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कम अवधि में तैयार जामुन की यह किस्म देती है लाखों का फायदा

कृषि पेशा है धैर्य का। जिस व्यक्ति ने धैर्य के साथ इस पेशे में कदम रखा उसने परिणामस्वरूप मुनाफा अर्जित किया है। समय के अतिरिक्त मजदूरी, आर्थिक निवेश और जुनून भी इस पेशे के लिए बेहद जरूरी हैं। किसानों की भीड़ में सफल किसानों को उनकी सकारात्मक सोच अलग पहचान देती है क्योंकि खेती करने के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाया जाता है। ऐसे में यदि कोई तरीका विफल होता है तो सफल किसान कभी हार मानकर नहीं बैठता बल्कि वो निरंतर प्रयास करता रहता है। कहा भी जाता है कि प्रयास कभी विफलता का कारण नहीं होते बल्कि प्रयास करना बंद करना हमें सफल नहीं होने देता। यही कारण है कि महान विचारकों ने भी कहा है कि प्रयास करते रहना चाहिए अंत में परिणाम के रूप में सफलता जरूर मिलेगी। इन्हीं विचारों को आत्मसात किया है तमिलनाडु के नीलाकोट्टाई तालुक के डिंडुगल जिले के सी. जयकुमार ने।

सी. जयकुमार जामुन की खेती करते हैं। उनके पास 10 एकड़ जमीन है जिस पर से 1.5 एकड़ जमीन पर वे जामुन की खेती करते हैं और शेष जमीन पर वे आंवला की खेती भी करते हैं। ज्ञात रहे कि जामुन के पेड़ 30-35 फीट लंबे होते हैं और पौधरोपण के बाद वे 60-70 वर्षों तक फल देते हैं।

पेड़ों की छंटाई है जरूरी

जयकुमार ने अपने अथक प्रयासों से जामुन के बागों की समय-समय पर छंटाई कर पेड़ों की लंबाई को 18-20 फीट तक मेंटेन किया है। वे बताते हैं कि समय-समय पर पेड़ों की छंटाई जरूरी है क्योंकि जामुन के पेड़ लंबे होने की वजह से फल तोड़ने में मुश्किल होती है। लंबे पेड़ों पर न चढ़ पाने के कारण फल तोड़ने के लिए इसकी शाखाओं को अच्छे से हिलाना होता है ताकि पके फल स्वतः ही नीचे गिर पड़ें। ऐसे में शाखाओं के टूटकर गिरने व फलों के नीचे गिरने पर खराब होने का खतरा रहता है। यही नहीं इससे किसानों को जामुन के सही दाम भी नहीं मिल पाते हैं।

बूंद सिंचाई: बेहतर जरिया

जयकुमार कहते हैं कि मैंने आंध्र प्रदेश की नर्सरी से जामुन की 80 सीडलिंग्स खरीदी थीं और उन्हें 28 फीट की दूरी अर्थात् 8 मीटर x 8 मीटर की दूरी पर लगाया था। सभी पौधों की सिंचाई के लिए उन्होंने बूंद सिंचाई तकनीक को अपनाया। चार वर्ष बाद पेड़ ने फल-फूल देना शुरू कर दिया और सबसे पहले मैंने प्रत्येक पेड़ से 2 किलो जामुन प्राप्त किए। समय के साथ पैदावार बढ़ती गई और आठ वर्षों के बाद मैंने प्रत्येक पेड़ से 40-50 किलो की उपज प्राप्त की। आपको बताते हुए मुझे बड़ा ही गर्व हो रहा है कि आज से 11 वर्ष पहले मैंने जामुन का पौधरोपण किया था और आज मुझे इन पेड़ों से 60 किलो जामुन प्रति पेड़ प्राप्त हो रहे हैं।

लागत कम

इस बगिया को बनाने में मेरी लागत बहुत ही कम लगी। मैंने पौधरोपण से लेकर अब तक सिर्फ जैविक खाद जैसे खेतों की खाद, हड्डियों के चूर्ण से बनी खाद, पोल्ट्री से प्राप्त खाद, चीनी मिलों से प्राप्त मिट्टी अथवा बायोफर्टिलाइजर्स जैसे एजोस्पीरिलम, फॉस्फोबैक्टेरिया, वर्मीकम्पोस्ट व पंचगव्य का ही इस्तेमाल किया।

