1. खेती-बाड़ी

सरसों के प्रमुख कीट, रोग एवं उनका प्रबंधन

तिलहन की फसलों में सरसों (तोरिया एवम राया) का भारतवर्ष में विशेष स्थान है. यह राजस्थान की रबी की मुख्य फसल है. समय-समय पर सरसों की फसल में अनेक प्रकार के कीट आक्रमण करते हैं. हालांकि, इनमें से 4-5 कीट आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. इसलिए यह अति आवश्यक है कि इन कीटों की सही पहचान कर उचित रोकथाम की जाए. यदि समय रहते इन रोगों एवं कीटों का नियंत्रण कर लिया जाये तो सरसों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी की जा सकती है.

कीट एवं रोग प्रबंधन

सरसों के प्रमुख कीट

आरामक्खी-
इस समय सरसों में चित्रित कीट व माहू कीट का प्रकोप होने का डर ज्यादा रहता है. इसके असर से शुरू में फसलों के छोटे पौधों पर आरामक्खी की गिडारें (काली गिडार व बालदार गिडार) नुकसान पंहुचाती हैं, गिडारें काले रंग की होती हैं जो पत्तियों को बहुत तेजी के साथ किनारों से विभिन्न प्रकार के छेद बनाती हुई खाती हैं जिसके कारण पत्तियां बिल्कुल छलनी हो जाती हैं.

नियंत्रण- गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें. सूड़िंयों को पकड़ कर नष्ट कर दें. फसल की सिंचाई करने से सूडिंया डूब कर मर जाती हैं. फसल में इस कीड़े का प्रकोप होने पर मेलाथियान 50 ई.सी. की 200 मि.ली. मात्रा को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें.

माहू- सरसों में दूसरा कीट माहू यानी चेपा मुख्य होता है. इस कीट के शिशु एवं प्रौंढ़ पौधों के कोमल तनों, पत्तियों, फूलों एवं नई फलियों से रस चूसकर उसे कमजोर एवम क्षतिग्रस्त तो करते ही हैं साथ-साथ रस चूसते समय पत्तियों पर मधुस्राव भी करते हैं. इस मधुस्राव पर काले कवक का प्रकोप हो जाता है तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित हो जाती है. इस कीट का प्रकोप दिसम्बर-जनवरी से लेकर मार्च तक बना रहता है और बादल घिरे रहने पर इसका प्रकोप तेजी से होता है.

नियंत्रण- सरसों की बिजाई की गई फसल (10-25 अक्टूबर तक) पर इस कीट का प्रकोप कम होता है. राया जाति की किस्मों पर चेंपे का प्रकोप कम होता है. दिसंबर के अंतिम या जनवरी के प्रथम सप्ताह में जहां कीट के समूह दिखाई दें, उन टहनियों के प्रभावित हिस्सों को कीट सहित तोड़कर नष्ट कर दें. जब खेत में कीटों का आक्रमण 20% पौधों पर हो जाए या औसतन 13-14 कीट प्रति पौधा हो जाए तो निम्नलिखित कीटनाशकों में से किसी एक का प्रयोग करें. छिड़काव सायं के समय करें, जब फसल पर मधुमक्खियां कम होती हैं. मोटर चालित पंप में कीटनाशक दवाई की मात्रा ऊपर लिखित होगी लेकिन पानी की मात्रा 20 से 40 लीटर प्रति एकड़ हो जाएगी. साग के लिए उगाई गई फसल पर 250 से 500 मि.ली. मेलाथियान 50 ई.सी. को 250 से 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव करें. यदि आवश्यकता हो तो दूसरा छिड़काव 7 से 10 दिन के अंतराल पर करें.

