मिलिए मेवालाल से, जिनके एक्सपेरिमेंट ने समाज में उनकी अलग पहचान बनायीं...

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों कि हार नहीं होती  यह काहावत तो बचपन में सबने सुनी होगी लेकिन इसको सच कर दिखाया उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर के रहने वाले मेवालाल ने जो सदैव अपनी बेटियों से कहते है कि फिजिक्स,कैमिस्टरी,मैथ्स नही दुनिया को पढ़ो और यही वज़ह है कि आज वो पूर्वांचल ही नही देश भर के किसानों के लिए एक आर्दश बन के उभरे है। उन्हे हमेशा से ही कुछ अलग करने का ज़ज्बा था। जिसकी प्रेरणा उन्हे लखनऊ में एक कूड़े के ढेरो से मिली और उन्होने कचरा प्रबंधन करने का निर्णय लिया।

मेवालाल कूड़ा उठाकर उसका खाद बनाने लगे दिनोदिन किसानों कि बढती समस्यांए जैसे जमीन बंजर होना,मिट्टी कि उर्वरा शक्ति खत्म होना। इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए मेवालाल ने खेत कि पुरानी परिपाटी, पैदा हुई समस्याओं और समाधानो पर जानकारी जुटाना और पढना शुरु किया। तब उन्हे खेत मे केंचुए खत्म होने की बात पता लगी बस इसके बाद से केंचुए वापस कैसे लाए जाए इस प्रशन का जव़ाब ढूढ़ने में लग गए।

केंचुए वापस लाने का उपाए ढूढंते-ढूढंते साथ ही कचरा व दूसरे खेतों में उगती खर पटवार को हटाने के लिए उन्होने एक प्रयोग किया। खेतों से घास-फूस और खर पतवार को उखाड़कर घर लाए फिर घर के बयो कचरे को एकत्रित करके टैंक में भर दिया और उसमें पानी डाल दिया लगभग 15 दिन बाद वह गलकर पानी बन गया। इस पानी को नाम  दिया गया जैविक लिक्विड फर्टिलाइज़र (तरल खाद) इस तरल खाद को मेवालाल ने अपने खेतो में छड़कना शुरु किया।

कुछ ही दिनों में मेहनत रंग लाई प्रयोग सफल होने लगा। बढ़वार बढने के साथ-साथ किडे-मकौड़े ने फसल को कम नुकसान पहुंचाया। मेवालाल ने यह खुशी और किसानों के साथ बांटनी चाही और दूसरे किसानों को भी ऐसा करने की हिदायत दी। लेकिन किसानो ने कोई रुचि नहीं  दिखाई इसके बाद मेवालाल ने अपने घर में ही तरल खाद बनाकर किसानो को मुफ्त में बांटना शुरु किया कई वर्षो कि मेहनत के बाद आखिरकार किसानों को इसका मह्त्त्व समझ में आने लगा और वे भी अपने घरो में बेहद सरल तकनीक से बनने वाला जैविक लिक्विड फर्टिलाइज़र (तरल खाद) बनाने लगे।

पूर्वांचल समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों मे किसान आज लिक्विड फर्टिलाइज़र का इस्तेमाल कर रहे है।अंबेडकर नगर के अलावा निन्दुरा गांव,आसपास के इलाके जैसे सहारनपुर,गोरखपुर,रिह्नद,बारांबकी,प्लामू,बल्लारपुर आदि के किसान, नगर निगम और कई कंपनिया आज तरल खाद बनाने के लिए उनसे सहयोग मांगती है। गीले खाद का छिड़काव करने से फायदा यह हुआ कि केंचुआ फिर से पैदा होना शुरु हो गया।

लबे समय से रसायनिक यूरिया आदि जैसो के इस्तेमाल से ज़मीन और मिट्टी कि गुणवत्ता क्षीण होती जा रही है। जिसके कारण केंचुओ का बढ़ना कम हो जाता है। इससे मिट्टी कि ऊर्वरा शक्ति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। ऐसे में केंचुए मिट्टी  की नमी बरकरार रखने में मदद करते है।

रासयनिक और यूरिया खादो के चलते खाने में 93 फीसदी नाईट्रेट और आर्सेनिक एसिड़ बढ़ गया है। जो स्वास्थय  के लिए हानिकारक है। एसे में जैविक खेती से शुद्ध अनाज और फल,सब्जियां मिल रहे है।

तरल खाद बनाने कि विधि

एक कन्सतर में(जिसमें टोंटी लगी हो) नीम,पीपल,बबूल,बेर,अन्य कोई भी पेड़,बेल,बायो वेस्ट(कचरा) सब्जियों के पत्ते घास-फूस,हरी पत्तीयां,हरी घास,गांजा,खर पतवार को ड़ाल देते है। ताकि इससे कचरे को सड़ने और पानी बनने में सहायता मिले कन्सतर को 15 दिन तक बंद कर दिया जाता है। साथ ही टोंटी में कोई बोतल या कनस्तर लगाया जाता है आप जिससे पानी रिसकर  भरता रहता है। कुछ दिन में ही देखेंगे कि बोतल में पानी भरें। इसमें से 1 लीटर तरल खाद 30 लीटर पानी में मिलाकर खड़ी फसल या मिट्टी पर छिड़काव कर रहे हैं।

पूर्वांचल के किसानों का कहना है कि इस गीले खाद के छिड़काव से फसल पर कीड़े भी नहीं लग रहा है। पिछला कुछ सालों में 25-30 प्रतिशत उत्पादनबढ़ गया है। वैसे 50-60 प्रतिशत यूरिया आदि कैमिकल फर्टिलाइजर या रासायनिक खाद की खपत कम हो गया है। एक तरह से जैविक खेती हो रही है।

पिछले साल ही आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक भी मेवाल की संस्था मुस्कान ज्योति से जुड़े हैं। आईआईटी कानुपर के वैज्ञानिक खाड़ी पर तरल खाद पर काम कर रहे हैं और अन्य अन्य विकल्प खोज रहे हैं।

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