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मंहगे कपास के चलते निर्यातक परेशान

भारतीय कपास निर्यातकों ने करीब 25,000 गांठों (एक गांठ=170 किलोग्राम) का ऑर्डर रद्द कर दिया है और लगभग 2,00,000 गांठों की खेप को एक महीने आगे खिसका दिया है। उद्योग के अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि आपूर्ति में कमी के बाद स्थानीय कीमतों के बढऩे से ऐसा हुआ है। विश्व के सबसे बड़े कपास उत्पादक भारत की इस कार्यवाही से ब्राजील, अमेरिका और कुछ अफ्रीकी देश जैसे इसके प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ताओं के निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है। यहां तक कि कुछ भारतीय कपड़ा मिलें भी विदेशों से सस्ते रेशों का आयात कर सकती हैं।  

आमतौर पर भारत में कच्ची कपास की आपूर्ति दिसंबर और फरवरी के मध्य में कीमतों में कमी के साथ चरम पर होती है। इस साल स्थानीय कीमतों में पिछले दो महीनों में 10 प्रतिशत तक उछाल आ चुकी है। इससे किसान कीमतों में और इजाफे की उम्मीद से कपास की बिक्री में विलंब कर रहे हैं। 

कीमतों में यह इजाफा सरकार द्वारा उच्च मूल्य के करेंसी नोटों को रद्द करने के प्रभाव से आया है, जिसने नकदी पर आधारित बाजार में व्यापार को अस्त-व्यस्त कर दिया। व्यापारियों का अनुमान है कि किसान अक्टूबर और जनवरी के बीच कपास की 1.55 करोड़ गांठों का विक्रय करेंगे जो पिछले साल के 1.911 गांठों के मुकाबले करीब 19 प्रतिशत कम है। पटेल ने कहा कि फिलहाल भारतीय कपास प्रतिस्पर्धी नहीं है। निर्यात मांग ज्यादा नहीं है। 

व्यापारियों ने कहा कि अगर स्थानीय कच्ची कपास के दाम पांच प्रतिशत और बढ़ते हैं तो किसान अपने भंडार को निकाल सकते हैं। इससे उन्हें प्रति किलोग्राम 6,000 रुपये से ज्यादा मिलेंगे लेकिन देरी की वजह से स्थानीय निर्यातक प्रतिस्पर्धा से बाहर हो सकते हैं।



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