Editorial

सॉईल हेल्थ कार्ड योजना का कमाल : किसानों का बढा उत्पादन; आय भी बढी

सॉईल हेल्थ कार्ड योजना देश के किसानो को चार सालो में काफी फायदेमंद साबित हुई है. इस योजना का उपयोग कर मिट्टी का परीक्षण करने वाले किसानो की फसल उपाज में बढोत्तरी तो हुई है साथ में उनकी आय बढकर जीवन में सुधार आया है.

इन दिनों खंबाले में रहने वाले किसान 'भास्कर पोरजे' बहुत खूश नजर आ रहे है. हाल ही मे उन्होने अपनें खेत में पेपर मल्चिंग तकनीक का उपयोग करके उन्होने अपने खेत में टमाटर लगाएं है. यह मिट्टी के परीक्षण की वजह हुआ है, ऐसा पोरजेजी का मानना है. नासिक जिले की पश्चिम में इगतपुरी तहसिल है. यहा सालाना भारी मात्रा में याने लगभग  1800 से 2000 सेंटीमीटर तक बारीश होती है. यही कारण है की खरीफ में यहा की मुख्य फसल है चावल. एक बार चावल करने के बाद रबी सीजन में जिन किसानों के पास कुएँ या फार्म पाँड के पानी की सुविधा है, केवल वही सब्जी, हरभरा जैसी फसल कर पाते है. पर अब यहा का क्रॉप पॅटर्न कुछ बदल गया है, पोरजे जैसे किसान अब रबी में भी फसल ले कर अपना जीवन सवार रहें है.

इस अच्छे बदलाव का मुख्य कारण है ‘सॉईल हेल्थ कार्ड’. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने यह योजना गुजरात में शुरू की थी, तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे. वहा के किसानों को इसका भरपूर फायदा हुआ था. खेती में कम लागत में जादा उपज मिलती थी. बाद में इस माडेल की देशभर में चर्चा हुई. जैसे ही २०१४ में भाजपा की सरकार बनी और नरेंद मोदी प्रधानमंत्री बन गए, उन्होने देशभर के किसानों के हित में एक बडा निर्णय लिया, ‘सॉईल हेल्थ कार्ड का’. दिखने में तो यह योजना छोटी लग रही थी, पर अब चार सालों बाद बहुत ही उपयोगी साबित हुई.

खेत की मिट्टी और पानी, दोनों चीजे किसानों की सबसे बडी इन्वेस्टमेंट मानी जाती है. मिट्टी में कही तत्व मौजूद रहतें है, जिनका सीधा असर उपज पर होता है. जैसे की नाइट्रोजन, फॉस्फ़ोरस, पोटॅशिअयम जो आम तौर पर एनपीके के नाम से जाने जाते है. इसके सोडियम, मॅग्नेशियम, कॉपर, फोरस जैसे और भी मायक्रोन्यूट्रीयंट जमीन में होते है. जिनकी मात्रा सही ढंग में होनी जरूरी होती है. अलावा जमीन में मौजूद आरगॅनिक कार्बन और जमीन का पीएच सही मात्रा में होना जरूरी होता है. आरगॅनिक कार्बन की बात करें, तो उसका सीधा असर उपज पर होता है. अगर इस तत्व की कमी हो तो उपज में भी कमी आती है और किसानों की मेहनत और खेत में लगाए पैसों पर पानी फेर जाता है. पर अगर किसान अपनी मिट्टी की सही ढंग से लॅबरोटरी से नियमित रुप में जांच कर उसका रेकार्ड रखता है, और फिर उसी हिसाब से खेतों में खाद (फर्टीलायजर) देता है, तो उसके परिणाम फसल पर अच्छे तरह से दिख जातें है.

इगतपुरी से लगभग 7 किलोमीटर पर बसे खंबाले के किसान 'भास्कर पोरजे' की शुरू में यही समस्या थी. उन्होने अपने जीवन में कभी मिट्टी के परीक्षण या सॉईल टेस्टींग के बारे में विचार ही नही किया. पर चार साल पहले तहसील के एग्रीकल्चर अधिकारीयों ने उन जैसे हजारों किसानों को सॉईल टेस्टींग कार्ड के बारे में जानकारी देकर प्रेरित किया. उसके बाद पोरजे और उनके गाँव के कई किसानों ने अपनी मिट्टी का परीक्षण करवा लिया. इस बारे में भास्कर पोरजे बताते है कि शुरू में मैं केवल परंपरागत चावल की खेती करता था. उपज भी जादा नही मिलती थी. किंतु मिट्टी के परीक्षण के बाद मुझे पता चला की मेरी खेती के मिट्टी का सेंद्रीय कार्बन सामान्य लेवल से नीचे चला गया है. इसके साथ ही मुझे यह भी पता चला की मेरी खेती में एनपीके और मायक्रोन्यूट्रीयन्टस्‌ की मात्रा क्या है? यह जानकारी मेरे लिए कुछ सदमें जैसी थी. फिर मैने कृषी विशेषज्ञो के सलाह मशवरा कर, सबसे पहले सेंद्रीय खाद (organic manure) मोटे तौर पर खेत में डाली. परिणाम यह हुआ की जमीन में आरगॅनिक कार्बन तो बढा ही साथ में मिट्टी की पानी जमा करने की क्षमता भी बढी. इसी साल इसका बढीया परिणाम मुझे मिला. चावल की उपज में 4 क्विंटल की बढोत्तरी हुई. पहले मैं बिना जाने कैमिकल फर्टीलायजर उपयोग करता था. उस के लिए खर्चा भी ज्यादा आता था. अब मै जितना जरूरी है उतना ही खाद का प्रयोग करता हूँ, फसल पर मुझे जो लागत आती थी वह भी अब कम हुई है.

