1. खेती-बाड़ी

रबी मक्का - अवसर और चुनौतियाँ

KJ Staff
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Makka

Maize cultivation and crop management

विश्व में मक्का एक महत्वपूर्ण अनाज फसल हैं। मक्का का मानव भोजन और पशु के चारे के अतिरिक्त उद्योग में व्यापक प्रयोग किया जाता है और इसी कारण यह एक लोकप्रिय फसल हैं। अन्य खाद्यान्न फसलों में से इसमें सबसे अधिक आनुवंशिक उपज क्षमता हैं। भोजन, चारे और औद्योगिक क्षेत्रों में मक्के के अनेक प्रयोगों के कारण इसकी मांग वैश्विक रूप से निरंतर बढ़ रही है, इसीलिए हमें उन्हीं या उससे भी कम संसाधनों की सहायता से अधिक उत्पादन करने की आवश्यकता है।

मक्का के प्रकाश-तापीय असंवेदनशील विशेषताओं के कारण इसे पूरे वर्ष भर में उगाया जा सकता है और इसमें अन्य अनाजों की अपेक्षा उच्चतम आनुवंशिक उपज क्षमता है । भारत में, मक्के की खेती विभिन्न उद्देश्यों के लिए देश के अधिकांश राज्यों में वर्ष भर की जाती है क्योंकि अनाज, भोजन और चारे के लिए हरे भूट्टे, स्वीट कोर्न, बेबी कोर्न और पाॅप कोर्न तथा औद्योगिक उत्पादों के लिए इसकी मांग हमेशा बनी रहती हैं। भारत में मक्के की खेती किये जाने वाले क्षेत्रों में उत्पादन और उत्पादकता में धीरे-धीरे बढ़ोतरी देखने को मिली है।

भारत में, मक्के का वर्तमान खपत पैटर्न इस प्रकार हैः- पोल्ट्री, सूअर एवं मात्स्यिकी के चारे के रूप में 59 प्रतिशत, उद्योग में 17 प्रतिशत, निर्यात में 10 प्रतिशत, मानव खपत में 10 प्रतिशत तथा अन्य में 4 प्रतिशत है। भारत में, मक्का की खेती के लिए तीन विशिष्ट मौसम होते है: खरीफ, रबी तथा वसंत। मक्का मुख्य रूप से खरीफ मौसम की फसल है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से भारत में मक्का के कुल उत्पादन में रबी मक्का ने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया हैं। गैर पारंपरिक मौसम और गैर पारंपरिक क्षेत्रों में यह एक महत्वपूर्ण फसल के रूप में उभरी है । प्रायद्वीपीय भारत (आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडू) के साथ ही साथ उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में शीतकाल में इसकी खेती प्रचलित होती जा रही हैं। आन्ध्र प्रदेश, बिहार और तमिलनाडू तीन सबसे बड़े मक्का का उत्पादन करने वाले राज्य है, जिनमें क्रमशः 2.32, 1.02 और 0.47 मिलियन टन मक्का का उत्पादन होता है और उसके बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के राज्य आते हैं। बिहार और दक्षिण भारत के कुछ भागों में 60 के मध्य में सर्दी के मौसम में मक्के की खेती प्रारंभ की गई। इस मौसम में प्राप्त की गई (झ 6 टन/हैक्टर) उपज खरीफ मौसम की उपज (2-2.5 टन/हैक्टर) से निर्विवाद रूप से उच्चतर थी, जिसके कारण बढ़वार की लम्बी अवधि, नाशीजीवों तथा रोगों से न्यूनतम संक्रमण महत्वपूर्ण का कारण था। बिहार में मक्का को सभी (तीनों) मौसमों के दौरान उगाया जा सकता हैं। हाल ही के वर्षों में इस फसल के बढ़ रहे वाणिज्यिक प्रयोगों के कारण और विविध प्रकार के अंतिम प्रयोक्ताओं, विशेष रूप से चारे और औद्योगिक प्रयोगों के लिए बढ़ रही मांग के कारण मक्का के उत्पादन और उपयोगिता में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं।

