1. खेती-बाड़ी

खरीफ में ऐसे करें मूंगफली की खेती, समझिए संपूर्ण प्रक्रिया

भारत में मूंगफली की अपनी ही महत्वता है. इसकी लोकप्रियता को देखते हुए लोग इसे ‘गरीबों का काजू' भी कहते हैं. इसमें पौष्टिक तत्वों का भंडार पाया जाता है, जो हमारे शरीर के लिए बहुत ही लाभदायक है. आधे मुट्ठी मूंगफली के सेवन से ही 426 कैलोरीज़, 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 17 ग्राम प्रोटीन और 35 ग्राम वसा प्राप्त हो जाता है. इतना ही नहीं मूंगफली को विटामिन ई, के और बी6 का श्रोत भी माना जाता है. बाजार में मूंगफली की मांग इसलिए भी है, क्योंकि इसमें आयरन, नाइयासिन, फोलेट, कैल्शियम और जि़ंक भरपूर मात्रा में होता है. शाकाहारी लोग जो मांस का सेवन नहीं करते, उन्हें मूंगफली खाना चाहिए. इससे शरीर को मांस के मुकाबले 1.3 गुना अधिक प्रोटीन मिलता है. चलिए आज आपको इसकी खेती के बारे में बताते हैं.

इस जलवायु में हो सकती है मूंगफली की खेती

मूंगफली की फसल उष्ण कटिबन्ध के साथ-साथ समशीतोष्ण कटिबन्ध क्षेत्रों में भी आराम से हो सकती है. जिन स्थानों पर गर्मी अधिक पड़ती है, वहां भी इसकी खेती की जा सकती है. मूंगफली को थोड़े पानी, पर्याप्त मात्रा में धूप तथा सामान्यतः कुछ अधिक तापमान की आवश्यक्ता होती है. इसलिए अगर आपके क्षेत्र में रात में तापमान अधिक गिर जाता है, तो इसकी खेती आपके लिए लाभदायक नहीं है. यही कारण है कि 3,500 फिट से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों पर इसकी खेती नहीं की जाती है.

तापमान

मूंगफली की खेती के लिए अधिक वर्षा, अधिक सूखा तथा ज्यादा ठंड का होना सही नहीं है. अंकुरण एंव प्रारंभिक वृद्धि के लिए 14 डिग्री से -15 डिग्री तक का तापमान सही है. इसी तरह फसल की वृद्धि के लिए 21-30 डिग्री का तापमान होना चाहिए.

वर्षा

मूंगफली के पौधों की वृद्धि एंव विकास के लिए सुवितरित 37-62 सेमी वर्षा का होना सही है. आम तौर पर इसके लिए उन क्षेत्रों को उपयुक्त समझा जाता है, जहां वर्षा 50 से 125 सेमी. प्रति वर्ष (औसत) होती है.

मौसम

मूंगफली की खेती मुख्य तौर पर खरीफ मौसम में की जाती है, जबकि बाकि कार्यों को जायद मौसम में किया जाता है. अच्छी उपज के लिए फसल पकने तथा खुदाई के एक माह तक गर्म तथा स्वच्छ मौसम का होना जरूरी है. कटाई के समय मौसम साफ होना चाहिए। ध्यान रहे कि इस दौरान वर्षा हो भी, तो उसका पानी खेतों में न भरने पाए. गिली मिट्टी में एक तो इसकी खुदाई कठिन हो जाती है, वहीं मूंगफली का रंग भी बदल जाता है. फलियों में कई बार बीज भी उग आते हैं.

ऐसे करें खेत की तैयारी

मूंगफली की खेती से पहले 10-15 सेंटीमीटर गहरी जुताई करनी चाहिए. ध्यान रहे कि खेत की जुताई जितनी गहरी होगी, भूमि में मूंगफलियों का बनना उतना ही आसान होगा. अपने क्षेत्र की मिट्टी के अनुसार जुताई करने के लिए यंत्रो का चयन कर सकते हैं. जैसे अगर भूमि हलकी है, तो सामान्य जुताई से काम चल जाएगा. लेकिन अगर मिट्टी भारी है, तो जुताई अधिक बार करनी पड़ेगी. मध्य भारत में प्रथम जुताई बक्खर से और बाद की 5-7 जुताई से देसी हल व कल्टीवेटर से करनी चाहिए. अगर आपके क्षेत्र में बक्खर का प्रयोग नहीं किया जाता, तो प्रथम जुताई के लिए मिटटी पलटने वाले हल का प्रयोग किया जा सकता है. इसी तरह अगर आपके पास उन्नत कृषि यंत्र जैसे हैरो आदि हैं, तो उन्हें मिट्टी को भूरभूरा बनाने के लिए उपयोग किया जा सकता है. पहली वर्षा होने पर ही अगर हैरो का उपयोग किया जाए तो और बेहतर है.

