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मजदूरों का मर्ज़ और कर्ज़

भारत में मजदूरों का मुद्दा हमेशा से ही संवेदनशील और ज्वलंत रहा है. आजादी के बाद से मौजूदा वक्त तक, यह मसला बेहद प्रचलित और गंभीर बना हुआ है. मजदूरों की दशा पर हमेशा से ही बात होती रही है. साथ ही मजदूरों की बनती-बिगड़ती दशा पर राजनीतिक पार्टियों का चर्चा का मुद्दा रहा हैं. हालांकि, इनके सुधार को लेकर किसी राजनीतिक दल ने संजीदगी नहीं दिखाई. आज खेती घाटे का सौदा बनकर रह गई है. जिसके चलते इस क्षेत्र में कई नई समस्याएं उभरकर सामने आ रही हैं और मजदूर सड़कों पर उतर रहे हैं. इसी कड़ी में मजदूरों ने राजधानी दिल्ली में देशव्यापी हड़ताल का आयोजन किया. इस दौरान उन्होंने मंडी हाउस से संसद मार्ग तक विशाल प्रदर्शन किया और सरकार विरोधी नारे लगाए.

इस दौरान उन्होंने कहा कि, सरकार किसानों का अनादर कर सरकार नहीं चला सकती. सरकार को आगामी चुनाव में किसान विरोधी नीतियों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इस दौरान मजदूरों ने ठेका कर्मियों को पक्का करने, पुरानी पेंशन स्कीम और ठेका प्रथा बंद करने जैसे प्रमुख मांगो को लेकर लंबा मार्च भी किया. प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में मजदूर संगठन और किसान संगठनों के अलावा अन्य संगठन भी दिखे. हड़ताल में लगभग 10 हजार से अधिक मजदूर शामिल हुए. इस देशव्यापी हड़ताल में लगभग 10 संगठनों ने हिस्सा लिया जिसमें आईएनटीयूसी, एआईटीयूसी, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीसी, टीयूसीसी, एआईसीसीटीयू, सेवा, यूटीयूसी.शामिल थे.

गौरतलब है कि जब चुनाव आता है तब राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणा पत्र में कृषि ऋण माफ़ी का जिक्र कर देती हैं. चुनाव में प्रायः यह देखा भी गया है कि ऋण माफी के मुद्दे के सहारे राजनीतिक पार्टियां सत्ता हासिल करने में सफल भी हो जाती हैं. लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो और राज्यों के आंकड़ों को देखें तो यह पता चलता है कि, 10 साल में देश के करीब 1 लाख से ज्यादा किसानों और मजदूरों ने आत्महत्याएं की हैं. जिनमें ज्यादातर आत्महत्याएं कर्ज के बोझ की वजह से हुई हैं. 



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