रबी मक्का की उच्च उपज में योगदान देने वाले कारक

यद्यपि, खरीफ और रबी दोनों मौसमों में बेहतर फसल प्रबंधन से अनुकूल फसल प्राप्त हो सकती है, परंतु दक्षिण-पश्चिम मानसून का अनियमित वर्षा पैटर्न खरीफ मौसम में खेत में समय से की जाने वाली क्रियाओ के बीच में बाधा उत्पन्न करता हैं। रबी में किसी भी प्रकार की मुख्य पर्यावरणीय बाधा के न होने के कारण, वांछित खेत क्रियाओं की योजना बनाई जा सकती है और सबसे अधिक वांछित समय में इनका निष्पादन भी किया जा सकता है । इसके साथ ही साथ इस मौसम में किसी मुख्य रोग और कीटनाशी जीव की अनुपस्थिति सहित विभिन्न पर्यावरणीय कारकों से थोड़े से धन निवेश से बेहतर लाभ प्राप्त करने में सहायता मिलती हैं। रबी में मक्का की खेती के लिए अनुकूल कुछ महत्वपूर्ण कारकों की नीचे संक्षेप में चर्चा की गई हैः-

1. बेहतर जल प्रबंधन - अनियमित वर्षा की अनुपस्थिति में रबी मौसम के दौरान फसल को जलक्रांतता का सामना नहीं करना पड़ता और इस प्रकार, पुष्पन से पहले डंठलों के विगलन से होने वाली क्षति कम होती हैं। चूंकि, उर्वरकों का कोई निक्षालन नहीं होता, उनका अधिकतम उपयोग किया जा सकता है, जिससे उच्च उपज प्राप्त होती है । सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि वांछित समय पर विभिन्न खेत क्रियाएं करना सम्भव होता है । रबी की फसल को आच्छादित आकाश का सामना नहीं करना पड़ता जो कि खरीफ मौसम की एक नियमित प्रक्रिया हैं।

2. मृदु और अनुकूल तापमान - प्रभावी प्रकाश संश्लेषण गतिविधियों के लिए पत्तियों की बड़ी सतह के साथ ही साथ रात्रि के निम्न तापमानों के कारण प्रकाश श्वसन में होने वाली निम्नतम हानियों की दृष्टि से रबी मौसम में मक्का के पौधे अधिक दक्ष होते हैं। रबी मौसम का एक अन्य लाभ यह है कि खरीफ मौसम में 3 से 5 घंटे की सूर्य की रोशनी की तुलना में 7 से 9 घंटे की अधिक रोशनी प्राप्त होती हैं। इसके साथ ही साथ फसल की लम्बी बढ़वार अवधि भी उपज के स्तरों को आगे बढ़ाती है ।

3. बृह्त पोषक तत्वों के प्रति बेहतर अनुक्रिया - बढ़वार की अधिक अनुकूल परिस्थितियों की दृष्टि से खरीफ मौसम की अपेक्षा रबी मौसम में नत्रजन और अन्य पोषक तत्वों के अनुप्रयोग के प्रति बेहतर अनुक्रिया होती हैं। रबी के दौरान होने वाली क्षतियों को समुचित मृदा और जल प्रबंधन क्रिया विधियों के माध्यम से प्रभावकारी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है । खेती की लागत का एक मुख्य घटक उर्वरकों के प्रति बेहतर अनुक्रिया के कारण हैं। इस मौसम के दौरान उत्पादन की लागत को कम करना संभव हैं।

4. रोगों और कीट नाशीजीवों का कम आपतन - रबी मौसम में निम्न तापमान और आर्द्रता के कारण विभिन्न रोगों और कीटनाशी जीवों द्वारा संक्रमण का स्तर काफी कम होता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्चतर उपज प्राप्त होती हैं।

5. बेहतर पादप स्थापना - मृदा और जल के बेहतर प्रबंधन केे कारण तथा रोगों और नीशीजीवों से होने वाली कम क्षति के कारण रबी मौसम में वांछित पादपों की संख्या घनत्व की स्थापना सुनिश्चित की जा सकती हैं।

