1. सम्पादकीय

भारत में लोकतंत्र है या बिजनेस तंत्र

भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है.17वीं लोकसभा यानी लोकसभा चुनाव 2019 की तारीखों की घोषणा चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील आरोड़ा ने 10 मार्च को प्रेस कांफ्रेंस कर जानकारी दी. इस बार चुनाव सात चरणों में होगा. पहले चरण की वोटिंग 11 अप्रैल और अंतिम चरण की वोटिंग 19 मई को होगी और चुनाव नतीजे 23 मई को आएंगे. आज हम लोकसभा चुनाव की बात न करके इसके पीछे हो रही चुनावी फंडिंग की बात करेंगें क्योंकि भारत का लोकतंत्र एक बिजनेस तंत्र बन चुका है. इसकों मैं नहीं ADR की रिपोर्ट कहती है.

आपको जानकर हैरत होगी की आज का लोकतंत्र रूपयों के बीच लिपटा हुआ है. जब भारत में पहली बार 1952 में चुनाव हुआ था तो उस समय सरकार ने 10 करोड़ रूपये का बजट सिर्फ़ चुनाव आयोग को चुनाव करवाने के लिए दिया था तो आप कल्पना कर सकते हैं कि उस समय कितनी बड़ी रकम थी. ये पूराने समय की बात हुई. अब हम बात करते है इस समय राजनीतिक पार्टियों को फंडिंग के रूप में कितनी बड़ी रकम मिलती है और ये फंडिंग क्यों और किसे दी जाती है. फंडिंग देने वाले को क्या फ़ायदा देती है राजनीतिक पार्टियां ये एक बड़ा सवाल है. चलिए इस गुत्थी को ADR की रिपोर्ट के सहारे समझने की कोशिश करते हैं.

अब हम लौट चलते हैं साल 2014 के लोकसभा चुनाव के तरफ, उस समय बीजेपी से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी थे. कॉरपोरेट घरानों ने साल 2014 में अकेली बीजेपी को 85 करोड़ 37 लाख रूपये दिए थे. अगर वहीं हम बात करें साल 2014-15 के फरवरी महीने में चुनाव फंडिंग के रूप में 1 अरब 77 करोड़ 65 लाख रूपये कॉरपोरेट के तरफ से दिये जाते है. ये पैसे उस समय दिये जाते हैं जब सरकार बनी भी नहीं होती और वोटिंग चल रही होती है. अब वहीं बात करें साल 2015-17 के बीच का तो 6 अरब 36 करोड़ 88 लाख रूपये दिये जाते है. क्योंकि इसी समय यूपी में चुनाव होने वाले होते है. साल 2017-18 के बीच 12 अरब 96 करोड़ 5 लाख रूपये सिर्फ चुनावी फंडिंग राजनीतिक पार्टियो को दी जाती है. ये सब आकड़े चुनाव आयोग के पास लिखित रूप में मौजूद भी है. इसके अलावा जो फंडिंग अप्रत्यक्ष रूप से दी जाती है उनकी बात नहीं की जा रही है.

ऐसा नहीं है ये केवल एक ही पार्टी को चुनावी फंडिंग दी जाती है इसमे बीजेपी, कांग्रेस, सपा, बसपा, आप सब पार्टियां सामिल है. अगर हम बात करें साल 2017-18 की बात करें तो राजनीतिक दलों को एक साल में कॉरपोरेट की तरफ से 469 करोड़ 80 लाख रूपये दिये गए. बीजेपी को दिये गए चुनावी फंडिंग की बात करें तो 24,88,46,00,000 रूपये दिये इसके अलावा सभी पार्टियों को दिये गये चुनावी फंड 19,64,58,00,000 रूपये. इन आकड़ों को देखें तो साफ पता चलता है कि सभी पार्टियों को दिये मिले फंड से कई गुना ज्यादा फंड अकेले बीजेपी करते है.

अब आपके मन में ये सवाल उठ रहा होगा आख़िर ये फंडिंग क्यों करते हैं, क्या ज़रूरत है ये करने की वैसे तो कोई एक रूपया भी किसी को नहीं देता. तो इस बात का जबाब हम आपको बताते हैं. बीजेपी को चार साल में मिले 6 खरब और उनको (कार्पोरेट) 60 खरब एनपीए खाते के सहारे ही दे दी. डीएलएफ़, भारतीय एलटेक टाटा स्टील, इंडिया वुल्स हाउसिंग फाइनस लिमटेट, हीरो मोटर कार आदि कंपनियां हैं जो पार्टियो को फंडिंग करती है.

अब इस सब को देखकर आप समझ सकते हैं कि इस बार का चुनाव कितना महंगा होने वाला है और कौन किसको फंडिंग कर रहा है. 2019 का चुनाव कितने में होने वाला है. कारपोरेट लोग उन्हीं को ज्यादा फंडिंग देते है जिनके पास सत्ता होती है. अब आप खुले तौर पर कह सकते हैं कि ये लोकतंत्र नहीं बिजनेस तंत्र हो चला है.

इन्हीं फंडिंग के सहारे प्रिंट मिडिया, डिजिटल मिडिया, सोशल मिडिया आदि में विज्ञापन दिया जाता है या ऐसा कह सकते हैं कि उन्हें खरीद लिया जाता है. आज ये पार्टियों को फंडिंग करते हैं सत्ता में आने के बाद इन लोगो को सरकारें खुली तौर पर और मनमानी ढंग से काम करने का मौका दे देती है. ऐसा करने से एक तरफ राजनीतिक दलों का फायदा और दूसरी तरफ फंडिंग करने वालों का भी फायदा हो जाता है. इन सब के बीच कौन पिसता है - किसान, आम आदमी, युवा, बेरोजगार आदि, आप आगे समझदार है.    

English Summary: Now there is democracy in India or business system?

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