाता है.

कैलस को भी एक अलग जगह जैली में स्थानांतरित किया जाता है। इससे जैली में उपयुक्त प्लांट हार्मोन कैलस को पौधे की जड़ों में विकसित करने के लिए उत्तेजित करते हैं. कैलस में जब जड़ें विकसित हो जाएँ तो उसे एक और जैली में स्थानांतरित किया जाता है जहां कई हार्मोन होते हैं. आपको बता दें कि इन्हीं हार्मोन की वजह से ही पौधों के तने को विकास मिलता है. कैलस को जड़ और तने के साथ ही एक छोटे पौधे के रूप में अलग कर दिया जाता है. बाद में इस तरह के बाकी पौधों को भी मिटटी में प्रत्यारोपित किया जाता है.

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ठीक ऐसे ही, कुछ मूल पौधों की मदद से टिशू कल्चर (Tissue Culture) की यह तकनीक अपनाते हुए कई छोटे-छोटे पौधे तैयार किये जा सकते हैं.

किन पौधों के लिए किया जा सकता है टिशू कल्चर तकनीक का इस्तेमाल?

अगर बात यह करें कि टिशू कल्चर तकनीक (Tissue Culture Technique) का उपयोग बागवान किसकी बागवानी में कर सकते हैं, तो आपको इसकी भी जानकारी दे रहें हैं. बागवान टिशू कल्चर तकनीक का उपयोग ऑर्किड (orchid farming), डहेलिया (dahliya), कार्नेशन (carnation), गुलदाउदी (Chrysanthemum) जैसे सजावटी पौधों के उत्पादन के लिए किया जा सकता है. केले की खेती (banana farming) में भी टिशू कल्चर तकनीक काफी मुनाफे का सौदा है. 



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