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ICAR में जनजातीय उप योजना के अंतर्गत बिहार-झारखंड में बनेंगे ‘औषधीय गांव’, क्या बदलेगी जनजातीय किसानों की किस्मत

केंद्र सरकार ICAR की टीएसपी परियोजना से बिहार के एक जिला जमुई झारखंड के चार जिला कुल पांच जिलों में औषधीय और सगंधीय पौधों की खेती को दिया जाएगा बढ़ावा, बाजार और मुनाफे पर टिकी है सफलता।

फार्मर द जर्नलिस्ट
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ICAR में जनजातीय उप योजना के अंतर्गत बिहार-झारखंड में बनेंगे ‘औषधीय गांव’

समस्तीपुर। बिहार और झारखंड के जनजातीय इलाकों में किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से ICAR के  जनजातीय उप योजना (टीएसपी) से बिहार-झारखंड में केंद्र सरकार ने एक नई पहल की शुरुआत की है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के माध्यम से शुरू "झारखंड एवं बिहार में औषधीय और सगंधीय पौधों द्वारा जनजातीय समुदाय का सशक्तिकरण" इस परियोजना के तहत पांच जिलों के चयनित गांवों को “औषधीय गांव” के रूप में विकसित किया जाएगा। साथ ही इन जिलों में कई गांवों को जोड़कर क्लस्टर बनाने की भी योजना है। योजना के तहत किसानों को औषधीय पौधों की खेती के लिए प्रशिक्षण, पौध, बीज एवं उपकरण सामग्री और बाजार से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। कुल परियोजना की लागत लगभग 74 लाख रुपए बताइए गई है। जिसमें से 27 लाख रुपए विश्वविद्यालय को प्राप्त हो चुका है। इस परियोजना की अवधि 1 वर्ष है जो की चालू वित्तीय वर्ष ही बताई गई है।

इन जिलों में शुरू हुआ काम

परियोजना के पहले चरण में बिहार के जमुई और झारखंड के देवघर, दुमका, गोड्डा और गिरिडीह जिलों का चयन किया गया है। यहां चयनित गांवों में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देकर उन्हें “औषधि गांव” के रूप में विकसित करने की परियोजना कार्यरत है।

औषधीय पौधों पर फोकस

परियोजना के तहत बेल, आंवला, नीम, करंज, एलोवेरा, मेथा और ब्राह्मी जैसे पौधों का वितरण किया गया है। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा जनजातीय महिला किसानों को औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती, देखभाल और उत्पादन की तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

परियोजना के मुख्य अन्वेषक डॉ. दिनेश राय के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य जनजातीय समुदाय को तकनीकी ज्ञान के साथ आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है, ताकि वे औषधीय खेती को व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपनी आय बढ़ा सकें। डॉ शंकर झा एवं डॉक्टर शिव शंकर प्रसाद सह परियोजना अन्वेषक के रूप में सहयोग कर रहे हैं।

बाजार से जुड़ाव और उचित मूल्य सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि औषधीय खेती को लेकर बिहार और झारखंड में संभावनाएं काफी हैं, लेकिन इसकी सफलता बाजार व्यवस्था पर निर्भर करेगी। पहले भी कई योजनाओं में किसानों को उत्पादन के बाद उचित मूल्य नहीं मिल पाने की समस्या सामने आई है।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि अगर किसानों को

  • उत्पाद की गारंटीड खरीद,

  • उचित मूल्य,

  • और प्रोसेसिंग व मार्केटिंग सुविधा नहीं मिली, तो यह योजना भी सीमित प्रभाव ही छोड़ पाएगी।

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जनजातीय किसानों के लिए क्या बदलेगा?

इस योजना से किसानों को पारंपरिक खेती के साथ एक वैकल्पिक आय का स्रोत मिलने की उम्मीद है। खासकर सूखा प्रभावित और कम संसाधन वाले क्षेत्रों में औषधीय पौधों की खेती लाभकारी हो सकती है।

हालांकि, किसानों के बीच अभी भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या उन्हें अपने उत्पाद के लिए स्थायी बाजार और उचित कीमत मिल पाएगी। क्या आयुर्वेदिक कंपनियां तक जनजातीय किसने की सीधी पहुंच हो पाएगी।

क्या कहती है योजना

परियोजना के तहत न केवल पौध वितरण और प्रशिक्षण दिया जा रहा है, बल्कि किसानों को बाजार से जोड़ने और उत्पाद की बिक्री सुनिश्चित करने की भी बात कही जा रही है। नीति निर्माता के साथ बड़े औद्योगिक कंपनियों को भी योजना के तहद जोड़ने की चर्चा है।

इसके लिए संबंधित संस्थाओं से समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

“औषधीय गांव” की यह पहल जनजातीय क्षेत्रों में आर्थिक बदलाव का एक नया मॉडल बन सकती है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि योजना जमीन पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती है और किसानों को बाजार, मूल्य और तकनीकी सहयोग कितनी मजबूती से मिल पाता है।

अगर इन चुनौतियों का समाधान हो गया, तो यह पहल न केवल बिहार-झारखंड बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है।

 रिपोर्ट:  रामजी कुमार FTJ बिहार।

English Summary: Medicinal Villages to be established in Bihar and Jharkhand under the Tribal Sub-Plan at ICAR Published on: 19 March 2026, 06:20 PM IST

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