Editorial

काश ! गंगा को मां नहीं सिर्फ नदी मान लेते हम लोग !

राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते..! कल जब इस गीत को सुना तो इच्छा हुई कि फिल्म भी देख ली जाए. संडे का दिन था, इंटरनेट की कोई सीमा नहीं थी. सो देख ली ! मां की कसम दुख हुआ. मुझे भी और मां को भी, क्योंकि हम दोनों ने साथ बैठकर देखी. इस फिल्म में एक ही बात निकलकर आई और वो है - सम्मान. सम्मान हर उस चीज़ का जिसका हम सम्मान करते हैं. कहने का मतलब ये है कि सम्मान करने से अच्छा है सम्मान न करें. बस, अपने कर्तव्य का पालन पूरी ईमानदारी से करें. दरअसल इस कंट्री में हो क्या रहा है न, कि हर चीज की पूजा की जा रही है. चाहे वो औरत हो या गंगा, लेकिन फिर उसी चीज़ को धर्म की आड़ में दूषित किया जा रहा है और यह आज नहीं हो रहा. सालों-साल से यही चलता आ रहा है. एक तरफ काली की पूजा और दूसरी तरफ औरत का दामन एक तरफ गंगा को मां का दर्जा और दूसरी तरफ गटर जैसी गंगा. जले-मुर्दे की राख जाएगी तो गंगा में, मुंडन के बाल जाएंगे तो गंगा में, कपड़े-लत्ते धुलेंगे तो गंगा में और हद है कि मल-मूत्र भी जा रहा है तो गंगा में.

तो क्या हम अपनी मां के साथ भी यही व्यवहार करते हैं ? शायद कुछ लोगों को गुस्सा आए. हालांकि शर्म आनी चाहिए. इस देश में हर चीज़ को धर्म के साथ जोड़कर महान बना दिया जाता है और फिर उसी महानता की आड़ में कुकर्म किए जाते हैं. आवाज़ उठाने वाला और प्रश्न करने वाला या तो नास्तिक है या गैर-मज़हबी, जो आपके धर्म को नुकसान पहुंचा रहा है. लाखों, ओ सौरी ! करोड़ो अभी तक गंगा की सफाई के लिए पोते जा चुके हैं लेकिन कुछ नेता डकार गए और कुछ अधिकारी. अच्छा ! एक बात और है - हिसाब भी नहीं मांगना है, नहीं तो आप जान और मान दोनों से जाएंगे.

हमसे अच्छे तो गोरे हैं. वो नदी को न तो मां मानते हैं, न मौसी और न मामी. मानते हैं तो सिर्फ पानी और उसी को पीने योग्य बना कर रखते हैं. हां, धर्म का भी इससे कोई लेना देना नहीं होता.

लंदन की थेम्स नदी और गंगा नदी की तस्वीरों को अगर आप साथ में देखेंगें तो दिल यही करेगा कि थेम्स अपनी हो जाए क्योंकि दूसरी तरफ तो काला नाला बह रहा है. साला कोई पैदा होगा तो गंगा गंदी करेंगे, कोई जीएगा तो गंगा गंदी करेंगे और तो और कोई साल मर जाए तो उसकी नैय्या भी गंगा ही पार लगाएगी. पर अब सवाल ये है कि गंगा को कौन पार लगाएगा ? भगवान तो आएंगे नहीं, क्योंकि अगर उन्हें ही आना होगा तो हमारी ज़रुरत क्या है. हम सब में भी तो उसी का अंश है. लेकिन वो ईश्वरीय अंश अब विषैला दंश बन गया है. जिसके ज़हर से गंगा भी अब गंगा नहीं रह गई है.

गंगा कहे पुकार के

निश्चल जल धार के

गर अभी नहीं संभले

तो कल भी मिलेगा उधार से...



Share your comments