Farm Activities

बरसीम की खेती करने का तरीका, महत्ता एवं उपयोग

'बरसीन हरा चारा' अपने गुणों के कारण दुधारू पशुओं के लिये प्रसिद्ध है. उत्तरी/पूर्वी क्षेत्र में मक्का या धान के बाद इसकी सफल खेती होती है.  इसकी खेती के लिए दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त होती है. बरसीम के लिए अम्लीय मिट्टी अनुपयुक्त  होती है.

भूमि की तैयारी

खरीफ की फसल के बाद पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से फिर 2-3 बार हैरों चलाकर मिट्टी भूरभूरी कर लेनी चाहिये. बुवाई के लिए खेत के लगभग 4*5 मी. की क्यारियों में बांट ले.

उन्नतिशील प्रजातियां

 

क्र.सं.

प्रजातियां

हरा चारा (कु०हे०)

1

वरदान 900-1000

900-1000

2

मेस्कावी

800-900

3

बुंदेलखण्ड बरसीन-2
(जे.एच.टी.बी.-146)

 

900-1100

4

बुंदेलखण्ड बरसीन-3
(जे.एच.टी.बी.-146)

950-1100

बुवाई का समय

बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक करना ठीक रहता है. देर से बोने पर कटाई की संख्या कम और चारों की उपज प्रभावित होता है.

बुवाई की विधि

तैयार क्यारियों में 5 सेमी० गहरा पानी भरकर उसके ऊपर बीज छिड़क देते है. बुवाई के 24 घण्टें बाद क्यारी से जल निकाल कर देना चाहिये. जहॉ धान काटने मे देर हो वहॉ बरसीम की उतेरा करना उचित है इसमें धान कटने से 10-15 दिन पूर्व ही बरसीन को खड़ी फसल में छिड़काव विधि से बुवाई करते है.

बीज दर

प्रति हेक्टेयर 25-30 किग्रा० बीज बोते है. पहली कटाई मे चारा की उपज अधिक लेने के लिए 1 किग्रा० /हे० चारे वाली टा -9 सरसों का बीज बरसीन में मिलाकर बोना चाहिये.

कटाई

कटाई 8-10 सेमी० की जमीन के ऊपर करने से कल्ले निकलते है. बीज लेने के लिए पहली कटाई के बाद फसल छोड दे.

बीजोपचार

प्रायः बरसीम के साथ कासनी का बीज मिला रहता है. मिश्रित बीज को 5-10 प्रतिशत नमक के घोल में डाल देने से कासनी का बीज ऊपर तैरने लगता है. इसे छानकर अलग कर लेते है. बरसीम के बीज का नमक के घोल से तुरन्त निकाल कर साफ पानी से अच्छी तरह धो लें.यदि बरसीम की किसी खेत में पहली बार बुवाई की जा रही है. तो उसे प्रति 10 किग्रा० बीज को 250 ग्राम बरसीन कल्चर की दर से उपचारित कर लें. कल्चर ने मिलने पर बरसीन के बीज के बराबर मात्रा में पहले बरसीन बोई गंई खेत की नम भुरभुरी मिट्टी मिला लेते है.

उर्वरक

20 किग्रा० नत्रजन एंव 80 किग्रा० फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से बोते समय खेत में छिड़कर कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें.

सिंचाई

पहली सिंचाई बीज अंकुरण के तुरन्त बाद करनी चाहिये. बाद में प्रत्येक सप्ताह के अन्तर पर 2-3 बार सिंचाई करनी चाहिये. इसके पश्चात फरवरी के अन्त तक 20  दिन के अन्तर पर सिंचाई करें मार्च से मई तक 10 दिन कि अन्तर पर सिंचाई करनी चाहिये. साधारणतः प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य की जानी चाहिये. एक बार में लगभग 5 सेन्टीमीटर से ज्यादा पानी नही देना चाहिये.

कटाई

कुल 4-5 कटाई करते है. कटाई 5-6 सेंमी. ऊपर से करना चाहिये.पहली कटाई बोने के 45 दिन  बाद और दिसम्बर एवं जनवरी में 30-35 दिन बाद तो वहीं  फरवरी में 20-25 दिन के अंतर पर करनी चाहिये.

बीजोत्पादन

बरसीम की 2-3 कटाई के बाद कटाई बन्द कर दें. फरवरी का अन्तिम या मार्च का प्रथम सप्ताह उपयुक्त है. अन्तिम कटाई के 10-15 दिन तक सिंचाई रोक देना चाहिये. अधिक बार कटाई करने से बीज का उपज कम एवं कमजोर होते है.

उपज

प्रति हेक्टेयर 80-100 टन हरा प्राप्त होता है. 2-3 कटाई के बाद बीज 2-3 कुन्तल/हे० एवं 40-50 टन/हे० हरा चारा मिल जाता है.

विवेक राय, कृषि जागरण 



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