6. बेहतर खरपतवार प्रबंधन:- खरीफ में, खरपतवार एक मुख्य समस्या उत्पन्न करते है, विशेष रूप से उन वर्षों में जबकि लगातार वर्षा होती है, जिसके कारण हाथ से निराई करने का अवसर प्राप्त नहीं हो पाता। रबी मौसम में, प्रभावी जल प्रबंधन और निम्न तापमान के कारण, खरपतवारों को प्रभावकारी रूप से नियंत्रित किया जा सकता हैं। इससे अप्रत्यक्ष रूप से उर्वरक प्रयोग दक्षता को बढ़ाने में सहायता मिलती हैं।

उत्पादकता बढ़ाने के लिए सस्य क्रियाविधियां

1. किस्मों का चयन - रबी मौसम से प्राप्त होने वाली सफलता और लाभ का स्तर बहुत कुछ उगाए जाने वाले मक्का के संकरों/कम्पोजितों के चयन पर निर्भर करता है। इसलिए किसानों को रबी मौसम के लिए उपयुक्त केवल उच्च उपजशील संकरों को बोने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उच्च उपज प्राप्त करने के लिए एफ.1 (थ्1) संकर बीज का उपयोग अनिवार्य है । सामान्य रूप से अधिकांश मूल्यांकन परीक्षणों में, प्रति हैक्टर 6 टन या उससे अधिक के औसत उपज स्तर के साथ अभिशंसित संकरों से स्थानीय किस्मों की अपेक्षा 60 से 80 प्रतिशत उच्चतर उपज प्राप्त हुई है ।

2. मृदा - मक्का को रेतीली से मटिआरी तक की विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है, लेकिन यह अच्छी प्रकार से निकासी वाली, वांतित गहरी दुमटी और सिल्ट दुमटी मिट्टियों में सबसे अच्छा प्रदर्शन करती हैं, जिसमें जैविक पदार्थ और पोषक तत्व शामिल होते हैं। मक्का की फसल के लिए अत्यधिक लवणीय, अम्लीय, क्षारीय और जलक्रांत मृदाओं के प्रयोग से बचना चाहिए।

3. बुआई की तारीख - शीतकालीन मक्का के लिए बुआई की इष्टतम तारीख महत्वपूर्ण है, जिससे कि उगाए जाने वाले जीन प्रारूप इष्टतम पर्यावरणीय परिस्थितियों के तहत अपना जीवनचक्र पूरा कर सकें। सामान्यतयाः अक्टूबर के अंत तक और वरीयता की दृष्टि से मध्य अक्टूबर तक बुआई पूरी कर ली जानी चाहिए। अक्टूबर के दूसरे पक्ष से मध्य नवम्बर तक अधिकांश उत्तर भारत में तापमान में तेजी से गिरावट आती है, जिसके परिणामस्वरूप अंकुरण में देरी होती है और पौधे की बढ़वार में कमी आती हैं। इसलिए बुआई में किसी भी प्रकार की देरी से उपज में भी कमी आती हैं। इसके साथ ही साथ देर से बोई जाने वाली फसलों में सामान्य रतुओं का अधिक आपतन होता है, जो कि समय से बोई जाने वाली फसलों में कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं हैं। तथापि, विलंबित बुआई के कारण उपज में कमी की मात्रा विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती हैं। मक्का उगाने वाले विभिन्न राज्यों में उच्च उपज प्राप्त करने के लिए बुआई की सबसे उपयुक्त अवधि तालिका-1 में दी गई हैं।

पंजाब और हरियाणा में जहाँ बुआई के समय तापमान कम होता है, वहाँ फसल को मेड़ों पर उगाना वांछनीय होगा। बुआई पूर्व-पश्चिम मेड़ में दक्षिणी तरफ की जानी चाहिए, जिससे कि उसको पर्याप्त सूर्य की रोशनी मिल सके और बीजों की क्यारियां गर्म रहें।