चावल की फसल में बढोत्तरी होने के बाद पोरजे का आत्मविश्वास बढा और फिर उन्हे यह बात भी पता चली की अब खेत की मिट्टी अच्छी तरह से पानी पकड कर रख सकती है, उपर से जादा मात्रा में पानी देने की आवश्यकता नही. चावल की खेती में जो ज्यादा पैसे मिले वह उन्होने इस सीजन में टमाटर की खेती में लगाये है. पानी की लागत कम हो इसके लिए पेपर मल्चिंग जैसे आधुनिक तकनीक का प्रयोग उन्होने किया है. जिस जगह कभी चावल के सिवाय दूसरी फसल नही ली जाती उसी जमीन में अब यह किसान भाई रबी सब्जी ऊगा रहें है. आने वाले दिनों में उनके परिवार के आय में बढोत्तरी होगी और जमीन का पूरा उपयोग होगा. पोरजे मानते है की यह सॉईल हेल्थ कार्ड की एक बहुत बडी उपलब्धी है. इस योजना के लिए वह सरकार को धन्यवाद भी देते है.

कांचनगाव के हरिश्चंद्र गवाने की कहानी कुछ ऐसी ही है. इगतपुरी 13 किलोमीटर की दूरी पर बसे इस गाँव प्रमुख फसल भी चावल ही है. पर अब गवानें नें इस सीजन में पेपर मल्चिंग तकनीक का उपयोग करके अपनें खेत में खीरा (ककडी cucumber) लगाया है. उन्हे आशा है की इससे उन्हे खूब फायदा मिलेगा.

यह सब हेल्थ कार्ड की करनी है भाई,’ गवाने हसते हसते कहते है. उन्होने कहा की मुझे खाद के प्रयोग के बारे में बिल्कुल भी जानकारी नही थी. सालो-साल मैं बिना सोचें फसल को खाद देता रहा. जैसे ही मैं तीन साल पहले ‘सॉइल हेल्थ कार्ड’ की योजना में भाग लिया, तो मेरी जिंदगी ही बदल गई. मिट्टी की परीक्षा के बाद मुझे मालूम हुआ की अपने खेत में किन चीजों की कमी है, फिर कृषि अधिकारीयों की सलाह से नाप तोल कर फसल को खाद दी. उसका बेहतरीन परिणाम देखने को मिला. चावल की लोंबी बहुत बडी उग आई और उसमें दाने भी जादा भरें थे. चावल (धान) की फसल में फंगस और जसीड जैसे कीट होते थे (pests and diseases), पण सही मात्रा में खाद (उर्वरक) का प्रयोग करने के बाद उनका प्रमाण कम हो गया और उत्पादन में बढोत्तरी हुई.

इस योजना के परिणामों के बारे मे यहा के जिला मृदा सर्वेक्षण व मृदा परीक्षण अधिकारी छगन पाडवी ने बताया की यह योजना किसानों को काफी उपयुक्त साबित हुई है. मिट्टी के परीक्षण के बाद यहा के किसानों को पता चला की उनकी जमीन में मायक्रो न्यूट्रीयंटस्‌, एनपीके और जैविक कार्बन की मात्रा कितनी है? उसके अनुसारही किसान अब खेती करने लगे है. इस योजना के चार सालो में किसान के जीवन का स्तर बढा है. उनकी फसल की उत्पादन मे बढोत्तरी देखी गई है. नासिक जिले की बात करें तो अब तक तीन लाख, 77 हजार 745  किसानों के सॉईल हेल्थ कार्ड यहा बने चुके है. इस योजना के तहत अब तक मिट्टी के 91 हजार 805 नमुनों का परीक्षण किया गया है. अकेले इगतपुरी तहसिल की बात करें तो इस ब्लॉक के 65 गावों के 19 हजार किसानों ने इस योजना का फायदा उठाया है.

