Farm Activities

धान के पुआल को जलाने के बजाए उससे गुणवत्ता वाली खाद बनाएं

भारत में उर्वरक खपत और खाद्यान्न उत्पादन के बीच एक गहरा संबंध है. वर्ष 1950-51 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 50825 टन था, जो वर्ष 2014-15 में 257.07 मिलियन टन हो गया. भारत को 2025 तक वर्तमान स्तर से लगभग 50 प्रतिषत अतिरिक्त अनाज का उत्पादन करना पड़ेगा ताकि भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को खाद्यान्न आपूर्ति में आत्मनिर्भर बनाया जा सके. खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ फसलों के द्वारा मृदा से लगातार पोषक तत्वों के दोहन से पोषक तत्वों की मात्रा 3638 मिलियन टन तक पहुंच गई, जिससे मृदा में 8-10 मिलियन टन पोषक तत्वों का अंतर पैदा हो गया जिसको कि धान की पुआल, पशु अवशेष एवं कृषि औद्योगिक पदार्थ आदि को गुणवत्ता वाली खाद में बदल कर पूरा किया जा सकता है.

ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 600-700 मिलियन टन व्यर्थ कृषि पदार्थों का उत्पादन होता है, जिनमें से 272 मिलियन टन फसल अवशेषों से आता है, इनमें मुख्य रुप से धान के पुआल आती है, क्योंकि धान देश के लगभग 45.5 मिलियन हेक्टेयर मे उगाया जाता है. यदि धान के पुआल को बिना उचित प्रबंधन के खेत में छोड़ देने पर यह विभिन्न कीटों एवं रोगजनकों को आश्रय प्रदान कर उनके प्रसार में सहायता करता है. धान के पुआल से फैलने वाले रोगों में धान के तने का रोग है इसी प्रकार यह अन्य पीड़कों जैसे चूहे के प्रजनन को बढ़ावा देता है. आजकल धान की कटाई के बाद पुआल को खेत में जला दिया जाता है जो कि इसके प्रबंधन का उचित तरिका नहीं है. उत्तरी भारत में मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा आदि राज्यों में धान की कटाई कम्बाइन हारवेस्टर से की जाती है उसके बाद पुआल को खेतों में जला दिया जाता है जिसका हानिकारक प्रभाव मृदा में ही नहीं अपितु पर्यावरण में भी देखा जा सकता है धान के पुआल को जलाने के कई कारण है जिनमें मुख्य रुप से -

1. धान की कटाई के बाद शीघ्र दूसरी रबी की फसल की बुवाई हेतु खेत की सफाई के उद्धेष्य से पुआल को जला दिया जाता है.

2. किसानों के पास पुआल को रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में जमीन नहीं होती है.

3. पुआल को पशु खाना पसंद नहीं करते क्योंकि इसमें सिलिका की मात्रा ज्यादा होती है.

4. उत्तर भारत में गेहूं का भूसा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है, जिसे पशु बड़ी रुची से खाते हैं.

इस पुआल को जलाने के बजाय कम्पोस्ट तकनीक द्वारा गुणवत्ता वाली खाद मे बदल सकते हैं जो मृदा में उपयोग करने पर न केवल मृदा उर्वराशक्ति में वृद्धि करेगी बल्कि लम्बे समय तक पौधों को आवश्यक पोषक तत्व भी उपलब्ध कराएगी. पुआल में तो सभी पोषक तत्व होते हैं जो पोधौं के लिए आवश्यक होते हैं. धान की पुआल में पाए जाने वाले सभी  पोषक तत्व इस प्रकार से हैं-

 

सारणी - धान की पुआल में पाए जाने वाले पोषक तत्व

पोषक तत्व               मात्रा (प्रतिषत)

कार्बन                         43

नाइट्रोजन                0.5

फास्फोरस                0.04

पोटेषियम                0.92

कैल्षियम                 0.85

मैग्निषयम               0.43

आयरन                              0.14

मैग्नीज                              385 पीपीएम

कॉपर                          25 पीपीएम

जिंक                          58 पीपीएम


पुआल को जलाने से होने वाले हानिकारक प्रभाव-

मृदा में कार्बनिक पदार्थों की कमी - धान की पुआल को जलाने से मृदा स्वास्थ्य मे गिरावट को आसानी  से देखा जा सकता है जिसका सीधा प्रभाव फसल की वृद्धि एवं उसकी उत्पादकता पर पड़ता है. जब मृदा स्वास्थ्य खराब होता है तो भूमि पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने में समर्थ नहीं होती एवं पोषक तत्वों की कमी के लक्षण आसानी से देखे जा सकते है.

