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क्या कर्जमाफ़ी से बैंक ही नहीं किसानों के भविष्य पर भी पड़ता है बुरा असर ?

हाल ही में हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में कर्जमाफ़ी का मुद्दा सबसे बड़ा मुद्दा रहा. ये मुद्दा चुनाव में काफी कारगर भी साबित हुआ. इस मुद्दे की वजह से सत्ता से बेदखल कई राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आ गई. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि कर्जमाफी से किसानों को क्या लाभ और क्या नुकसान होता हैं ? दरअसल कृषि कर्जमाफी बैंकों के लिए तो बुरा है ही, नए लोन के समय किसानों की मुश्किलें भी बढ़ता हैं.

कर्जमाफी की उम्मीद में बहुत से किसान अपना कर्ज़ चुकाना बंद कर देते हैं. नतीजन इसका असर बैंकों की वित्तीय स्थिति पर पड़ता है. इसके बाद बैंक नए लोन बांटने पर तब तक सुस्त या धीरे हो जाते हैं, जब तक कि सरकार उन्हें उनका पैसे ना लौटा दे. इस वजह से इसमें सालों का वक्त लग जाता है. यह किसानों के लिए पूंजी पूर्ति को धीमा कर देता है. जिसके बाद बहुत से छोटे किसानों को कर्ज के लिए नॉन बैंकिंग स्रोत या साहूकारों की ओर रुख करना पड़ता है.

आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में 2014-15 से जून 2018 के बीच कृषि संबंधित नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट (NPA) दोगुना होकर करीब 10.6 फीसदी हो गया. राज्य स्तरीय बैंकर्स कमिटी के मुताबिक, जून से पहले करीब एक साल में कृषि लोन पर NPA बढ़कर 24 फीसदी हो गया है. राजस्थान में कार्यरत एक सीनियर बैंकर के मुताबिक, 'यह स्वभाविक है कि जब कर्जदार कर्जमाफी की उम्मीद देखते हैं तो बैंकों को पेमेंट करना बंद कर देते हैं. राजस्थान में भी अब यही ट्रेंड दिख रहा है' .गौरतलब है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम के साथ ही राजस्थान में भी कर्जमाफी की घोषणा की गई है. अभी हाल ही में यूपी में भी कर्जमाफ़ी की घोषणा की गई हैं.

विशेषज्ञों की चेतावनी

रिजर्व बैंक ने जुलाई में एक रिपोर्ट में कहा था कि कर्जमाफी शॉर्ट टर्म के लिए बैंकों के बैलेंस शीट को साफ कर सकता है. इससे बैंक लॉन्ग टर्म में कृषि कर्ज बांटने से हतोत्साहित होते हैं. ज़्यादातर अर्थशास्त्रियों ने भी कर्जमाफी को लेकर सरकारों को चेताया है, जिसमें रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी शामिल हैं. रघुराम राजन ने कहा कि ‘उन्होंने चुनाव आयोग से चुनाव पूर्व इस तरह की घोषणाओं पर रोक लगाने की भी मांग की है.’ नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने बताया कि, ‘कृषि क्षेत्र में संकट के लिए कृषि ऋण माफी कोई समाधान नहीं है बल्कि इससे केवल कुछ ही समय के लिए किसानों को राहत मिलेगी.’

विवेक राय, कृषि जागरण



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