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खाद्य तेल आयात बढ़ने से मिलेगी राहत

तेल प्रसंस्करण में मिलने वाले मार्जिन में तेजी आने से देश का कच्चा खाद्य तेल आयात 5 महीने के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया है। इससे घरेलू खाद्य तेल रिफाइनरियों को बड़ी राहत मिली है। वैश्विक बाजारों में कच्चे पाम तेल की कीमतें सितंबर माह में 25 डॉलर कम होकर 551 डॉलर प्रति टन पर आ गईं जिससे भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसका आयात करना आसान हो गया। हालांकि प्रसंस्कृत तेल की कीमतें 578 डॉलर प्रति टन पर स्थिर बनी हुई हैं। प्रमुख उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स

एसोसिएयन वी.बी. के कार्यकारी निदेशक (एसईए) मेहता करते हैं, 'कच्चे तेल का प्रसंस्करण करने वाली रिफाइनरी काफी कम मार्जिन पर काम करती हैं। इसलिए कच्चे पाम तेल और प्रसंस्कृत तेल के बीच एक टन पर 25 डॉलर का अंतर घरेलू रिफाइनरियों के लिए राहत भरी खबर है जिससे कच्चे पाम तेल के आयात की राह मजबूत होगी।

 

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ये है देश में तेल आयात का आंकड़ा

एसईए द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार सितंबर माह में भारत का वनस्पति तेल आयात 14.2 लाख टन रहा जो अगस्त माह के 14.7 लाख टन से थोड़ा कम है। 14.2 लाख टन वनस्पति तेल आयात में से पाम तेल की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत रही जो मार्च 2018 के बाद सबसे अधिक है। सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों और दूसरे तेल की हिस्सेदारी केवल 35 प्रतिशत रही जो मार्च 2018 के बाद सबसे कम है। हालांकि नवंबर 2017 से सितंबर 2018 के बीच कुल वनस्पति तेल आयात 137.7 लाख टन रहा जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 142.7 लाख टन था। घरेलू स्रोतों से कम उत्पादन और उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए भारत सालाना लगभग 155 लाख टन वनस्पति तेल का आयात करता है। 

वनस्पति तेल आयातों में आई तेजी

उद्योग के एक विशेषज्ञ का कहना है, 'रुपये में गिरावट और पहले वनस्पति तेल के ऑर्डर रुके होने के कारण अगस्त और सितंबर माह में वनस्पति तेल आयात में तेजी आई है।' भारत के कुल आयात में पाम तेल की बड़ी भागीदारी रही है। पिछले 2 महीनों में कच्चे पाम तेल और प्रसंस्कृत तेल के बीच कीमतों का अंतर बढ़ा है जिससे घरेलू रिफाइनरियों ने कच्चे पाम तेल का आयात बढ़ा दिया है। वैश्विक बाजारों में अधिक आपूर्ति और भारत से कम मांग के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें पिछले एक साल में 11 से 25 प्रतिशत की गिरी हैं। हालांकि रुपये में 15 प्रतिशत तक की गिरावट के चलते आयात महंगा हुआ है। 

किशन अग्रवाल, कृषि जागरण



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