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पूसा संस्थान द्वारा विकसित अधिक पैदावार एवं गुणवत्ता युक्त चना फसल तकनीकें एवं किस्म

संस्थान द्वारा लगभग सभी प्रमुख फसलों की उच्च पैदावार वाली लोकप्रिय किस्मों के संबंधित प्रबंधन तकनीकी द्वारा राष्ट्रीय खाद्य एवं कृषि उत्पादन में अपूर्व वृद्धि प्राप्त हुई है. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने आनुवंषिकी वर्धन द्वारा भारतीय कृषि रूपान्तरण में प्रमुख भूमिका निभाई है.

संस्थान द्वारा लगभग सभी प्रमुख फसलों की उच्च पैदावार वाली लोकप्रिय किस्मों के संबंधित प्रबंधन तकनीकी द्वारा राष्ट्रीय खाद्य एवं कृषि उत्पादन में अपूर्व वृद्धि प्राप्त हुई है.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने आनुवंषिकी वर्धन द्वारा भारतीय कृषि रूपान्तरण में प्रमुख भूमिका निभाई है. यह भारत वर्ष का हरित क्रांति का केन्द्र माना जाता है. जहां वैज्ञानिक प्रयासों द्वारा उच्च पैदावार वाली किस्मों का तैयार करना एवं किसानों में वितरित कर लोकप्रिय करना आदि सम्मिलित है. हरित क्रांति एवं हरित क्रांति के बाद के युग में गेहूं की बौनी किस्म और चावल की उच्च पैदावार की किस्मों द्वारा किसानों की पैदावार बढ़ी जिसके कारण वर्ष 1970 से आगे वाले दषक में देष खाद्य अनाज की फसलों की पैदावार में स्वावलम्बी हुआ.

किसानों के लिए तकनीकें

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा चना, अरहर व मूंग की जो उन्नत किस्में विकसित की गई है, असिंचित दषा की खेती में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है. ये किस्में अल्प अवधि की है तथा फसलचक्र के लिए बहुत उचित है तथा प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होने के साथ-साथ अनाज भारत में उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका रखती है. चने की पूसा-1105, 1108 व 2024 अत्यधिक स्वीकृति व उत्पादक काबुली किस्में है जबकि पूसा-362, 1103, 372 व बी.जी.डी.-72 अधिक क्षेत्र में अपनाई जाने वाली देसी किस्में हैं. संस्थान द्वारा हाल ही में पूसा 5023 (100 बीजों का भार 50 ग्राम), पूसा 3022  (काबुली) व पूसा-5028, पूसा-3043 देसी चने की किस्मों की पहचान की गई है जो अधिक उपज वाली है. इस प्रकार बढ़ी पैदावार वाली ये किस्में अच्छे तथा बड़े बीज के कारण उत्कृष्ट मूल्य भी देती है.

भारत में चना उत्पादन व क्षेत्रफल दोनों में प्रमुख स्थान रखता है. दालों की खेती के लिए कुल क्षेत्रफल 31.11 मिलियन हैक्टेयर व उत्पादन 24.51 मैट्रिक टन है, जिसमें चने का योगदान क्रमषः 10.76 मिलियन हैक्टेयर व 11.16 मैट्रिक टन है. भारत में चने की खेती अपने फसली मौसम के दौरान बहुत से जैविक व अजैविक दबावों से गुजरती है. जैविक दबावों में प्रमुख फ्यूजेरियम विल्ट (उक्टा), ऐस्कोकाईटा ब्लाईट, जड़ सड़न, विषाणु व हेलीकोवर्पा आर्मीजेरा (छुपकर खाने वाली इल्ली) शामिल है. अजैविक दबावों में सूखा उच्च व निम्न तापमान है. भा.कृ.अनु.सं. पूसा के उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के उत्पादन के लिए स्टेट फार्म कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एस.एफ.सी.आई.) के साथ गत 20 वर्षों से निकर की सहभागिता रही है. लगभग एक मिलियन टन चने का आयात सरकारी, गैरसरकारी व अन्य संस्थानों द्वारा किया जाता है. (सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 1/2 मिलियन टन चना भारत में आयात होता है. सौभाग्य वर्ष अर्न्तराष्ट्रीय बाजारों में अधिक बड़े प्रकार के काबुली चने का व्यापार अधिक होता है. अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक बड़े काबुली प्रकार के चने के लिए अधिक मूल्य एक हजार अमरीकी डालर प्रति टन प्रस्तावित किया जाता है. जबकि मध्यम श्रेणी के काबुली चने के लिए अमरीकी डालर 600 प्रति टन व मध्यम आकार के चने की कीमत 400 से 500 डालर प्रति टन है. इस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मोटे काबुली चने की अधिक मांग है. आसपास के बाजार में चना व्यापारियों द्वारा बड़े देसी चने का मूल्य 1000 से 1500 रूपये प्रति क्विंटल प्रस्तावित किया जाता है. इस प्रकार बड़े आकार के चने के खरीदने में इसकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है जैसे- भूना चना, सब्जी के रूप में छोले, अधिक बेसन, अंकुरित चने, उबले चने, पुलाव आदि. अत्यधिक बड़ा देसी चना बहुत अच्छे लाभ के अवसर प्रदान करता है. भा.कृ.अनु.सं. में किए जाने वाले शोध कार्य इसी दिषा में किए गए हैं. इस लेख में वर्णित ‘पूसा’ की सभी किस्मों के विभिन्न स्थानों पर उनके अनुकूलन क्षत्रों में परीक्षण किए गए हैं एवं औसत पैदावार अनुकूलन क्षत्रों में अनुकूल मौसम में सर्म्पूण उन्नत कृषि विधियों को अपनाकर किए गए परीक्षणों के आधार पर दी गई है. अतः दर्शाई गई पैदावार खेती की सम्पूर्ण विधियां जैसेकि सही समय पर बिजाई, विभिन्न महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर सिंचाई, उर्वरकों का प्रयोग, निराई-गुड़ाई, पौध संरक्षण आदि को अपनाकर ली जा सकती है. वर्ष 2000 से 2018 तक अनुमोदित की गई किस्में जिनका विकास बदलते जलवायु के प्रपेक्ष में टिकाऊ खेती के लिए किया गया है तथा किसनों ने इनसे भरपूर लाभ कमाया है, का फसलवार विवरण निम्न प्रकार से हैः