Maize Cultivation

4. पादप घनत्व और बीज दर - रबी में उच्च उपज प्राप्त करने के लिए कटाई के समय प्रति हैक्टर 90,000 पौधों की संख्या वाछंनीय हैं। पंक्तियों के बीच 60 सें.मी. का अंतराल और पौधों के बीच 18 से 20 सें.मी. तक की दूरी वांछित पादप संख्या घनत्व उपलब्ध करायेगी। इस उद्देश्य के लिए 1 हैक्टर भूमि में बुआई के लिए 20 से 22 कि.ग्रा. बीजों की आवश्यकता होगी। बीजों को 4 से 5 सें.मी. की गहराई पर बोया जाना चाहिए।

5. बीज उपचार - मक्के की फसल को बीज और मृदा वाहित रोगों और कीट नाशीजीवों से बचाने के लिए कवकनाशी और कीटनाशियों के साथ बीज उपचार आवश्यक होता हैं।

6. बुआई की विधि -

(क.) उठी हुई क्यारी रोपण - यह अधिक नमी के साथ ही साथ सीमित सिंचाई उपलब्धता दोनों प्रकार की परिस्थितियों के तहत मानसून और शीतकाल के दौरान मक्का के लिए सर्वोत्तम विधि हैं। बुआई पूर्व-पश्चिम मेड़ों/क्यारियों के दक्षिणी तरफ की जानी चाहिए, जिससे अंकुरण में सहायता मिलती है । रोपण उचित अंतराल पर किया जाना चाहिए। वरीयता की दृष्टि से रोपण के लिए झुकी हुई प्लेट, कपिंग या रोलर प्रकार की बीज मीटरिंग प्रणालियों वाली उठी हुई क्यारियों के प्लांटर का प्रयोग किया जाना चाहिए, जिससे एक ही क्रिया में उचित स्थान पर बीजों और उर्वरकों की स्थापना में सहायता मिलती हैं, जो अच्छी फसल सथापन, उच्च्तर उत्पादकता और संसाधन प्रयोग दक्षता प्राप्त करने में सहायक होते हैं। उठी हुई क्यारियों में रोपण प्रौद्योगिकी का प्रयोग करते हुए, उच्चतर उत्पादकता के साथ 20 से 30 प्रतिशत सिंचाई जल की बचत हो सकती हैं।

(ख.) शून्य जुताई रोपण - मक्का को शून्य जुताई परिस्थिति के तहत खेती की कम लागत, उच्चतर लाभप्रदता और संसाधनों की बेहतर प्रयोग दक्षता के साथ जुताई की कोई भी तैयारी किये बिना सफलतापूर्वक उगाया जा सकता हैं। ऐसी परिस्थिति के तहत  बुआई के समय मृदा में अच्छी नमी को सुनिश्चित करना चाहिए और मृदा के गठन और खेत की परिस्थिति के अनुसार फ्रो-ओपनर के साथ शून्य जुताई, बीज व उर्वरक प्लांटर का प्रयोग करते हुए बीजों और उर्वरकों को एक बैंड में रखना चाहिए। प्रायद्वीपीय और पूर्वी भारत में चावल-मक्का प्रणालियों के तहत बड़ी संख्या में किसान जुताई रोपण का सफलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं और उच्चतर लाभप्रदता प्राप्त कर रहे हैं।

(ग.) प्रतिरोपण - देश के विशेष रुप से उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में पौधों के प्रतिरोपण द्वारा मक्का की सफलतापूर्वक खेती की जा सकती हैं। यह विधि विशेष रुप से पछेती धान की कटाई तथा गन्ना या सहयोगी फसल के रुप में शीतकालीन गन्ना फसलों की अगेती कटाई के बाद उपयुक्त हैं। बहु सस्यन प्रणालियों में, देरी से बचने के लिए उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में मक्का का प्रतिरोपण एक व्यावहारिक विधि हैं। यह डायरिया और तल क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त हैं। जहाँ बाढ़ का जल धीरे-धीरे कम होता हैं। जनवरी के दूसरे पक्ष में प्रतिरोपण के लिए, नर्सरी से सीधी पछेती बुआई वाली फसल की अपेक्षा उच्चतर उपज प्राप्त करने के लिए 21 से 30 नवम्बर तक बुआई कर देनी चाहिए। एक हैक्टर क्षेत्र का प्रतिरोपण करने के लिए 1/10 हैक्टर की नर्सरी में 25 कि.ग्रा. बीजों की बुआई की जानी चाहिए और उसके साथ ही साथ बुआई से पहले बीजों की क्यारियों में 7.5 कि.ग्रा. नत्रजन, 2.5 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस, 3.0 कि.ग्रा. पौटेशियम और 1.0 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट डाला जाना चाहिए। उöवन से पहले खरपतवारनाशी एट्राजिन का 1.5 कि.ग्रा./है. की दर से इस्तेमाल किये जाने की भी सिफारिश की जाती हैं।

