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जहां रिश्ते थक गए, वहां वृद्धाश्रम खड़े हो गए!

तेजी से बदलते भारत में करियर और सुविधा की दौड़ ने पारिवारिक संवेदनाओं को कमजोर किया है. वृद्धाश्रम समाधान नहीं, सामाजिक चेतावनी हैं. बुढ़ापा केवल चिकित्सा नहीं, सम्मान, संवाद और अपनत्व चाहता है. रिश्तों की जगह व्यवस्था लेना सभ्यता की थकान दर्शाता है.

KJ Staff
Dr. Rajaram Tripathi
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, सामाजिक चिन्तक तथा पर्यावरणविद
  • सुविधाएं बढ़ी हैं, संवेदना घटती जा रही है,

  • वृद्धाश्रम समाधान नहीं, सामाजिक चेतावनी हैं,

  • वृद्धजन: सरकार और समाज दोनों की उदासीनता बढ़ती चिंता,

  • शरीर सुरक्षित है, पर आत्मा असहाय एकाकी,

भोपाल में हाल ही में प्रारंभ हुआ फाइव स्टार सुविधाओं से युक्त वृद्धाश्रम केवल एक भवन का उद्घाटन नहीं है, बल्कि वह भारत के सामाजिक भविष्य पर खड़ा एक गूढ़ प्रश्न है. पांच एकड़ भूमि पर चौबीस करोड़ रुपये की लागत से निर्मित यह परिसर वातानुकूलित कमरों, कॉल बेल, इंटरकॉम, चौबीस घंटे चिकित्सकीय सुविधा और प्रशिक्षित परिचारकों से सुसज्जित है. यहां मासिक शुल्क अड़तीस हजार से पचास हजार रुपये तक निर्धारित किया गया है.

यह व्यवस्था उन बुजुर्गों के लिए बताई जा रही है जिनके बच्चे महानगरों या विदेशों में कार्यरत हैं, जिनके पास धन है, पर परिवार का साथ नहीं. समृद्ध एकाकी बुजुर्गों के लिए आज के दौर की यह एक शानदार व्यवस्था कही जा सकती है.

यह समाचार पढ़ते हुए मन में सहज प्रश्न उठता है कि क्या भारत भी अब उसी सामाजिक मोड़ पर खड़ा है, जहां पश्चिमी समाज दशकों पहले पहुंच चुका था.

वृद्धाश्रम की अवधारणा मूलतः पाश्चात्य सभ्यता की उपज है. यह उन समाजों का समाधान है जहां परिवार नामक संस्था कमजोर हो चुकी है. अमेरिका और यूरोप में विवाह स्थायित्व नहीं, बल्कि सुविधा बन चुका है. साथ रहना, अलग होना, पुनर्विवाह और बहु-संबंध सामान्य सामाजिक यथार्थ हैं. अठारह वर्ष की आयु के बाद संतान का माता-पिता से अलग हो जाना वहां आत्मनिर्भरता का प्रतीक माना जाता है.

पर भारतीय समाज की जड़ें बिल्कुल भिन्न रही हैं. यहां माता-पिता और संतान का संबंध केवल कानूनी या आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक, नैतिक और आध्यात्मिक रहा है. माता-पिता अपने जीवन का सर्वस्व बच्चों के भविष्य में अर्पित करते हैं, इस विश्वास के साथ कि वृद्धावस्था में वही संतान उनका संबल बनेगी.

इसीलिए भारतीय परंपरा कहती है,

“मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः.”

भारतीय सामाजिक दर्शन में मनुष्य का जीवन केवल उम्र की गणना नहीं, एक साधना रहा है.

ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, गृहस्थ से वानप्रस्थ और वानप्रस्थ से संन्यास तक की यात्रा यह सिखाती थी कि वृद्धावस्था बहिष्कार नहीं, अनुभव का शिखर होती है.

शास्त्र कहते हैं,  “वानप्रस्थो नाम धर्मस्य दीपः” अर्थात वानप्रस्थ वह दीप है जो समाज को दिशा देता है. पर 'ओल्ड एज होम' की आधुनिक अवधारणा इस दीप को घर से समाज से बाहर रख देती है, जहां सम्मान नहीं, व्यवस्था होती है और जीवन-दर्शन नहीं, केवल जीवन-प्रबंधन शेष रह जाता है.

आज यह सामाजिक ताना-बाना तेजी से ढीला पड़ रहा है. महानगरों की उत्तरोत्तर महंगी जीवन शैली, स्थानांतरण आधारित नौकरियां, करियर की अंधी प्रतिस्पर्धा और एकल परिवार व्यवस्था ने संतान को माता-पिता से भौगोलिक ही नहीं, भावनात्मक रूप से भी दूर कर दिया है.

बेटियां विवाह के बाद अपने संसार में रच-बस जाती हैं. बेटे जहां नौकरी मिली, वहीं उनका स्थायी निवास हो जाता है. गांवों और छोटे शहरों में वृद्ध माता-पिता पेंशन, बच्चों द्वारा भेजी गई राशि और अकेलेपन के सहारे जीवन काटते हैं.

त्योहारों पर औपचारिक मुलाकात, वीडियो कॉल पर हालचाल और बीमारी के समय अस्पताल की व्यवस्था ही अब “सेवा” की नई परिभाषा बनती जा रही है.

