क्या आपने कभी इमली की चपाती खाई है?

इमली का नाम लेते ही मुंह में पानी आ जाता है. दांत  किटकिटाने लगते हैं. खट्टी-मीठी इमली को नमक के साथ बड़े चाव से बच्चे, जवान, बुड्ढे और महिलाएं सभी इसे बहुत पसंद करते हैं.

गोल-गप्पे, पापड़ी हो या भल्ला पापड़ी सभी में इमली की चटनी को बड़ा पसंद किया जाता है. यह तो बात हुई उत्तर भारत की, इमली को दक्षिण भारत में भी बहुत पसंद किया जाता है. देखा जाए तो पूरे भारत में ही इमली सब की चहेती है.

इमली का बहुत बड़ा एक पेड़ होता है और उस पर गटारे लगते हैं. बच्चे गटारों को पत्थर मार मार कर नीचे गिरा लेते हैं और फिर अपने दोस्त यारों के साथ मिल बाँट कर चटखारे लेकर खाते हैं.

हमारे भारत में ही एक जगह ऐसी हैं जहाँ इमली ही आदिवासियों के एक बड़े वर्ग की आजीविका का प्रमुख साधन है। बस्तर जिले में रहने वाले आदिवासियों के बहुत से इमली के पेड़ हैं। इनमें कई ग्रामीण तो ऐसे भी हैं जिनके घर के आसपास डेढ़ दर्जन से अधिक पेड़ हैं। इमली के मौसम में वे इसकी तुड़ाई करते हैं। इसके बाद इसका संग्रहण करने का कार्य किया जाता है और पूरी तरह से तैयार कर इमली को बाजारों में बेचा जाता है।

पेड़ों पर लदी इमली बाजार में 15 फरवरी के बाद आती है पर बस्तर के गांव इमली की सोंधी महक से गुलजार हैं। बस्तर के किसी भी गांव में चले जाइए घरों में महिलाओं को लकड़ी के छोटे टुकड़ों से पीट कर इमली से इसके गुदे, रेशे और बीज को अलग करते आसानी से देखा जा सकता है। इमली तोडऩे के बाद छिलके उतारने का काम होता है। छिली इमली को आंटी कहा जाता है। इसमें इमली के बीज और रेशे मौजूद होते हैं। बाद में इससे रेशा और बीज निकाला जाता है, जिसे फूल इमली कहा जाता है।

फूल इमली बनाने के बाद इसकी चपाती बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। फूल इमली को लेकर ग्रामीण संग्राहक इसे करीने से जमाकर इसे चपाती का रूप देते हैं, जिसके बाद धूल व गर्द से बचाने के लिए इसे एक पॉलिथीन में पैक कर दी जाती है।

इमली तोडऩे से लेकर इसे फूल में बदलने और चपाती बनाने तक ग्रामीण इलाकों के घरों में बड़े बुजुर्ग तथा बच्चे तक इस काम में जुटे होते हैं। एक अनुमान के मुताबिक बस्तर में हर साल तकरीबन 500 करोड़ रुपये का इमली का कारोबार होता है, वहीं ग्रामीण अंचलों के आदिवासी संग्राहकों का एक मुख्य व्यवसाय इमली की चपाती बनाना है।

इमली को एक व्यवसाय के रूप में पहली बार जब देखा गया तो यह पाया कि वहां के आदिवासी कच्ची इमली को बिचौलियों के हाथो बेच कर ओने पौने दामों में कुछ रुपयों की खातिर अपना जीवन यापन करते रहे हैं.

फिर आयी एक एनजीओ जिसने किसानो को इक्कठा कर और इमली को प्रसंस्करित कर एक सामूहिक प्रयास किया, जिससे किसानो की आय में बढ़ोतरी हुई और उनके रहन-सहन में भी एक बदलाव देखा गया.

इमली एकत्र करने, खरीदने और उसका प्रसंस्‍करण करने का कार्य विभिन्‍न समूहों को सौंपा गया। इन समूहों ने ग्रामीणों की सहायता से गतिविधियों की पूरी श्रृंखला गठित की तथा इससे होने वाला लाभ सभी संबंधितों में बांटा गया। इमली की फलियों को खरीदने के लिए पुरुषों के चार समूह तथा इसे प्रसंस्‍कृत करने के लिए दो महिला समूह गठित किए गए जिनमें 60 परिवारों को शामिल किया गया। पकी हुई फलियां सभी ग्रामीणों द्वारा एकत्र की गईं तथा उन्‍हें मंडी की दरों पर खरीदा गया। यह सदैव बिचौलियों द्वारा दी जाने वाली दरों से 1.0 रु. अधिक था।

बस्तर क्षेत्र गैर इमारती वन्य उपज की बहुलता से समृद्ध है। आदिवासी किसान अधिकांशत: इन्‍हें कच्चे स्वरुप में एकत्र करके बेचते हैं। प्राथमिक प्रसंस्करण तथा मूल्यसंवर्धन संबंधी गतिविधियों में इन आदिवासियों का जीवन सुधारने की बहुत क्षमता है।

 

चंद्र मोहन, कृषि जागरण

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