7. पोषक तत्व प्रबंधन - ऐसे अनेक कारक है, जो शीतकालीन मक्का की उत्पादकता को प्रभावित करते हैं, तथापि उर्वरक प्रबंधन ऐसा सबसे महत्वपूर्ण कारक है, जो मक्का की बढ़वार और उपज को प्रभावित करता है । मक्का ऐसी फसल हैं, जिससे बेहतर बढ़वार प्राप्त करने और इसकी उपज क्षमता का पूरा प्रयोग करने के लिए सभी प्रकार के बृह्त और सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग करने की आवश्यकता हैं। विभिन्न पोषक तत्वों में से, नत्रजन सबसे मुख्य पोषक तत्व हैं, जिसका प्रयोग बेहतर कटाई के लिए 150 कि.ग्रा. नत्रजन/है.-1 की दर से किया जाना चाहिए। नत्रजन प्रयोग की दक्षता खरीफ मौसम की अपेक्ष रबी में बेहतर होती है, और ऐसा मुख्य रुप से जल के बेहतर प्रबंधन और निक्षालन की कनम्नतर हानियों के कारण होता हैं। उर्वरकों के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया के साथ, रबी मौसम में उत्पन्न किये जाने वाले प्रत्येक टन मक्का की उत्पादन लागत को बहुत अधिक कम किया जा सकता हैं। बुआई से पहले आहाता खाद की उपलब्ध मात्रा डालनी चाहिए, केवल उर्वरकों के प्रयोग की अपेक्षा जैविक और अजैविक उर्वरकों के मिश्रण का प्रयोग करने से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।

(क.) उर्वरकों की खुराक - डाले जाने वाले उर्वरकों की मात्रा मुख्य रुप से मृदा की उर्वरता और पहले वाले खेत के प्रबंधन पर निर्भर करती हैं। इसलिए मक्का की उच्च्तर आर्थिक उपज के लिए बुआई से 10 से 15 दिन पहले 10 टन आहाता खाद है.-1 के साथ 150-180 कि.ग्रा. नत्रजन, 10-80 कि.ग्रा. फाॅस्फोरस, 70-80 कि.ग्रा. पौटेशियम और 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट/है.-1 का प्रयोग करने की सिफारिश की जाती हैं।

(ख.) उर्वरकों को डालने की विधि - फास्फोरस, पौटेशियम और जिंक की पूरी खुराकों का प्रयोग आधारीय रुप में किया जाना चाहिए और वरीयता की दृष्टि से उर्वरकों की ड्रिलिंग बीजों के साथ बीज व उर्वरक ड्रिल का प्रयोग करते हुए बैंड़ों में की जानी चाहिए। उच्चतर उत्पादकता और प्रयोग दक्षता के लिए नीचे दिये गए विवरण के अनुसार नत्रजन का प्रयोग 5 भागों में बांटकर किया जाना चाहिए। दाने भरने के समय नत्रजन के प्रयोग से दानों का बेहतर भराव होता हैं। इसलिए उच्चतर नत्रजन प्रयोग दक्षता के लिए नत्रजन का प्रयोग 5 भागों में बांटकर किया जाना चाहिए। 

