दलहन की कीमतों में दबाव की आशंका

देश में दलहन की जोरदार पैदावार के चलते दलहन की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। रबी सीजन की प्रमुख दलहन फसल - चना और अरहर की आवक बाजार में शुरू हो गई है जिसके कारण कीमतें और भी कम होने की आशंका जताई जा रही है। बढ़ती आवक के कारण कारोबारी दलहन की स्टॉक  सीमा हटाने की मांग कर रहे हैं। दलहन पैदावार के सरकारी और कारोबारी संगठनों के आंकड़ों में भारी अंतर इशारा कर रहा है कि सीजन खत्म होते ही दलहन की कीमतों में सुधार होगा।


बाजार में दलहन की नई फसल आनी शुरु हो गई। चने की आवक रफ्तार पकड़ चुकी है और अगले एक सप्ताह में यह और तेज होगी। आवक बढऩे से कई किसानों को उनके भाव नहीं मिल रहे हैं। कई जगह न्यूनतम समर्थन मूल्य के नीचे खरीदारी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में कारोबारियों ने मांग करनी शुरु कर दी है कि दलहन पर लगी स्टॉक सीमा हटाई जाए। राजस्थान के व्यापारिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि बाजार में चने की बढ़ती आवक और गिरती कीमतों को देखते हुए तुरंत दलहन की स्टॉक सीमा हटा देनी चाहिए। राजस्थान में रोजाना चने की आवक 50-70 लाख बोरी की है। आने वाले समय में आवक और बढ़ेगी। आवक बढऩे से चने की कीमतों में और गिरावट होगी। इससे किसानों को उनकी उपज का सही दाम नहीं मिल पाएगा। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा दलहन पर लगाई गई स्टॉक सीमा को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए। इस साल राजस्थान में चने की पैदावार 15 लाख टन पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। राज्य में दलहन पर सितंबर तक स्टॉक सीमा कानून लागू है।


इंडियन पल्सेज ऐंड ग्रेंस एसोसिएशन (आईपीजीए) के उपाध्यक्ष बिमल कोठारी का कहना है कि इस समय देश में अरहर, मूंग और मसूर की आपूर्ति भरपूर है, इसलिए सरकार को इनके निर्यात की मंजूरी देनी चाहिए ताकि किसानों को बेहतर कीमत मिल सके। इस समय इनकी कीमतें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चल रही हैं। भारत में उड़द की अच्छी पैदावार नहीं होती है जिससे उड़द के दाम हाल के निचले स्तरों से ऊपर उठे हैं। इस समय उड़द के दाम 20 फीसदी या 10 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़कर 60 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गए हैं जो दो सप्ताह पहले 50 रुपये प्रति किलोग्राम थे। रोचक बात यह है कि सरकार के पास दालों के भंडारण के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। इसके नतीजतन निजी कारोबारी दालों का स्टॉक रहे हैं ताकि वे कम आपूर्ति के समय इनकी बिक्री कर सकें। कोठारी ने कहा कि दालों की एक दिन में खपत नहीं होती है इसलिए उन्हें आगे के लिए  स्टॉक कर रखा जाता है। इसे मद्देनजर रखते हुए सरकार को स्टॉकिस्टों पर दालों की स्टॉक की सीमा हटानी चाहिए।


आईपीजीए के मुताबिक इस साल भी दलहन का आयात करीब 55 लाख टन रहने का अनुमान है। एसोसिएशन के मुताबिक इस साल सरकार का दलहन उत्पादन 220 लाख टन से अधिक रहने का अनुमान है लेकिन जमीनी स्तर पर उत्पादन 200 लाख टन के करीब रहने वाला है। इस साल देश में दलहन की खपत 240 लाख टन के ऊपर ही रहने वाली है। ऐसे में दलहन की पैदावार अधिक होने के बावजूद इस साल आयात 50-55 लाख टन करने की जरुरत पड़ेगी।


हालांकि सरकारी आंकड़ों में दलहन के आयात की जरुरत नहीं दिख रही है। खाद्य, आपूर्ति एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री राम विलास पासवान का कहना है कि सरकार किसानों से उनके उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदनें को प्रतिबद्ध है और दलहन का 20 लाख टन बफर स्टाक बनाने की दिशा में पहल करते हुए अभी तक 15 लाख टन खरीद की जा चुकी है। कृषि सहकारिता विभाग के अनुमान के अनुसार देश में इस वर्ष लगभग 221 लाख टन होना सुनिश्चित है। दालों की इस जोरदार पैदावार में वैज्ञानिक विधि से उन्नत तकनीक का इस्तेमाल भी एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। पिछले साल देश में दालों की कीमत 200 रुपये तक पहुंच गई थी।

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