इस सामाजिक विघटन के साथ-साथ एक और चिंताजनक तथ्य सामने आता है, 'संवेदनशीलता केवल समाज में ही नहीं, सरकारों में भी लगातार कम होती जा रही है.'

एक समय था जब वरिष्ठ नागरिकों को रेल यात्रा में विशेष रियायत दी जाती थी. टिकटों में छूट, आरक्षित कोटे और अतिरिक्त सुविधाएं सामाजिक सम्मान का प्रतीक थीं. आज वे एक-एक कर समाप्त की जा रही हैं.

रेलवे टिकट में वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली छूट बंद हो चुकी है. अनेक सार्वजनिक सेवाओं में आयुजनित सहूलियतें सीमित कर दी गई हैं. व्यवस्था का मौन संदेश स्पष्ट है- "आप बूढ़े हो गए हैं, इसमें देश का कोई दायित्व नहीं." और जब समाज उदासीन हो और सरकारें संवेदनहीन, तब वृद्धाश्रम विकल्प नहीं, मजबूरी बन जाते हैं.

भारत में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार वर्ष 2021 में भारत में साठ वर्ष से अधिक आयु के लगभग 14 करोड़ नागरिक थे. अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह संख्या बढ़कर 32 करोड़ से अधिक हो जाएगी. तब देश की कुल जनसंख्या का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा वृद्ध वर्ग का होगा.

'राष्ट्रीय वृद्धजन नीति' बताती है कि भारत के लगभग पैंसठ प्रतिशत बुजुर्ग किसी न किसी दीर्घकालिक बीमारी से पीड़ित हैं. उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, गठिया, दृष्टिहीनता और मानसिक अवसाद उनकी प्रमुख समस्याएं हैं. विशेषज्ञों के अनुसार मनुष्य के जीवन में शिक्षा के बाद सबसे अधिक खर्च बुढ़ापे के इलाज पर ही होता है. इसी भय से परिवार वृद्धाश्रम को सुरक्षित समाधान मानने लगते हैं. परंतु बुढ़ापा केवल चिकित्सा समस्या नहीं है. यह जीवन का वह चरण है जहां मनुष्य को सबसे अधिक प्रेम, संवाद, सम्मान और मानसिक संबल की आवश्यकता होती है.

दवाइयां शरीर को संभाल सकती हैं, पर जीवन जीने की इच्छा केवल अपनत्व से जन्म लेती है. जब वृद्ध यह अनुभव करने लगता है कि अब उसका जीवन किसी के लिए आवश्यक नहीं रहा, तब उसकी मृत्यु शरीर से पहले मन में घटित हो जाती है.

दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल ने कहा था- “मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा बीमारी नहीं, अकेलापन है.”

आज सबसे खतरनाक संकेत यह है कि युवा पीढ़ी के मन में करियर के चुनाव के साथ-साथ माता-पिता के भविष्य के लिए वृद्धाश्रम एक स्वाभाविक विकल्प की तरह उभरने लगा है. यह केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि सभ्यता का संकट है.

जर्मन विचारक एरिक फ्रॉम लिखते हैं, “जब संबंध सुविधा में बदल जाते हैं, तब प्रेम समाप्त हो जाता है.” भारतीय दर्शन परिवार को केवल एक संरचना नहीं, संस्कार मानता है. यहां पिता को शिवतत्व और माता को शक्ति का स्वरूप कहा गया है.

महात्मा गांधी का कथन था, “किसी समाज की नैतिक ऊंचाई इस बात से मापी जाती है कि वह अपने वृद्धों के साथ कैसा व्यवहार करता है.”

आचार्य चाणक्य कहते हैं, “जिस घर में वृद्धों का सम्मान नहीं होता, वहां समृद्धि स्थायी नहीं रहती.” यह कहना भी आवश्यक है कि जिन बुजुर्गों का कोई सहारा नहीं, जो संतानहीन हैं या पूर्णतः असहाय हैं, उनके लिए वृद्धाश्रम मानवीय आवश्यकता हैं. वहां राज्य और समाज दोनों का दायित्व बनता है. परंतु जब सुविधा-संपन्न वर्ग के लिए वृद्धाश्रम कर्तव्य से मुक्ति का साधन बन जाए, तब समस्या केवल सामाजिक नहीं, नैतिक हो जाती है.

फाइव स्टार वृद्धाश्रम हमारे समय का सबसे करुण प्रतीक हैं. वे बताते हैं कि हमने रिश्तों को भी बाजार में बदल दिया है. भारत स्वयं को विश्वगुरु कहता है. पर जिस समाज में माता-पिता के लिए घर में स्थान न हो, वहां “वसुधैव कुटुंबकम” केवल नारा बनकर रह जाता है.

वृद्धाश्रम मंज़िल नहीं हैं. यह जीवन की अंतिम यात्रा की ट्रेन की प्रतीक्षा का एकाकी प्लेटफार्म है. यदि हमें सचमुच सभ्य समाज बनना है, तो सुविधाओं से अधिक संवेदनाओं में निवेश करना होगा. बुढ़ापा होटल नहीं चाहता. ऐ वह सम्मान चाहता है. अपनों का साथ चाहता है, अपनापन चाहता है. और यही किसी भी महान सभ्यता की असली पहचान होती है.

लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, सामाजिक चिन्तक तथा पर्यावरणविद

English Summary: india old age homes rise family values decline social crisis Published on: 27 January 2026, 11:24 AM IST

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