तालिका-वर्ष 2000 के पश्चात जारी प्रजातियों का विवरण

चना की उन्नत उत्पादन तकनीकी (उत्तरी भारत के लिए)

सस्य क्रियाएं

बुआई का समय : समय पर बुआई 1-15 नवंबर य पछेती बुआई  25 नवंबर से 7 दिसंबर तक

बीज की मात्रा : मोटे दानों वाला चना 80-100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर व सामान्य दानों वाला चना 70-80 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर.

बीज उपचार : बीमारियों से बचाव के लिए थीरम या बाविस्टीन 2.5 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से उपचारित करें. राइजोबियम टीका से 200 ग्राम टीका प्रति 35-40 कि.ग्रा. बीज को उपचारित करें.

उर्वरक : उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी परीक्षण के आधार पर करें.

नत्रजन       20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर    100 कि.ग्रा. डाई अमोनियम फास्फेट

फास्फोरस    50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर

जिंक सल्फेट  25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर

बुआई की विधि : चने की बुआई कतारों में करें. गहराई 7 से 10 से.मी गहराई पर बीज डालें.

कतार से कतार की दूरी  30 से.मी. (देसी चने के लिए), 45 से.मी. (काबुली चने के लिए)

खरपतवार नियंत्रण : फ्लक्लोरिन 200 ग्राम (सक्रिय तत्व) का बुआई से पहले या पेंडेमेथलीन 350 ग्राम (सक्रिय तत्व) का अंकुरण से पहले 400-450 लीटर पानी में घोल बनाकर एक एकड़ में छिड़काव करें. पहली निराई-गुड़ाई बुआई के 30-35 दिन बाद तथा दूसरी 55-60 दिन बाद आवश्यकतानुसार करें.

सिंचाई : यदि खेत में उचित नमी न हो तो पलेवा करके बुआई करें. बुआई के बाद खेत में नमी न होने पर दो सिंचाई, बुआई के 45 दिन एवं 75 दिन बाद करें.

पौध संरक्षण :

कटुआ सुंडी (एगरोटीस इपसीलोन) : इस कीड़े की रोकथाम के लिए 200 मि.ली. फेनवालरेट (20 ई.सी.) या 125 मि.ली. साइपरमैथारीन (25 ई.सी.) को 400-450 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हैक्टर की दर से आवश्यकतानुसार छिड़काव करें.

फली छेदक (हेलिकोवरपा आरमीजेरा) : यह कीट चने की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. इससे बचाव के लिए या 150 मि.ली. स्पिनोसैड 45 एस सी या 125 मि.ली. साइपरमैथारीन (25 ई.सी.) को 400-450 लीटर पानी में घोल बनाकर उस समय छिड़काव करें जब कीड़ा दिखाई देने लगे. यदि जरूरी हो तो 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव करें.

 

उकठा रोग : इस रोग से बचाव के लिए उपचारित करके ही बीज की बुआई करें तथा बुआई 25 अक्टूबर से पहले न करें. फसल चक्र अपनाया जाना चाहिए.

जड़ गलन : इस रोग के प्रभाव को कम करने के लिए रोगग्रस्त पौधों को ज्यादा न बढ़ने दें. रोगग्रस्त पौधों एवं उनके अवशेष को जलाकर नष्ट कर दें या उखाड़कर गहरा जमीन में दबा दें. अधिक गहरी सिंचाई न करें.

बीज का स्रोत :

चने का शुद्ध बीज भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के निम्नलिखित संभागों / स्टेशन से सीमित मात्रा में प्राप्त किया जा सकता है.

कृषि प्रौद्योगिकी सूचना केंद्र, भा.कृ.अनु.संस्थान, नई दिल्ली, दूरभाष : 011-25841670

बीज उत्पादन इकाई, भा.कृ.अनु.संस्थान, नई दिल्ली, दूरभाष : 011-25842686

 

लेखक :

सी.भारद्वाज1, संजीव कुमार चौहान1 एवं संगीता मेहरोत्रा2

1आनुवंषिकी संभाग

2 कृषि जागरण

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें : आनुवंशिकी संभाग

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली- 110012

दूरभाष : 011-25841481

English Summary: Higher yields and quality chana crop techniques and varieties developed by PUSA Institute Published on: 27 September 2018, 07:01 AM IST

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