8. खरपतवार नियंत्रण - खरपतवारों के नियंत्रण के लिए जैसा और जब आवश्यक हो, हल्की गुड़ाई की जानी चाहिए। उöव से पहले 1000 लीटर पानी में 0.5-1.0 कि.ग्रा./है. की दर से एट्राजिन या सिमाजिन का छिड़काव करने से चैड़ी पत्तियों वाले खरपतवारों और अधिकांश घासों को सुविधाजनक रुप से नियंत्रित किया जा सकता हैं। शून्य जुताई मक्का उत्पादन में, खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए 400 से 600 लीटर पानी में 1.0 कि.ग्रा./है.-1 की दर से ग्लाइफोसेट या 600 लीटर पानी में 0.5 कि.ग्रा./है.-1 की दर से पैराकुवट जैसे गैर-चयनात्मक खरपतवारनाशियों का पूर्व पादप प्रयोग (रोपण से 10-15 दिन पहले) करने की सिफारिश की जाती हैं। खरपतवारों का भारी संक्रमण होने पर सुरक्षात्मक छिड़काव के रुप में हुड़ों का प्रयोग करते हुए उöव के बाद पैराकुवट का प्रयोग किया जा सकता हैं।

9. जल प्रबंधन - उच्च उपजशील मक्का संकरों की सफल खेती के लिए रबी में वर्षा अपेक्षाकृत अपर्याप्त होती हैं। वास्तव में फसल की सफलता के लिए सुनिश्चित सिंचाई की उपलब्धता एक मुख्य कारक हैं। जहाँ मृदाएं सामान्यतयाः हल्की होती है, वहाँ फसल बढ़वार और विकास की सम्पूर्ण अवधि के दौरान मृदा में 70 प्रतिशत नमी की उपलब्धता के लिए सिंचाई का निर्धारण किया जाना वांछनीय हैं। भारी मृदाओं में, वानस्पतिक स्थिति पर 30 प्रतिशत नमी स्तर को और पुनः उत्पादक और दाने भरने की अवधि के दौरान 70 प्रतिशत के नमी स्तर को बनाये रखना इष्टतम उपज को प्राप्त करने के लिए वांछनीय हैं।

रबी मौसम के दौरान 4 से 6 सिंचाईयों की आवश्यकता होती हैं। यदि 6 सिंचाईयाँ की जानी है, तो उन्हें 20 से 25 दिन के अंतराल पर किया जाना चाहिए। एक (अनिवार्य) पुष्पन के समय, दूसरी पुष्पन के बाद और एक दाने भरने की अगेती स्थिति के समय की जानी चाहिए। यदि केवल 5 सिंचाईयाँ की जानी है, तो वानस्पतिक स्थिति पर की जाने वाली एक सिंचाई को टाला जा सकता है, और यदि केवल 4 सिंचाईयाँ की जानी है, तो दो स्थिति के बाद की जाने वाली सिंचाई को टाला जा सकता हैं। यदि पर्याप्त वर्षा हो जाती है, तो सिंचाईयों का यह क्रम उपयुक्त रुप से बदला जा सकता हैं।

10. पादप सुरक्षा -

i. रोग- खरीफ मक्का की तुलना में रबी में रोगों की समस्या कम होती है, तथापि, टर्सिकम पर्ण अंगमारी और सामान्य रतुआ मध्य से उच्च तीव्रता के साथ होता हैं। रबी मौसम के दौरान पुष्पन के बाद डंठल विगलन विशेष रुप से पछेती बुआई वाली फसलों में मुख्य रुप से काला विगलन देखा जाता हैं। विशेष रुप से जब पकने के समय तापमान अधिक होता है और फसल मृदा नमी प्रतिबल से ग्रस्त होती हैं। इन रोगों के कारण उपज में होने वाली हानियों को कम करने के लिए प्रतिरोधी किस्मों/संकरों को उगाना सबसे सर्वोत्तम उपाय हैं।

क. रतुआ:- यह मुख्य रुप से दे प्रकार के होते हैं -

(i). सामान्य रतुआ (पिकिनिया सोरगी) और

(ii). पोलिसोरा रतुआ (पिकिनिया पोलिसोरा)