संकर बीज

पूराने किस्मों की अपेक्षा नई उन्नत किस्मों से अच्छी उपज प्राप्त होने की संभावना है. नए किस्मों पर कीटों तथा रोगों का प्रकोप भी कम होता है एवं इनकी बुवाई भी आसान है.

एके-12-24

इस किस्म की खासियत है कि यह 100-105 दिनों में तैयार हो जाती है. इसमें फलियों की उपज प्रति हैक्टर 1250 किलोग्राम तक हो सकती है. फलियों से 75 प्रतिशत तक दाना प्राप्त हो सकता है. दानो में से 48.5 प्रतिशत तेल की प्राप्ति हो सकती है.

जे-11

इसे एक गुच्छेदार किस्म के रूप में जाना जाता है. लगभग तीन महीनों में यह तैयार हो जाते हैं. इससे 1300 किलोग्राम उपज (प्रति हैक्टर)प्राप्त हो सकती है. इसके लिए खरीफ का मौसम एवं गरम स्थान उपयुक्त हैं. फलियों से 75 प्रतिशत दाना और 49 प्रतिशत तेल प्राप्त होता है.

ज्योति

मूंगफली की यह किस्म गुच्छेदार होती है. यह लगभग तीन मीहनों में तैयार हो जाती है एवं इससे 1600 किलोग्राम प्रति हैक्टर फलियां पैदा हो जाती है. फलियों से 77.8 प्रतिशत दाना प्राप्त होता है, जबिक 53.3 प्रतिशत तेल की प्राप्ती होती है.

कोंशल (जी-201)

इस किस्म को मध्यम फैलने वाली किस्म के रूप में जाना जाता है. यह 108 से 112 दिन में पककर तैयार हो जाती है और इससे 1700 किलोग्राम प्रति हैक्टर फलियां प्राप्त होती है. फलियों से 71 प्रतिशत दाना प्राप्त होता है और 49 प्रतिशत तेल मिलता है.

कादरी-3

मूंगफली की यह किस्म भी लगभग 105 दिनों में तैयार हो जाती है और इसकी उपज 2100 किलोग्राम तक होती है. फलियों से 75 प्रतिशत दाना मिलता है, जबकि 49 प्रतिशत तेल की प्राप्ति होती है.

बुवाई के मुख्य तरीकें

मूंगफली की बुवाई कई तरीकों से हो सकती है. यहां हम आपको मुख्य तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं.

हल के पीछे बुवाई

इस विधि में देसी हल के पीछे से बीजों की बुवाई की जाती है. बीजों की बुवाई 5-6 सेंटीमीटर गहरे कुण्ड में किया जाता है.

डिबलर विधि

कम क्षेत्रों पर अगर बुवाई करने जा रहे हैं, तो इस विधि का प्रयोग कर सकते हैं. बुवाई के लिए खुरपा-खुरपी या डिबलर का उपयोग कर सकते हैं. इस विधि में सारा काम हाथ से ही होता है, इसलिए श्रम की जरूरत अधिक पड़ती है.

सीड प्लान्टर

अधिक क्षेत्रों में बुवाई करने जा रहे हैं, तो सीड प्लान्टर विधि का प्रयोग कर सकते हैं. इस विधि से बुवाई करने पर समय कम लगता है, हालांकि प्रति इकाई की दृष्टि से देखा जाए, तो खर्च अधिक आता है.

गुड़ाई

मूंगफली की खेती में निराई-गुड़ाई का बहुत अधिक महत्व है. हर 15 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 बार निराई-गुड़ाई होना चाहिए. गुच्छेदार जातियों में मिटटी चढ़ाना लाभदायक है. जब पौधों में फलियां बनने लग जाए, तो निराई-गुड़ाई करना चाहिए.

(आपको हमारी खबर कैसी लगी? इस बारे में अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें. इसी तरह अगर आप पशुपालन, किसानी, सरकारी योजनाओं आदि के बारे में जानकारी चाहते हैं, तो वो भी बताएं. आपके हर संभव सवाल का जवाब कृषि जागरण देने की कोशिश करेगा)

English Summary: this is how you can do Peanuts farming with minimum expanses know more about peanuts harvesting and cultivation

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