महाराष्ट्र का नासिक जिले की पहचान राज्य का ‘कॅलिफोर्निया’ के तौर पर जानी जाती है. अंगूर और प्याज के लिए यह जिला पूरे विश्व में मशहूर है. नासिक, निफाड, दिंडोरी इन तहसिलों में ज्यादातर किसान अंगूर की खेती करते है. नासिक के पश्चिम में इगतपुरी, त्र्यंबकेश्वर, पेंठ, सुरगाना में मुख्य फसल चावल (धान) ही है. दूसरी ओर नासिक के पूर्व मे प्याज, अनार और सब्जीयों जैसी फसल उगायी जाती है. खास कर के नासिक जिले का अंगूर का किसान कृषि के ज्ञान के बारे में पूरे देश मे आगे और अपडेटेड समझा जाता है. यही कारण है की यहा का लाखो टन अंगूर यूके, और यूएस में एक्सोर्ट होता है. सॉईल हेल्थ कार्ड योजना के अलावा नासिक एरिया में अंगूर के कई किसान प्राइवेट मिट्टी परीक्षण लेब्स का भी उपयोग करते है. दिंडोरी तहसिल के गणोरवाडी में बसे अंगूर के किसान बालासाहब पिंगल बताते है की अंगूर की खेती बडे ध्यानपूर्वक की जाती है. साल में तीन बार हम मिट्टी के मायक्रो न्यूट्रीएंटस्‌ का परीक्षण करतें है. उसके लिए प्राइवेट फर्म और लेब से हम लोग मशवरा लेते है. साथ मे एनआरसी ग्रेप के अधिकारी भी हमे मार्गदर्शन करते है.

ग्रॅज्युएशन तक पढे हुए पिंगल अंगूर खेती में मास्टर जाने जाते है. उन्होने बताया की पिछले 17 सालों से वह अंगूर की फसल ले रहे है. कृषी के आधुनिक तकनीक का उपयोग वह करते है. मिट्टी का परीक्षण किसानों के लिए बहुत जरूरी है, यह किसानों की पहली प्रायोरिटी होनी चाहिए ऐसा उनका मानना है. मिट्टी परीक्षण का सही प्रयोग करने के बाद ही आज मुझे यह सफलता हासिल हुई ऐसा उनका कहना है. बालासाहब ने जब खेती की शुरूआत की तो उनका परिवार 2 एकड में अंगूर की फसल लेता था. अब उनके सक्सेस का रेशो इतना बढा है की उनका परिवार ५० एकड में अंगूर की फसल लेता है. इसके अलावा सब्जी और गेहूँ की खेती वह करते है. आज उनका खुद का बंगला है, कार और ट्रॅक्टर है, बच्चे अच्छे स्कूल में शिक्षा पा रहे है. यह सभी खेती में सही तकनीक का प्रयोग करने से हुआ है, और उसकी नीव है सॉईल टेस्टींग ऐसा उनका मानना है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संकल्पना से शुरू हुई यह योजना करोडो किसानों को उपयोगी साबित हुई है. सन 14-16 में इस योजना के लिए केंद्र ने 13 हजार 642 लाख रुपयों का प्रावधान रखा था. फिर 16-17 में उसमें बढोत्तरी कर के 26 हजार 346 लाख रुपये कर दिया गया. शुरू से अब तक इस योजना पर केंद्र सरकार २२ हजार 262 लाख रुपयें का खर्च कर चुकी है. और भी पैसे खर्च करना बाकी है. कृषी मंत्रालय के माध्यम से इस योजना का कार्यान्वयन किया गया है. सॉईल हेल्थ कार्ड का एक पोर्टल भी है, जहा किसानों को रजिस्ट्रेशन करना होता है. फिर कृषि विभाग के कर्मचारी उनके मिट्टी का नमूने का परीक्षण करते है और रिजल्ट ‘सॉईल हेल्थ कार्ड’ के जरिए किसानों को मिलता है. साथ में फसल के बारे में सलाह भी मिलती है, जिसके जरिए किसान अपने खेती में उचित बदलाव कर सके.

आज तक पहले चरण में पूरे देश के 10,73,89,421 किसानों को सॉईल हेल्थ कार्ड दिया गया है. दुसरे चरण में 12,06,89,329 किसानों ने ‘सॉईल हेल्थ कार्ड’ अपनाया है. कुल मिलाकर अब तक 22,80,78750 .किसानों को इस योजना का फायदा हुआ है. जिसके जरिए किसानों का उपज बढ गया और लागत कम होने की वजहसे आय में भी वृद्धी हुई है.

पंकज जोशी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है) 

(दूरभाष : 8888805041)

Email : mr.pankajjoshi@gmail.com



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