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Sugarcane Farming Tips: वैज्ञानिक ढंग से गन्ने की खेती कर बढ़ाएं उत्पादन

वैज्ञानिक तरीके से गन्ने की खेती करने पर फसल की उपज और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है. सही किस्मों का चयन, समय पर बुवाई, बीज उपचार, संतुलित खाद-उर्वरक, उचित सिंचाई, गुड़ाई, मिट्टी चढ़ाना तथा कीट-रोग प्रबंधन अपनाकर किसान गन्ने की खेती को अधिक लाभकारी बना सकते हैं.

KJ Staff
Sugarcane Farming Tips
गन्ने की फसल, फोटो साभार: कृषि जागरण

गन्ना भारत की एक प्रमुख नकदी फसल है, जिसकी खेती यदि वैज्ञानिक विधियों से की जाए तो उत्पादन और लाभ दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है. गन्ने की सफल खेती के लिए उपयुक्त जलवायु, उपजाऊ मिट्टी, सही समय पर बुवाई और उन्नत किस्मों का चयन अत्यंत आवश्यक है. संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग, समयानुसार सिंचाई तथा खरपतवार नियंत्रण फसल की अच्छी बढ़वार में सहायक होते हैं. बीज गन्ने का सही चुनाव, उसका उपचार और भूमि की उचित तैयारी करने से अंकुरण प्रतिशत बढ़ता है.

साथ ही कीट एवं रोग प्रबंधन, मिट्टी चढ़ाना, गुड़ाई और समय पर बंधाई जैसी क्रियाएं गन्ने की गुणवत्ता सुधारती हैं. इन सभी वैज्ञानिक उपायों को अपनाकर किसान कम लागत में अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं और खेती को अधिक लाभकारी बना सकते हैं. ऐसे में आइए इन सभी वैज्ञानिक उपायों के बारे में विस्तार से जानते हैं-

बुवाई का उपयुक्त समय

  • शरद काल - मध्य सितम्बर से अक्टूबर.

  • बसंतकाल

  • पूर्वी क्षेत्र - मध्य जनवरी से फरवरी.

  • मध्य क्षेत्र - फरवरी से मार्च.

  • पश्चिमी क्षेत्र - मध्य फरवरी से मध्य अप्रैल.                                           

उत्तर प्रदेश में स्वीकृत प्रमुख गन्ने की किस्में

1. शीघ्र पकने वाली

को.शा. 8436, 88230, 95255, 96268, को. से. 95422, 03234, 98231, को. लख. 94184 को.शा. 03251, 08272, को. 0118, 0237, 0238, 0239 एवं 98014, यू.पी. 05125, को. लख. 9709, को.से. 01235, को 87263, 87268, को. 89029 को. 0232

 

2. मध्य देर से पकने वाली

को.शा. 767, 8432, 97264, 96275, 97261, 98259, 99259, 94257, 08276, 08279 को. पन्त 84212, को.से. 01434, यू.पी. 0097, 39 को. 0124, 05011 को.से. 5452 को.हे. 119, को. पन्त 97222, को.शा. 96269, को.शा. 07250 को.जे. 20193, को. से. 96436, को. 0233, को.शा. 12232 एवं को. से. 11453

3. जल प्लावित क्षेत्र हेतु

यू.पी. 9530, को.से. 96436 (जल परी)

बीज गन्ना चुनाव व मात्रा

रोग व कीट रहित, प्रचुर मात्रा में खाद वर पानी प्राप्त खेत (पौधाशाला) से शुद्ध बीज का चुनाव करें. गन्ने के ऊपरी 1/3 भाग का जमाव अपेक्षाकृत अच्छा होता है. गन्ने की मोटाई के अनुसार 50-60 कुन्तल (लगभग 37.5 हजार) तीन-तीन आँख के पैड़े प्रति हेक्टेयर) बीज की आवश्यकता पड़ती है. देर से बुवाई करने पर उपरोक्त का डेढ गुना (56.25 हजार तीन-तीन आँख के टुकड़े) बीज की आवश्यकता होती है.

