भारत में कुछ वर्षों से हर वर्ष इंडिया लैंड एण्ड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस (ILDC) आयोजित की जा रही है. यह कॉन्फ्रेंस भूमि शासन, नीति और विकास से जुड़े उभरते और दीर्घकालिक मुद्दों पर केंद्रित होती है. इन मुद्दों पर ILDC कॉन्फ्रेंस अलग-अलग हितधारकों को एक मंच पर साथ लाती है. जिनमें सरकारी निकाय, नागरिक संगठन और कार्यकर्ता शामिल होते हैं. बीते वर्ष 2025 में इस 9वीं कॉन्फ्रेंस का कार्यक्रम 18 से 20 नवंबर के बीच गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में सम्पन्न हुआ. अहमदाबाद मेनेजमेंट एसोसिएशन (AMA) में सम्पन्न इस कॉन्फ्रेंस में 23 देशों के 492 प्रतिभागी शामिल हुए.
कॉन्फ्रेंस में एक मुख्य और प्रबंधकीय भूमिका में ‘लैंडस्टैक’ संस्था रही. इस बार कॉन्फ्रेंस का विषय ‘सतत विकास में भूमि की केन्द्रीय भूमिका: अतीत, वर्तमान और भविष्य से जुड़ी चुनौतियों का समाधान’ था. ‘‘इस कॉन्फ्रेंस में कई सेशन हुए, जिनमें भारत के नॉर्थईस्ट के लिए दो सेशन शामिल थे, जिसमें बाहरी मदद वाले प्रोजेक्ट्स से मिले सबक के साथ-साथ इलाके में फूड सिस्टम, किसानों और रोजी-रोटी की सुरक्षा पर ज़रूरी चर्चा की गई.’’
इन सत्रों में गैर-सरकारी और सिविल सोसायटी संगठनों के पैनलिस्टों के साथ-साथ सिविल सेवा अधिकारी, वरिष्ठ सलाहकार, नीति विश्लेषक और शैक्षणिक जगत के प्रतिनिधि शामिल थे.
हरिशिकेश सिंह कोंथौजाम मणिपुर से आते हैं. अपना Indo-German Devlopment Co-operation (IGDC) के तहत COSFOM प्रोजेक्ट का अनुभव रखते हुए कहते हैं, “हम सामुदायिक वन क्षेत्र में नदी किनारे वृक्षारोपण का कार्य कर रहे हैं. इसका उद्देश्य नदियों के कटाव को रोकना है. ताकि नदियों का संरक्षण किया जा सके. उनकी जैव-विविधता को बचाया जा सके. इस कार्य के लिए हमने आस-पास के समुदायों से अनुमति ली है. साथ में हम पर्यावरण और सामाजिक प्रबंधन का भी पालन करते हैं.“
आगे वे बताते हैं, “हमारे पेड़ लगाने के कार्य से एक संतुलन की स्थिति बढ़ने लगी है. जिन गाँव में वन्य-जीव लुप्त हो गए थे, वहाँ जब हमने वृक्षारोपण किया तो वन्य-जीव पुन: दिखने लगे हैं. वन्य-जीव धीरे-धीरे गाँव की ओर लौटने लगें हैं. इस कार्य के लिए वन विभाग द्वारा हमें सम्मानितभी किया गया है. वहीं, हमारे कार्य से पेड़ों के फल, फूल, पत्तियों की सुरक्षा को लेकर स्प्रिंग डिसीजन प्रोग्राम सफल साबित हो रहा है.“
सेल्वाराज प्रभु त्रिपुरा से आते हैं. वे भारत में कृषि जैसी परियोजनाओं पर सीख-समझ की चर्चा करते हुए IGDC के तहत Climate Resilience of Forest Landscapes in Tripura (CREFLAT) परियोजना के संबंध में अपने विचार साझा करते हैं. वे बताते हैं, “यह परियोजना वन पारिस्थितिक तंत्रों की जलवायु, जैव-विविधता और वनों पर आश्रित समुदायों की अनुकूलन क्षमता से संबंधित है. इस परियोजना के प्रमुख घटकों में भूदृश्य विकास, वन भूमि प्रबंधन, जैव-विविधता पर पड़ते प्रतिकूल प्रभावों को रोकने के उपाय तलाशना, वन उत्पाद व प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन करना है.“
इसके आगे वे फरमाते हैं कि त्रिपुरा में वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासी परिवारों को भूमि का 30 प्रतिशत हिस्सा उनकी वन भूमि के विकास हेतु दिया है. इस भूमि पर हम परियोजना के तहत अदरक, हल्दी, अनानास, केला, आम जैसे पेड़-पौधे लगाकर कृषि वानिकी को बढ़ावा दे रहे हैं.
