Farm Activities

कैसे करें लीची की खेती, जानें ! भूमि जलवायु और प्रजातियां......

लीची न केवल भारत में बल्कि देश-दुनिया में अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के लिए मशहूर है. लीची फल के उत्पादन में चीन के बाद भारत का नंबर आता है. पिछली कुछ सालों से लीची के निर्यात में लगातार वृद्धि देखने को मिल रही है. लीची के खेती के लिए विशेष प्रकार की जलवायु की आवश्यकता पड़ती है. इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी पर नहीं की जा सकती है. अगर हम भारत में देखे तो लीची को बागवानी के रूप में उत्तरी बिहार, देहरादून की घाटी, तराई उत्तर प्रदेश और झारखंड के कुछ स्थानों पर की जा रही है.

भूमि एवं जलवायु

लीची की खेती के लिए 5-7पी.एच.मान वाली बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी मानी जाती है. उत्तरी बिहार में पाई जाने वाली कलकेरियस मिट्टी की जल धारण क्षमता सबसे अधिक होती है इसलिए यह स्थान लीची के खेती के सबसे उपयुक्त है. इसके आलावा हल्की अम्लीय एवं लेटराइट मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है. जल भराव वाले क्षेत्र लीची के लिए उपयुक्त नहीं होते अत: इसकी खेती जल निकास उयुक्त उपरवार भूमि में करने से अच्छा लाभ प्राप्त होता है.

समशीतोष्ण जलवायु लीची के उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है. जनवरी-फरवरी माह में आसमान साफ़ रहने, तापमान में वृद्धि एवं शुष्क जलवायु होने पर लीची में अच्छा मंजर आता है. मंजर के ही कारण ज्यादा फूल एवं फल लगते है. अप्रैल-मई में वातावरण में सामान्य आर्द्रता रहने से फलों में गूदे का विकास एवं गुणवत्ता में सुधार होता है. फल पकते समय वर्षा होने से फलों का रंगो पर प्रभाव पड़ता है.

किस्में

लीची की किस्मों की संस्तुति नीचे तालिका में की गई है:

पक्वता वर्ग                    परिपक्वता अवधि                           किस्में

अगेती                         15-30 मई                       शाही, त्रिकोलिया, अझौली, ग्रीन, देशी.

मध्यम                       01-20 जून                      रोज सेंटेड,डी-रोज,अर्ली बेदाना, स्वर्ण

पछेती                        10-15 जून                      चाइना, पूर्वी, कसबा

पौधों की रोपाई

लीची के पौधे औसतन 10x 10 मी. की दूरी पर लगाना चाहिए. लीची के पौध की रोपाई से पहले खेत में रेखांकन करके पौधा लगाने का स्थान सुनिश्चित करके अप्रैल-मई माह में 90x 90x 90 सें.मी. आकार के गड्ढे बना देते है गड्ढे की आधी मिट्टी को एक तरफ तथा नीचे की आधी मिट्टी को दूसरे तरफ रख देते हैं. वर्षा प्रारम्भ होते ही जून के महीने में ही उचित रसायन मिलाकर इन गड्ढे को भर देते है. जब ये मिट्टी बारिश के पाने से कुछ दब जाये तो इसमे पौधे रूप देना चाहिए. पौधे के चारों तरफ थाले बना देने चाहिए और इन थालों मे समय-समय पर रसायन और अपनी देते रहते है. 

पौध रोपण के चार-पांच साल बाद पौधों फूल और फल आने लगते है. जनवरी-फरवरी में फूल आते हैं एवं फल मई-जून में पक कर तैयार हो जाते है. फल पकने के बाद गहरे गुलाबी रंग के हो जाते हैं और उनके ऊपर के छोटे-छोटे उभार चपटे हो जाते है. पूर्ण विकसित पौधे से औसतन 70-100 कि.ग्रा. फल प्रति वृक्ष प्रतिवर्ष प्राप्त किये जा सकते है.



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