मंत्री जी, क्या कर्जमाफी से किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रुक गया है ? अगर हाँ तो इन 60 मौतों का जिम्मेदार कौन ?

 

किसानों की खुदकुशियां आज एक बेहद गंभीर मुद्दा बना हुआ है। देश के कई ऐसे राज्य हैं जहां किसान आत्महत्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में अब पंजाब में किसानों की आत्महत्या का एक आंकड़ा सामने आया है जो हिला देने वाला है। किसानों की द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के कारण पंजाब सरकार को सत्ता में आते ही छोटे किसानों का 2 लाख रुपए तक का कर्ज माफ करने का एलान करना पड़ा।

जबकि राज्य के सीएम कैप्टन सरकार की यह कर्जमाफी भी किसानों को कोई राहत प्रदान नहीं कर सकी व किसानों की खुदकुशियों का सिलसिला अभी भी जारी है। किसान संगठन व सरकार खुदकुशियों को लेकर अब भी आमने-सामने हैं। पंजाब में सरकार तो नई आ गई है और सीएम भी राज्य को नया मिल गया है लेकिन किसानों के हालात अभी भी वहीं के वहीं जूझ रहे हैं। खबरों की मानें तो अब किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला, न ही आत्महत्या के  बाद मुआवजे के लिए धरना प्रदर्शन में कोई कमी आई है।

जब धरना व्यापक रूप धारण कर लेता है तो सरकार की तरफ से किसानों के लिए मुआवजे कि घोषणा होती है। इस तरह पंजाब सरकार अपनी नैतिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। मुआवजे की घोषणा होते ही किसानों का धरना भी खत्म हो जाता है।  किसानों की आत्महत्या की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कैप्टन अमरेंद्र सिंह को मुख्यमंत्री बने हुए अभी महज 7 महीने ही हुए हैं, इतने कम समय में सिर्फ भटिंडा जिले में 60 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर अपनी जिंदगी की इहलीला समाप्त कर चुके हैं। 

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किसानों की आत्महत्या से संबंधित कराए गए एक सर्वे ने सभी को चौंका दिया है। इसके अनुसार पंजाब में पिछले 10 वर्षों के दौरान 6926 किसान आत्महत्या कर चुके हैं जिसमें 3954 किसान हैं व 2972 खेतीहर मजदूर शामिल हैं। इस सर्वे ने यह साफ रेखांकित कर दिया है कि सबसे ज्यादा आत्महत्या की घटना मालवा क्षेत्र के दो जिलों  में भटिंडा और मानसा में हुई हैं। ऐसा कतई नहीं कि किसानों के आत्महत्या की समस्या सिर्फ पंजाब में ही होती है बल्कि इसने राष्ट्रीय रूप धारण कर लिया है। पिछले महीने ही महाराष्ट्र के किसान मुआवजा के लिए सड़क पर आ गए थे। मजबूर होकर महाराष्ट्र सरकार ने कर्ज माफी की घोषणा की। किसानों के इस तरह से सिलसिलेवार आत्महत्या का बीज 90 के दशक में ही बो दिया गया था।

जबकि हरित क्रांति की शुरूआत हुई थी मगर समय रहते इस पर ध्यान देने के बदले हरित क्रांति को किसान हित के रूप में बहुत जोर शोर से प्रचारित किया गया जैसे देश में खाद संकट का हल सिर्फ हरित क्रांति से ही संभव हो सकता है, आज उसी का विनाशक रूप हमारे सामने दिखलाई दे रहा है। किसान ज्यादा उत्पादन के लिए ज्यादा से ज्यादा खाद का प्रयोग करने लगे, इस वजह से फसल उत्पादन तो बढ़ गया लेकिन खेत की उरर्वक क्षमता धीरे-धीरे करके नष्ट होती चली गई। आज स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि खेत अब बंजर होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इस वजह से अनाज की उत्पादन क्षमता पर इसका बुरा असर पड़ा है। ऐसे में अब साल ये भी उठता है कि क्या केवल कर्ज माफी ही एक मात्र रास्ता है किसान आत्महत्या को रोकने का । 

 

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