80 पेड़ देंगे 4250 किलो जामुन

जयकुमार का कहना है कि पेड़ों से प्राप्त जामुनों को हम ट्रे में एकत्रित करते हैं और उन्हें विभिन्न फलों की दुकानों, मंडियों व डिपार्टमेंटल स्टोर्स पर वितरित करते हैं। जैविक खादों के इस्तेमाल से जामुन की खेती में अधिक उपज के साथ-साथ जामुन खाने में स्वादिष्ट व प्रत्येक फल का भार 15 ग्राम होता है। उन्होंने बताया कि उनके द्वारा उगाए गए जामुनों की बाजार में काफी मांग है।

उन्हें आशा है कि वे इस वर्ष में अपने सभी 80 जामुन के पेड़ों से 4250 किलो जामुन प्राप्त करेंगे। वे इन जामुनों को 150 रूपये किलो बाजार में बेचते हैं और उन्हें इससे दो महीने में ही 6 लाख रूपये की आमदनी प्राप्त होती है। जयकुमार अपनी 6 लाख रूपये की आमदनी में से एक लाख रूपये जैविक खाद बनाने, पैदावार लेने, खेतों के रख-रखाव, पैकिंग व ट्रांसपोर्ट में लगा देते हैं जिससे उन्हें सीधे तौर पर 5 लाख रूपये का मुनाफा होता है।

दूसरे के लिए करते हैं बीज तैयार

अन्य किसान भाइयों की मदद के लिए जयकुमार स्वयं जामुन के बीज तैयार करते हैं। ऑर्डर के आधार पर वे किसानों को जामुन के बीज उपलब्ध करवाते हैं। वे बताते हैं कि उन्हें गुणवत्तायुक्त बीज तैयार करने में कम से कम 5-6 माह का समय लगता है।

रख-रखाव में खर्च कम

जयकुमार के अनुसार खेतों के रख-रखाव में बहुत कम खर्च आता है। वे अन्य किसान भाइयों से आग्रह करते हैं कि वे भी अपने खेतों में जामुन लगाकर अधिक पैदावार व दोगुनी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। यही नहीं वे समय-समय पर अन्य किसान भाइयों को जामुन की खेती करने के गुर भी सिखाने के लिए तैयार हैं।

वैल्यू एडीशन के लिए लिया प्रशिक्षण

जयकुमार ने स्वयं को जामुन की खेती तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उन्होंने अपने खेत व आमदनी में वैल्यू एडीशन करने के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रॉप प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी, थंजावुर में प्रशिक्षण प्राप्त किया कि किस तरह से वे जामुन के साथ आंवला की खेती कर अधिक आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। यही नहीं उन्होंने इसके अतिरिक्त अपने खेत में खाद्य प्रसंस्करण यूनिट की स्थापना भी की है जिसके चलते वे आंवला जूस, कैंडी, स्क्वैश आदि प्रसंस्कृत करने का काम भी करते हैं।

प्रसंस्करण है जरूरी

वे मानते हैं कि सिर्फ फलों को बेचने से फायदा नहीं होता क्योंकि फल आपको एक निश्चित मौसम व समय पर ही फायदा दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त आय प्राप्त करने के लिए जयकुमार ने खाद्य प्रसंस्करण तकनीकी को अपनाया और उसे सालभर आमदनी प्राप्त करने का जरिया बनाया। उन्होंने कहा कि जब उनके पास आंवला की पर्याप्त मात्रा नहीं होती तब वे अपने जानकारों से आंवला लेकर उनके प्रसंस्करण का काम करते हैं।

आप भी कर सकते हैं संपर्क -

यदि किसान भाई जयकुमार से जामुन की खेती की अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो उनसे मोबाइल नंबर - 09865925193 या 09751506521 पर संपर्क कर सकते हैं। स्थानीय लोग उनके पते पर जाकर मिल सकते हैं - सी. जयकुमार, नीलाकोट्टाई तालुक, मेतुर गेट पोस्ट, कोदाई रोड, तमिलनाडु।



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