समन्वित कीट नियंत्रण

चेपा के समन्वित कीट नियंत्रण के लिए कीट के आर्थिक क्षति स्तर (10-15% पौधों पर 26-28  चेपा प्रति 10 से.मी. तने की ऊपरी शाखा) में पाए जाने पर बायोएजेन्ट वर्टिसिलियम लिकेनाइ एक किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एवं 7 दिन के अंतराल पर मिथाइल डिमेटोन (25 ई.सी.) या डाइमिथोएट (30 ई.सी) 500 मि.ली./हेक्टेयर का छिड़काव करें.

जैविक नियंत्रण

सरसों की फसल में चेंपा के जैविक नियंत्रण हेतु फसल में कीट की आर्थिक क्षति स्तर में पाए जाने पर 2 प्रतिशत नीम के तेल को तरल साबुन के घोल (20 मि.ली. नीम का तेल +1 मि.ली. तरल साबुन) में मिलाकर छिड़काव करें. सरसों की फसल की फूल अवस्था पर अपेक्षाकृत सुरक्षित रसायनों का छिड़काव संध्याकाल में ही करें.

काला धब्बा या पर्ण चित्तीः सरसों की पत्तियों पर छोटे-छोटे गहरे भूरे गोल धब्बे बनते हैं जो बाद में तेजी से बढ़ कर काले और बड़े आकार के हो जाते हैं एवं इन धब्बों में गोल छल्ले साफ नजर आते हैं रोग की अधिकता में बहुत से धब्बे आपस में मिलकर बड़ा रूप ले लेते हैं तथा फलस्वरूप पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं तने और फलों पर भी गोल गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं.

तना गलनः सरसों के तनों पर लंबे व भूरे जलसिक्त धब्बे बनते हैं जिन पर बाद में सफेद फफूंद की तह बन जाती है. यह सफेद फंफूद पत्तियों, टहनियों और फलियों पर भी नजर आ सकते हैं. उग्र आक्रमण यदि फूल निकलने या फलियाँ बनने के समय पर हो तो तने टूट जाते हैं एवं पौधे मुरझा कर सूख जाते हैं. फसल की कटाई के उपरांत ये फफूंद के पिंड भूमि में गिर जाते हैं या बचे हुए दूठों (अवशेषों) में प्रर्याप्त मात्रा में रहते हैं जो खेत की तैयारी के समय भूमि में मिल जाते हैं.

उपरोक्त रोगों का सामूहिक बीज उपचार

सरसों की खेती को तना गलन रोग से बचाने के लिये 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें.

छिड़काव कार्यक्रम- सरसों की खेती में लक्षण दिखते ही डाइथेन एम- 45 का 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव सरसों की खेती पर दो बार 15 दिन के अन्तर पर करें. जिन क्षेत्रों में तना गलन रोग का प्रकोप हर वर्ष अधिक होता है, वहां बाविस्टिन से 2 ग्राम प्रति किलो को दर से बीज का उपचार करें और इसी दवा का बिजाई के 45 से 50 और 65 से 70 दिन बाद 0.1 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें.

अन्य उपाय- फसल कटने के उपरांत गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करें ताकि जमीन में जो फफूंद हैं नष्ट हो जाए. स्वस्थ साफ और प्रमाणित बीज ही बोएं. तना गलन रोगग्रस्त खेतों में गेहूं या जौ का फसल चक्र अपनाएं. राया की बिजाई समय पर 10 से 25 अक्तूबर तक करने से रोगों का प्रकोप कम हो जाता है. खेत में पानी खड़ा न रहने दें अन्यथा नमी रहने से विशेषकर तना गलन रोग का प्रकोप अधिक हो जाता है फसल में खरपतवार न होने दें.

लेखक- हिमांगिनी जोशी, डॉ. एस. एल. मुंद्रा
शस्य विज्ञान विभाग, राजस्थान कृषि महाविद्यालय
महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्यौगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)
पता- आरसीए गर्ल्स हॉस्टल, मंगलम मॉल के सामने, डुरगुरिनरी रोड, उदयपुर
पिन कोड- 313001 संपर्क नंबर- 7742622676

English Summary: Major insect pests, diseases and management of mustard

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