(i). सामान्य रतुआ (पिकिनिया सोरगी)- यह उपोष्ण, शीतोष्ण और उच्च भूमि वातावरण में प्रचलित हैं। मध्यम तापमान (16-25 डिग्री सें.ग्रे.) और उच्च सापेक्षिक आर्द्रता इस रोग को फैलाने और बढ़ाने के लिए अनुकूल हैं। सामान्यतयाः मंजरी आने के समय यह रोग दिखाई देता हैं। पत्तियो पर बहुत अधिक मात्रा में स्फोट दिखाई देते है, जब पत्तियों के ऊतक वोर्ल में होते हैं, उस समय होने वाले संक्रमण के परिणामरूवरुप ये स्फोट बैंडों में जल्दी-जल्दी उत्पन्न होते हैं। पत्तियों की दोनों सतहों पर गोल से लम्बे, सुनहरी भूरे से दालचीनी जैसे भूरे स्फोट दूर-दूर छितरे होते है और जैसे-जैसे पौधा पकता है, तो ये भूरे-काले हो जाते हैं। संक्रमण की प्रारंभिक स्थितियों पर स्फोट गहरे भूरे होते है, बाद में जैसे-जैसे पौधा पकता है, बाहरी त्वचा फट जाती है और विक्षति काली हो जाती हैं।

(ii). पोलिसोरा रतुआ - यह रोग आन्ध्र प्रदेश और कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में प्रचलित हैं। इस रोग के लिए मध्यम तापमान (27 डिग्री सें.ग्रे.) और उच्च सापेक्षिक आर्द्रता अनुकूल होती हैं। यह रोग सामान्य रतुए से मिलता-जुलता हैं। पत्तियों पर उभरने वाले स्फोट हल्के दालचीनी के रंग वाले सुनहरी भूरे वृताकार से अंडाकार (0.2 से 2.0 मि.मी. लम्बे) होते है, जो पत्तियों की ऊपरी सतह पर पास-पास छितरे हुए होते हैं। रोग जनक बीजाणु प्रतिशत यूरीडो स्पोर पीले से सुनहरे होते हैं। ऊपरी सतह की तुलना में निचली सतह पर स्फोटों का विकास अधिक होता हैं। तेलिया गोल से लम्बाकार होते है, जो कि बाहरी त्वचा से ढके हुए होते है और सामान्य रतुए की अपेक्षा लम्बे होेते हैं। स्फोटों के पहली बार दिखाई देने पर प्रति लीटर पानी में 2-2.5 ग्राम की दर से मैकोजेब का छिड़काव किया जाना चाहिए।

ख. काला रतुआ (मैक्रोफोमिना फैजिओलाइना) - यह रोग अपेक्षाकृत मक्का उगाने वाले सूखे क्षेत्रों में अधिक प्रचलित होता हैं। जैसे-जैसे पौधा पकने वाला होता हैं, यह रोग अधिक दिखाई देने लगता है। प्रभावित पौधे पकने से पहले सूख जाते है, प्रभावित तनों में रेशे अलग-अलग हो जाती हैं और वे काला चारकोल पाउडर की तरह दिखाई देने लगता हैं। डंठलों के अंदर बहुत सारे छोटे काले स्कैलरोशिया का दिखाई देना एक स्पष्ट लक्षण हैं। यह रोग सामान्यतयाः मृदा स्तर के ऊपर पहली या दूसरी (गांठ) तक ही सीमित रहता हैं। पुष्पन के समय या उसके बाद जल प्रतिबल के कारण पौधे पर संक्रमण हो सकता हैं।

