पश्चिम बंगाल में मीठे पानी की मछलियों की विविधता

देश में मछली पालन किसानों के काफी तेज़ी से बढ़ रहा है और इसका मुख्य कारण है इससे होने वाला मुनाफा क्योंकि इसमें किसानों को लागत कम और मुनाफा ज्यादा है. पश्चिम बंगालए मीठे पानी की मछलियों का उपयोग करने वाला भारत का एक प्रमुख एवं एकमात्र राज्य है जो हिमालय श्रृंखला से बंगाल की खाड़ी तक फैला है. पश्चिम बंगाल मीठे पानी में विचरण करने वाली मछलियों के लिए काफी समृद्ध माना जाता है. यह लाटिटूड 21०38’ - 27०10’  नॉर्थ तथा लोंगीटुड  8538’ - 8950’   ईस्ट पर स्थित है. उत्तर में हिमालय के बीच संक्रमणकालीन क्षेत्र और दक्षिण एवं पूर्वी खण्डों में गंगादृब्रह्मपुत्र डेल्टा के पश्चिमी मैदानों में छोटा नागपुर पठार में स्थित लगभग 6.08 हेक्टेयर क्षेत्र जिसमें तालाबों टेंकों (2.88 लाख हेक्टेयरद्ध) बील और बोर 0.41 लाख हेक्टेयर जलाशय (0.27 लाख हेक्टेयर) 22 नदी घाटियां (1.72 लाख हेक्टेयर) और नहर 0.80 लाख हेक्टेयरद्ध के रूप में मीठे पानी के मत्स्य पालन के लिए काफी उन्नत और समृद्धशाली क्षेत्र माना जाता र्हैं. इसके अलावा बंगाल की प्रमुख नदी क्षेत्र में गंगा ब्रहमपुत्र एवं स्वर्णरेखा और छोटे तटीय नदी जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र प्रदान करता है.

पश्चिम बंगाल में समृद्ध मीठे पानी की मछली एक आनुवंशिक संसाधन है जो भारत में मीठे पानी की मछलियों की विविधता का एक प्रमुख भाग है. बंगाल में मीठे पानी में पाये जाने वाली मछलियों के ऊपर प्रस्तुत की गई प्रमुख दस्तावेजों में वर्णित किया गया है कि मीठे पानी में पाये जाने वाली मछलियों में अलंकारी मछलियों का विशेष महत्व है जोकि प्रकाशित प्रकाशनों से स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है. चूंकि पश्चिम बंगाल मीठे पानी की मछलियों का उपयोग करने वाला एक प्रमुख राज्य है इस कारण छोटी स्वदेशी मछली का बहुतायत मात्रा में उपयोग से उनकी विविधता में अमूल परिवर्तन परिलक्षित होने लगा है जिसके कारण आक्रामक स्वभाव की विदेशी प्रजाति मछलियों की संख्या बहुतायत और मछलियों की जैव विविधता में एक व्यापक परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. देशी मछलियों की प्रजातियों में विलुप्त का मुख्य कारण निवास स्थान में कमी एवं उनकी प्रजातियों के बारे में स्पष्ट जानकारी की कमी प्रमुख है क्योंकि मछलियों की प्रजातियों की संरचना एवं वितरण पद्धतियों का ज्ञान मछलियों के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए आवश्यक है. मीठे पानी की इन जैव विविधता को संतुलित करने के लिए आज संरक्षण एवं प्रबंधन रणनीतियों के लिए व्यापक योजना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है.

अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आई.सी.यू.एन.) लाल सूची की संरक्षण की स्थिति की आधार पर पश्चिम बंगाल में पाये जाने वाली लगभग लगभग 17.97 प्रतिशत मछलियों की स्पीशीज संकट या संकट के निकट है जबकि लगभग 82.02 प्रतिशत मछलियों की स्पीशीज पर जैव विविधता का संतुलन बनाए रखने में अभी तक सफल है। मीठे पानी की मछलियों की कुल 267 स्पीशीज में से 109 अलंकारी मछलियांए 92 खाद्य मछलियांए 66 अलंकारी एवं खाद्य मछलियों की स्पीशीज मौजूद हैं जिसमें 11स्पीशीज लुप्तप्राय की स्थिति में है. 11 स्पीशीज कमजोर वर्ग के अन्तर्गत आती है जबकि 27 स्पीशीज संकट के निकट है. मीठे पानी की 168 स्पीशीज के विलुप्त होने का संकट अभी चिंता का विषय नहीं है. मछलियों की 22 स्पीशीज की पर्याप्त जानकारी एवं 28 प्रजातियॉ मूल्यांकित नहीं है. मीठे पानी की मछलियों की संगटग्रस्त स्पीशीज में गुडिसिआ छपरा, बोटिअ अलमोरह, बोटिअ लोहचता, टोर पुटिटोरा, टोर टोर, अप्लीकेप्स अरुणाचलेसिस, क्लैरिअस मागुर, पंगसिआनदोन ह्यपोपिथलमुस, पिल्लाइआ इंडिका प्रमुख है. वर्षो से विदेशी मछलियों की 13 प्रजातियां पश्चिम बंगाल के मीठे पानी में सूचित की गयी है.

पश्चिम बंगाल में मीठे पानी की मछलियों की विविधता

आर्डर              फॅमिली (संख्या)      जेनरा (संख्या)       स्पीशीज (संख्याद्ध)

अन्गुइलिफोर्मेस             2                 3                 3

बेलोनीफॉर्मेस               1                 1                 1    

क्लोपीफॉर्मेस               2                 5                 8

कीपरिनिफोर्मेस            4                 46                117

कीपरिनोडोंटिफॉर्मेस       2                 3                 3

मुगिलीफोर्मेस              1                 2                 2

ोस्टोग्लोसिफोर्मेस         1                 2                 2

पर्सिफ़ॉर्मेस                10                17                39

सीलूरीफॉर्मेस             12                36                79

सयंबरांचीफॉर्मेस            3                 5                 9

सिन्ग्नाथिफोर्मेस              1                 1                 2

टेट्रडोंटिफॉर्मेस              1                 2                 2

कुल 12                    कुल 40           कुल 123          कुल 267

 

लेखक:

ह.श. मोगलेकर1, ज.कॉन्सियल2, इ. बिस्वास2 और रमेश कुमार1

1मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय एवं अनुसंधान संस्थान, तुत्तुकुड़ी - 628 008, तमिल नाडु, भारत

2पश्चिम बंगाल पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय, कोलकाता- 700 094, पश्चिम बंगाल, भारत

लेखत संवाद इ-मेल : mogalekar.hs10@gmail.com

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