बीज उपचार

(अ) उष्णोपचार: गर्म जल में 52 डिग्री से.ग्रे. पर दो घन्टे तक अथवा आर्द गर्म हवा यन्त्र में 54 डिग्री से.ग्रे. पर 2.30 घंटे तक पैडों को उपचारित करना चाहिए. फसल अवशेष को मत जलाओं, प्रकृति कहे उसे खेत में मिलाओ है.

(ब) रासायनिक उपचार: बाविस्टीन की 112 ग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की 112 लीटर पानी में घोल बनाकर गन्ने के पेड़ों को 10 मिनट डुबोकर उपचारित करना चाहिए.

भूमि उपचार

दीमक नियंत्रण हेतु फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत धूल 25 कि.ग्रा./हे. पेड़ों पर बुरकनी एवं इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस. एल. दर 400 मिली. प्रति हे. को 1875 लीटर पानी में घोल कर पेड़ों पर डालना. अंकुर बेधक व दीमक नियंत्रण हेतु क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत घोल 5.0 लीटर /हे. की दर से 1875 लीटर पानी में घोल कर अथवा फोरेट 10 जी 25 कि.ग्रा./हे. का प्रयोग पेड़ों के ऊपर करके ढकाई करनी चाहिए. अथवा रीजेन्ट 0.3 प्रतिशत दर 20 कि.ग्रा./हे. की दर से प्रयोग करें.

पंक्ति से पंक्ति की दूरी

शरद बुवाई - 90 सेमी.
बसंत बुवाई - 90 सेमी.
देर से बुवाई - 60 सेमी.

संशोधित ट्रेंच विधि से

पंक्ति से पंक्ति की दूरी - 120 सेमी.

प्रति 30 सेमी. दूरी में दो आँख का पैड़ा डालना चाहिए. संशोधित ट्रेन्च विधि में दो आँख के टुकडे 10 सेमी. की दूरी पर एक मीटर में 10-12 टुकडे संभायोजित करें.

खाद की मात्रा

बसंत बुवाई -  180 कि.ग्रा. नत्रजन/हे.
शरद बुवाई -  200 कि.ग्रा. नत्रजन/हे.

प्रयोग समय

नत्रजन उर्वरक की कुल मात्र का 1/3 भाग तथा मृदा परीक्षण के अनुसार भूमि में कमी होने की दशा में 60 से 80 कित्र.ग्रा. फासफोरस एवं 40-60 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हे. की दर से बुवाई से पूर्व कूड़ों में डालना चाहिए. नत्रजन की शेष दो-तिहाई मात्रा दो समान हिस्सों में जून से पूर्व प्रयोग करना चाहिए.

सिंचाई

प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में 4-5 मध्य क्षेत्र में 5-6 तथा पश्चिमी क्षेत्र में 7-8 सिंचाई (दो सिंचाई वर्षो उपरान्त करना लाभप्रद पाया गया है.

गुड़ाई

गन्ने के पौधों के जड़ों की नमी व वायु उपलब्ध कराने तथा खर-पतवार नियंत्रण के दृष्किोण से ग्रीष्मकाल से प्रत्येक सिंचाई के बाद एक गुड़ाई कस्सी/कल्टीवेटर से करना लाभप्रद रहता है.

मिट्टी चढ़ाना

गन्ने के थानों की जड़ पर जून माह के अन्त में हल्की मिट्टी तथा जुलाई में अन्तिम रूप से पर्याप्त मिट्टी चढ़ानी चाहिए.

गन्ने की बंधाई

पहली बंधाई लभगभ 150 सेमी की ऊँचाई पर जुलाई के अन्त में, दूरसरी बधाई पहली बंधाई के लगभग 50 सेमी. ऊपर अगस्त में, तत्पश्चात आवश्यकतानुसार दो पंक्तियों के तीन थानों की एक साथ बधाई (कैंची बंधाई) अगस्त-सितम्बर में करनी चाहिए.

कटाई

फसल की आयु, परिपक्वता, गन्ना जाति अथवा बुवाई के समय के आधार पर नवम्बर से अप्रैल तक कटाई करनी चाहिए.

गन्ने की पेड़ी

प्रजातियों का चयनः क्षेत्र के लिए स्वीकृत जातियों में से ही चुनाव करें.