ग. अर्सिकम लीफ ब्लाइट - यह दक्षिण भारत में प्रचलित मक्का का कवकीय रोग है, और खरीफ तथा रबी दोनों मौसमों में देखा जा सकता हैं। रोग के प्रारंभिक लक्षणों में पत्तियों पर अंडाकार जल से भीगे हुए धब्बों का दिखाई देना और रोग के बाद वाली स्थिति में 3-15 सें.मी. लम्बी सिगार की आकृति वाली विक्षतियों का दिखना हैं। ये दीर्घ वृत्ताकार लम्बी सिगार की आकृति वाले धूसर हरे या टैन रंग की विक्षति पौधों के पकने पर विशिष्ट अदीरत क्षेत्रों में विकसित होती है और कवकीय बीजाणुकरण से जुड़ जाती हैं। ये विक्षतियाँ पहले निचली पत्त्यिों पर दिखाई देती है और फसल के पकने के साथ ही ऊपरी पत्तियों और बालियों पर फैल जाती हैं। गंभीर संक्रमण होने पर, ये विक्षतियाँ इकट्ठे हो जाते है और पूरी पत्ती पर अंगमारी हो जाती हैं। टर्सिकम पर्ण अंगमारी के कारण उपज में 70 प्रतिशत तक की हानि हो सकती हैं। इसे नियंत्रित करने के लिए 8-10 दिन के अंतराल पर प्रति लीटर पानी में 2.5-4.0 ग्राम जिनेब/मिनेब का छिड़काव किया जाना चाहिए।

  • ii. कीट नाशीजीव - रबी में उगाई जाने वाली मक्का पर मुख्य कीट नाशीजीवों का आक्रमण नहीं होता, जो सामान्यतयाः खरीफ फसल पर आक्रमण करते हैं। तथापि, गुलाबी तनावेधक सिसेमिया इनफैरेंस मुख्य नाशीजीव हैं। इसके लार्वा पौधे के सभी भागों जैसे कि पत्ती, तना, मंजरी और बाली सभी पर आक्रमण करते हैं। लार्वा फीडिंग के कारण बढ़े हुए पौधों की पत्तियों के फलकों पर अनेक स्लिट प्रकार के अंडाकार लम्बे छिद्र दिखाई देते हैं। वे तने के भीतर एक सुरंग बना लेते है और सतह पर बाहर निकलने के लिए छिद्र बना देते हैं। बढ़े हुए पौधों में क्षय हो रहे प्ररोह के कारण भुट्टे का विगलन होता है और इस प्रकार दानों की पूरी हानि हो जाती हैं। इस नाशीजीव को नियंत्रित करने के लिए अंकुरण के 15 दिन और 35 दिन के बाद क्यूनाॅलफोस 05 प्रतिशत के 2 छिड़काव किये जाने चाहिए और इसके बाद दूसरे छिड़काव में अंकुरण के 20 दिनों के बाद 0.5 कि.ग्रा./है. की दर पर 3 ग्राम कैबोफ्यूराॅन या 5 ग्राम ट्राइक्लोरफोन का प्रयोग करना चाहिए और उसके बाद पहली सिफारिश के 20 दिनों के बाद इसका दूसरी बार प्रयोग करना चाहिए।

  • अंतः फसलीकरण - अंतः फसलीकरण के उगाने के लिए मक्का सबसे उपयुक्त फसल है, क्योंकि इसके लिए चैड़ी क्यारियों की आवश्यकता होती है और यह किसानों को उच्चतर आय प्रदान कर सकती हैं। मक्का में अल्पावधि की अनेक दलहनों (मटर, राजमा और अन्य फलियां) अनेक सब्जियों और तिलहनी फसलों का सफलतापूर्वक अंतः फसलीकरण किया जा सकता हैं। अंतः फसलीकरण के तहत शुद्ध मक्का की उपज किसी भी तरह से कम नहीं होती, लेकिन अंत फसल एक प्रकार का बोनस हैं। गेहूँ और मक्का का अंतः फसलीकरण करना भी संभव हैं। अंतः फसलीकरण के तहत मक्का की छोटी गठन वाली किस्मों का प्रदर्शन बेहतर होता हैं। चावल की पछेती कटाई के बाद देरी से की जाने वाली बुआई के तहत यह विधि विशेष रुप से वांछनीय हैं।

लेखक: निरुपमा सिंह1, मीना शेखर2, सपना सिंह3
1भा.कृ.अनु.प.-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली
2,3भा.कृ.अनु.प.-राष्ट्रीय पादप आनुवांशिकी संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली

English Summary: Maize cultivation and crop management

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