आगे अपना अनुभव बयां करते हैं वक्ता रोडोनाल्ड मजाव. वे मेघालय से आते हैं. अपने अनुभव में वे कहते हैं कि, ‘एक परियोजना किसानों को बाजार मुहैया करवाने के लिए शुरू की जा रही थी. उम्मीदें देते हुए किसानों के आवेदन और जमीन दस्तावेज जमा कर लिए गए. परियोजना की प्रक्रिया 3-4 वर्ष तक चलती रही. मगर, इसके बाद कई तरह के अवरोध व पूर्ण प्रक्रिया की कमीं बताकर परियोजना समाप्त कर दी गयी. इससे समझा जा सकता है कि, किस तरह किसानों को सपने दिखाकर कार्य को छोड़ दिया जाता है. जिससे किसानों के हित प्रभावित होते हैं.
आगे वे कहते हैं, “किसानों के लिए बाजार एक बहुत बड़ी जरूरत है. इस जरूरत को समझते हुए हमने (Meghalaya Basin Management Agency (MBMA) के क्रियान्वयन में एक उद्देश किसानों को बाजार निर्मित करना रखा. जिसके लिए हमने एक किसान बाजार प्रोत्साहन समिति (Collective Marketing Centre Committee) भी गठित की है. इसके साथ 4-5 गाँव को संगठित कर अधिक फसलों का उत्पादन कर रहें किसानों को चयनित किया. अब हमने किसान बाजार के लिए परियोजना शुरू कर दी है. परियोजना के तहत कई संरचनाओं का कार्य किया जा रहा है. उम्मीद है परियोजना जल्द शुरू होगी.“
इसके बाद नागालैंड से आए सुपोनगनुक्षि एओ अपने शब्द शुरू करते हैं. वे KFW के तहत Forest and Biodiversity Management in the Himalaya (Nagaland) Project (FBMP) पर आधारित अपने अनुभव को साझा करते हुए कहते हैं, “यह एक ग्रांट एडेड प्रोजेक्ट है. जो कई परियोजनाओं की तुलना में बड़ी है. इस परियोजना का उद्देश्य बिखरे हुए वन क्षेत्र को एकजुट करना है. इसलिए 5 जिलों के 64 गाँव परियोजना में शामिल किये गए हैं. वर्ष 2027 तक ही हम इस परियोजना को पूरा कर लेंगे.“
इसके बाद वे बोलते हैं, “हमने इन 64 गाँव में जन जैवविविधता रजिस्टर करने का कार्य भी आरंभ किया है. जिसमें हम सभी संसाधनों, पौधों, जानवरों, पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रहें हैं. आजीविका के लिए भी हमने विभिन्न कार्य शुरू किये हैं. इन कार्यों में 25 प्रतिशत महिलाओं को शामिल किया गया है.“
सुपोनगनुक्षि आगे जिक्र करते हैं कि इस परियोजना के तहत हम कई कार्य भी कर रहें हैं. जिसमें एक कार्य हम नदी संरक्षण का कर रहे हैं. हम मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान का रास्ता तलाशने में भी जुटे हैं. वहीं, जैव-विविधता और राष्ट्रीय धरोहर क्षेत्र संरक्षण सहित हम अभी 7 विषयों पर कार्यरत हैं.
सम्मेलन के तीसरे दिन आयोजित पैनल चर्चा में विभिन्न दृष्टिकोणों को एक साथ लाया गया. ताकि, उत्तर-पूर्व क्षेत्र में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, शासन संरचनाओं और आधुनिक संस्थागत दृष्टिकोणों को आपस में जोड़कर टिकाऊ, न्यायसंगत और लचीली खाद्य प्रणालियों को मजबूत किया जा सके.
वाई. नुक्लु फोम, Lemsachenlok संगठन के संस्थापक, ने संवाद सत्र के दौरान अपने विचार साझा किए. उन्होंने कहा, “पूर्वोत्तर क्षेत्र तीन प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहा है - हाल ही में पारित वन संरक्षण संशोधन अधिनियम, पारंपरिक रूप से संरक्षित वनों को सामुदायिक रिज़र्व में परिवर्तित करना, और स्थानीय परिदृश्यों में बाहरी फसल किस्मों तथा गैर-देशी प्रजातियों का प्रवेश.“
आगे वे कहते, “साल 2006 से हम कई परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं, जिनमें से एक सामुदायिक-आधारित नर्सरी है, जहाँ हम विशेष रूप से देशी पेड़-पौधों की प्रजातियों का ही संवर्धन करते हैं. हम अल्पकालिक, मध्यमकालिक और दीर्घकालिक गतिविधियों में भी जुड़े हुए हैं, जो सामूहिक सामुदायिक कार्रवाई पर आधारित हैं और समुदाय के समग्र कल्याण की दिशा में केंद्रित हैं.“
पारंपरिक ज्ञान के क्षरण पर जोर देते हुए नुक्लु ने कहा कि, ‘हमारा पारंपरिक ज्ञान तेजी से लुप्त हो रहा है. इसलिए हमने ‘अलिजोकेडेमिया’ की शुरुआत की. यह एक ऐसा मंच है जहाँ गाँव के बुजुर्ग अपनी पारंपरिक रीति-रिवाज, कौशल और पारिस्थितिक ज्ञान को युवा पीढ़ी तक पहुँचाते हैं, ताकि निरंतरता और सांस्कृतिक मजबूती बनी रहे.’