फसल का चुनाव: बावक गन्ने की अच्छी, शुद्ध रोग व कीट रहित फसल ही पेड़ी के लिए अच्छी होती है.

बावक फसल की कटाई एवं कर्षण क्रियायें: संस्तुति अनुसार फरवरी से मार्च तक भूमि की सतह से बावक की कटाई करना, ठूठों की तेज धार वाले औजार से छटाई करना सूखी पत्तियां जलाना या समान रूप से बिछाना सिंचाई कर मेंडों को गिराना तथा देशी हल या कल्टीवेटर से गुड़ाई करना चाहिए.

नत्रजन: 200 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हे. की आधी मात्रा बावक की कटाई उपरान्त सिंचाई के बाद, शेष नत्रजन व्यंत आरम्भ होने पर लाईनों में देना चाहिए.

गन्ने के साथ अन्तः फसलें

अन्तः फसलों का चुनावः

गन्ने के साथ अन्तः खेती के लिए कम समय में पकने वाली उन्ही फसलों का चुनाव करना चाहिए जो क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी एवं कृषि निवेशों की उपलब्धता तथा स्थानीय मांगों के अनुकूल हो, जिनमें वृद्धि प्रतिस्पर्धा न हो तथा जिसकी छाया से गन्ना फसल पर विपरीत प्रभाव न पड़ता है.

प्रमुख अन्तः फसलें:

(अ) शरदकालीन गेहूँ, मटर, (फली), आलू, लाही, राई, प्याज, मसूर, धनिया, लहसुन, मूली, गोमी, शलजम आदि.

(ब) बसंतकालीन- उरद, मूंग, भिण्डी तथा लोबिया (चारे व हरी खाद के लिए)

गन्ने की खेती में ध्यान रखने योग्य महत्तवपूर्ण बातें

  • अन्तः फसल के लिए अलग से संस्तुति अनुसार उर्वरक की समय की पूर्ति करनी चाहिए.

  • अन्तः फसल काटने के बाद शीघ्रातिशीघ्र गन्ने में सिंचाई व नत्रजन की टापड्रेसिंग करके गुड़ाई करनी चाहिए.

  • रिक्त स्थानों में पहले से अंकुरित गन्ने के पेड़ों से गैप फिलिंग (खाली स्थानों की भराई) करनी चाहिए.

  • जल ठहराव की अवस्था में अविलम्ब जल निकास का प्रबन्ध करना चाहिए.

  • नमी का संरक्षण व खरपतवार नियंत्रण हेतु जमाव पूरा होने के पश्चात रोग/कीट मुक्त गन्ने की पताई की 10 सेमी. मोटी तह पक्तियों के बीच में बिछाना चाहिए.

  • सीमित सिंचाई साधन की स्थिति में एकान्तर नालियों में सिंचाई करना लाभकारी पाया गया है.

  • चोटी बेधक कीट के नियंत्रण हेतु अप्रैल-मई माह में कीट ग्रासित पौधों को खेत से निकालते रहें तथा जून के अन्तिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक खेत में पर्याप्त नमी होने की दशा में 30 कि.ग्रा./हे. की दर से कार्बोफ्यूरान उजी गन्ने की लाइनों में डालें.

  • बेधकों के जैविक नियंत्रण हेतु 51,000 ट्राईकोग्रामा परजीवी/हे. की दर से जुलाई से सितम्बर तक 15 दिन के अन्तराल पर खेत में अवमुक्त करना चाहिए.

  • जलप्लावित क्षेत्रों में यूरिया का 5 से 10 प्रतिशत पर्णीय छिड़काव लाभदायक पाया गया है.

  • वर्षाकाल में 20 दिन तक वर्षा न होने पर सिंचाई अवश्व करनी चाहिए.


लेखक: डॉ. आर. एस. सेंगर, गरिमा शर्मा एवं डॉ शालिनी गुप्ता
पादप जैव प्रौद्योगिकी प्रभाग
सरदार वल्लभभाई पटेल, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ

English Summary: sugarcane farming guide in hindi with modern techniques for sugarcane cultivation Published on: 28 January 2026, 12:05 PM IST

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