मिलावटी दूध से हो रहा नुकसान

दूध में मिलावट कर मुनाफा कमाने वाले तो बहुत हैं, एक और तो यह कहा जा रहा है कि देश में दूध का उत्पादन काफी मात्रा में हो रहा है. श्वेत क्रांति के जनक कुरियन ने जहाँ दूध से अतिरिक्त आय कर किसान को आत्मनिर्भर बनाने की ओर उचित कदम उठाये वहीँ उन्होंने ग्रामीण महिलाओं में सहकारिता की समझ को भी नयी पायदान तक पहुँचाया.

एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कई ऐसी किट का विकास किया है, जिससे मिलावटी दूध में डिटर्जेंट, एसिड या कुछ ऐसे ही पदार्थों की मिलावटों को आसानी से जांचा परखा जा सकता है. इन में हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, हिसार व दिल्ली मिल्क स्कीम के वैज्ञानिकों ने भी ऐसी किट का अविष्कार किया है, जिससे मिलावट का पता लगाया जा सकता है.

दूध और दुग्ध उत्पादों में मिलावट की घटनाएं कितनी आम हो चुकी हैं। दुग्ध पदार्थो में व्यापक स्तर पर हो रही यह मिलावट इंसान की सेहत के लिए बहुत हानिकारक है, लेकिन इसे रोकने की जगह भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) दूध के सुदृढ़ीकरण पर जोर देने पर उतारू है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने हाल ही में संसद को बताया कि देश में बिकने वाला 68 प्रतिशत दूध मिलावटी है। यह जानकर देश में किसी को कोई हैरानी नहीं हुई।

 दूध के सुदृढ़ीकरण का मतलब है दूध में विटामिन वगैरह मिलाकर उसे और पौष्टिक बनाना। अब जिस दूध में भारी मात्रा में मिलावट हो उसकी पोषकता बढ़ाने से क्या फायदा।

उदाहरण के लिए पंजाब में, मिलावटी दूध और दुग्ध पदार्थों के खिलाफ महीने भर चले अभियान में लिए गए दूध और दुग्ध पदार्थों के नमूनों में से 40 फीसदी फेल हो गए। कुछ जिलों में तो 70 से 80 फीसदी नमूनों में मिलावट पाई गई।

ऐसे में जब शौचालय साफ करने में इस्तेमाल होने वाले सल्फ्यूरिक एसिड को यूरिया और डिटर्जेंट के साथ मिलाकर नकली पनीर और नकली दूध बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है दूध के सुदृढ़ीकरण से किस तरह का लाभ होगा?

पहली बार नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन(एनआईएन) ने बच्चों में ऑर्गेनोफास्फेट वर्ग के रासयनिक कीटनाशकों की मौजूदगी पर एक विस्तृत शोध किया। इसमें पाया गया कि अमेरिका, यूरोप और कनाड़ा के बच्चों की तुलना में अकेले हैदराबाद के बच्चों के शरीर में भोजन के जरिए 10 से 40 गुना ज्यादा कीटनाशक पहुंच रहा है।

मौजूदा समय में भारत में खाद्य सुरक्षा के जो मानक हैं उस आधार पर यह मानने में दो राय नहीं है कि देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले बच्चे लगभग इतना ही जहरीला या इससे ज्यादा जहरीला भोजन खा रहे हैं। 

 

चंद्र मोहन

कृषि जागरण

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