मृदा संरचना में गिरावट - पुआल को जलाने से कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में कमी होती है और कार्बनिक पदार्थों का संबंध सीधा मृदा स्वास्थ्य से होता है जो मृदा संरचना को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

मृदा की जैविक गतिविधियों में कमी - मृदा की लाभदायक जैविक गतिविधियों की मात्रा में कमी आती है, इसका मुख्य कारण यह है कि पुआल को जलाने से कार्बनिक पदार्थों की मात्रा में कमी होने से सूक्ष्म जीवों को पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक पदार्थ नहीं मिल पाते. इसका सीधा प्रभाव भूमि के पोषक तत्वों की उपलब्धता पर पड़ता है, क्योंकि इस अवस्था में सूक्ष्मजीव कार्बनिक पदार्थों को अकार्बनिक पदार्थों में परिवर्तित करने में असमर्थ होते है, जिसे मिनरलाइजेषन कहते हैं. ये सूक्ष्मजीव भूमि में कई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं, जिनमें वातावरण से नाइट्रोजन का स्थरीकरण करना, पौधों में पोषक तत्वों की आपूर्ति करना एवं अघुलनषील पोषक तत्वों को घुलनषील बनाना है.

पर्यावरण प्रदूषण- पुआल को जलाने से कई हानिकारक गैसे निकलती जैसे विभिन्न ग्रीन हाऊस गैसें यथा कार्बन मोनो ऑक्साइड, कार्बनडाइ ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड, मिथेन है जो पर्यावरण भारी नुकसान पहुंचाती है.

खाद बनाने की विधि-

धान की कटाई करने के बाद दानों को अलग करके बची हुई पुआल को जलाने के बजाय उसको छोटे-छोटे टुकड़ो में काट लेना चाहिए. उसके बाद इसे पूरी रात पानी में भिगोकर रखते हैं जिससे खाद जल्दी बनकर तैयार हो जाती हैं.

उसके बाद इन टुकड़ो को पानी से निकालकर 6 मीटर लंबी 2 मीटर चौड़ी और 1.5 मीटर गहरी खाई में इस प्रकार से डालते है कि एक परत पुआल की एवं एक परत गोबर रहे. बाद में इस पर गोबर की स्लरी से लेपन कर दिया जाता है. इस प्रकार कुल तीन परत बनाई जाती है.

कम्पोस्ट के सड़ने की गति को बढ़ाने के लिए इसमें ट्राइकोडर्मा कवक 50 ग्राम प्रति 100 किग्रा. पुआल की दर से मिलाया जाता है.

नाइट्रोजन व कार्बन अनुपात को कम करने के लिये 0.25 किग्रा. नाइट्रोजन प्रति 100 किग्रा. पुआल के हिसाब से मिलाते हैं,जिससे यह प्राकृतिक वातावरण की तरह काम करता है.

इसमें पर्याप्त मात्रा में नमी बनाए रखने के लिए समय-समय पर पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए. महीने के अंतराल पर कम्पोस्ट को मिलाया जाता है ताकि पर्याप्त मात्रा में वायुसंचार बनी रहे. इस पूरी प्रक्रिया में चार महीने का समय लगता है.

पुआाल से तैयार खाद को मिट्टी में डालने से लाभ-

पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध फसल अवषेषों को गुणवत्ता वाली खाद बनाकर खेतों में पुर्नचक्रण कर सकते हैं. कम्पोस्ट की सहायता से इन फसल अवषेषों का आसानी से प्रबंधन किया जा सकता है जिससे पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है.

पुआल की खाद मृदा की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक अवस्था में सुधार करती है ये खाद पोषक तत्वों के मिनरलाइजेषन के बढ़ावा देती है साथ ही पोषक तत्वों को लंबे समय तक मृदा में बनाये रखती है.

पुआल की खाद मृदा में आवष्यक सभी सूक्ष्मजीवों के मध्य संतुलन बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

पुआल की खाद फसल वृद्धि एवं उत्पादन को बढ़ाती है तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करती है.

 

धान पुआल से बने खाद में पाए जाने वाले विभिन्न पोषक तत्व

पी. एच.     8.1

सी. ई. सी.(मोल/किग्रा.)                                         150

कुल कार्बन (प्रतिषत)                                     38.4

नाइट्रोजन (प्रतिषत)                                      1.64

कार्बन और नाइट्रोजन का अनुपात              23.3

फास्फोरस (प्रतिषत)                                      0.5

पोटैषियम (प्रतिषत)                                      1.41

सल्फर (प्रतिषत)                                        0.5

कैल्षियम (प्रतिषत)                                      2.45

मैग्निषयम (प्रतिषत)                                     1.48

आयरन (प्रतिषत)                                        0.16

मैंग्नीज (पी. पी. एम.)                                         385

कॉपर (पी. पी. एम.)                                     40.5

जिंक (पी. पी. एम.)                                      158

माइक्रोबियल बायोमास कार्बन (ग्रा./किग्रा.)  4

डिहाइड्रोजिनेज (µGtpf/g/h)                          475

एसिड फास्फेट (µPNPg/h)                           831

अल्केलाइन फास्फेट (1/4µgPNPg/h)             1985

 

लेखक:

1सुनिल कुमार 1तेज राम बंजारा,एवं एव संजू कुमावत

शोध छात्र1 एवं शोध छात्रा2

 1शस्य विज्ञान विभाग, कृषि विज्ञान संस्थान,

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी (उ. प्र.)

2शस्य विज्ञान विभाग, श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्व विध्यालय जोबनेर जयपुर

Email: sunilgoyam675@gmail.com

Mob- 9452888663



Share your comments