इस बातचीत में रोंगमेई बैपटिस्ट एसोसिएशन (आरबीए) से जुड़ी आकेना गोंमेई ने भी अपनी चिंताओं पर ज़ोर दिया. वे किसानों की एकजुटता पर बात करते हुए बतलाती हैं कि, ‘आज किसानों की मोल-भाव करने की क्षमता कमजोर हो रही है. जिससे किसानों के लिए अच्छा और उपयुक्त बाजार नहीं है. आज हम खेत से बाजार तक की दूरी जानते हैं. इस बीच बहुत सारे मध्यस्थ खड़े हैं. आज यदि कोई किसान अपनी उपज बेचना चाहे तब गाँव में किसी विक्रेता को तलाशना होता है.,
आगे वे जाहिर करती हैं कि, ‘किसानों को उत्पादन से मिलने वाली आय वाजिब नहीं मिल पा रही है. इसका कारण है कि खेत से लेकर बाजार तक की कीमतों में भारी अंतर है. आज के किसान को फसल उत्पादन से लेकर बाजार तक 3-4 विक्रेता दिखाई देते हैं. ऐसी स्थति में फसल उत्पादन की उचित आय के लिए किसानों को एक साथ एकजुट होना पड़ेगा. तब एकजुट किसान अपने उत्पादन को उचित मूल्य पर एक जगह बेच सकते हैं.,
नॉर्थ ईस्ट नेटवर्क (NEN) की नागालैंड राज्य समन्वयक पामचिंगला कुमराह ने सामूहिक, समुदाय-आधारित खेती की एक सफल केस स्टडी को साझा किया, जिसने ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाया है.
यह केस स्टडी मणिपुर के एक गाँव की है. इस गाँव में लगभग 500 परिवार रहते हैं. ये परिवार केवल नींबू का उत्पादन करते हैं. प्रत्येक परिवार 200-300 नींबू के पेड़ उगा रहा है. परिवार के लोग नींबू के मौसम में ही नींबू को बेचते हैं. साथ में नींबू का जूस, अचार भी बेचते हैं. इस कार्य में यह ग्रामीण परिवार अधिक मुनाफा कमा रहे हैं. जिससे आजीविका के लिए अच्छी अर्थव्यवस्था निर्मित हो रही हैं. इन ग्रामीण परिवारों की सफलता का राज एक साथ समूह में रहकर कार्य करना है. इन गाँव वालों के साथ सरकारी विभाग, क्षेत्रीय संगठन, ग्राम प्रशासन, ग्राम विकास समिति भी है.
पामचिंगला आगे अपने एक कार्यक्रम पर बात करती हैं. वे बोलती हैं कि, ‘हम वर्ष 2016 से नेटवर्किंग संबंधी एक कार्यक्रम चला रहे हैं. जिसे NEN फार्म स्कूल कहा जाता है. इस कार्यक्रम में हम पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी को देखते हैं. इस देखने में हम पाते हैं कि नई पीढ़ी में हमारी पारंपरिक कृषि और भोजन प्रणाली को लेकर एक अलगाव है. इस स्थिति में हम नई पीढ़ी को पाँच दिवसीय प्रशिक्षण के माध्यम से स्वदेशी ज्ञान, भोजन, कृषि प्रणाली से अवगत करवाते हैं.
इसके आगे वे व्यक्त करती हैं कि, ‘हम नई पीढ़ी को खेतों में ले जाकर खाद्य प्रणाली, पानी, बीज, मिट्टी के बारे में भी समझाते हैं. साथ में हम समुदाय के बुजुर्गों से पहले के समय की बीजों, मिट्टी, पानी, स्वदेशी ज्ञान को सुनते-समझते हैं. वहीं, हम इस कार्यक्रम को विकसित करके कई जिलों तक ले गए हैं. साथ में हम हमारे इस कार्य से मेल खाते संगठनों तक भी इस कार्य को पहुचाने की कोशिश कर रहे हैं.
इन संवाद सत्रों में विभिन्न वकताओं के विचारों और अनुभवों से जलवायु परिवर्तन से फसलों के नुकसान, किसानों के लिए बाजार, फसल मूल्य अंतर जैसी चुनौतियों को समझा जा सकता है. साथ में वक्ताओ के द्वारा सुझाए गए उपायों जैसे किसानों को सामूहिक तौर पर एक साथ करना. वृक्षारोपण से गाँव में वन्य-जीवों का लौटना. संगठित होकर नींबू के उत्पादन से ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना. स्वदेशी भोजन, कृषि, ज्ञान को संरक्षित करना. जैसे विभिन्न उपायों को सतत विकास के लिए अपनाया जा सकता है. जिससे पर्यावरण, जैव-विविधता और मानव विकास को मजबूती की राह मिल सकती है.
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