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मृदा परीक्षण आमतौर पर पोषक तत्व की मात्रा को निर्धारित करने के लिए मृदा के नमूने के विश्लेषण को संदर्भित करता है जिसमें मुख्य रूप से मृदा की रासायनिक संरचना का पता लगाना हैं जैसे कि अम्लता या क्षारीयता, लवणता का स्तर एक मृदा परीक्षण मिट्टी की उर्वरता या मिट्टी की अपेक्षित विकास क्षमता के साथ-साथ मृदा प्रणालियों में पोषक तत्वों की कमी या अत्यधिक प्रजनन क्षमता से होने वाली विषाक्तता और गैर-आवश्यक अल्प मात्रा वाले तत्वों की उपस्थिति से होने वाले अवरोध को निर्धारित कर सकता है.
मृदा परीक्षण के उद्देश्य मुख्य रूप से मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा एवं मृदा प्रतिक्रिया निर्धारण करना, किसी देश, राज्य या जिले की उर्वरता की स्थिति का आंकलन करना एवं मृदा उर्वरता मानचित्र तैयार करना जो निम्न पहलुओं के लिए आवश्यक होगा:- पोषक तत्वों के पर्याप्तता और कमी वाले क्षेत्रों का वर्णन समय के साथ मिट्टी की उर्वरता में होने वाले बदलाव का निर्धारण, इत्यादि, उर्वरक उपयोग एवं मृदा संशोधन की अनुशंसा करना तथा, किसानों के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार करना.
1955-56 के दौरान भारत अमेरिका के मध्य मिट्टी की उर्वरता और उर्वरक उपयोग के निर्धारण के लिए हुए समझौते के अंतर्गत 16 मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं के साथ भारत में मृदा प्रशिक्षण सेवा की शुरूआत हुई थी. तब से इस कार्यक्रम का विस्तार किया जा रहा है जिसके फलस्वरूप वर्तमान में देश में लगभग 3887 जिला स्तरीय एवं क्षेत्रीय स्तर की मृदा परीक्षण प्रयोगशाला और मोबाइल लैब स्थापित की गई हैं. वर्तमान में उत्तराखंड में कुल 44 मृदा परीक्षण प्रयोगशालायें सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं. मृदा परीक्षण प्रयोगशालायें मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता को दर्शाने वाले भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों की जाँच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.
मृदा परीक्षण का मुख्य उद्देश्य मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा एवं मृदा प्रतिक्रिया निर्धारण करना जिससे प्राकृतिक संसाधनों का कुशल एवं प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित करने मे मदद मिलती है. मृदा में चूने और महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की आवश्यकता को निर्धारित करने का यह सबसे सटीक तरीका है. इसके अतिरिक्त दूषित स्थलों जैसे भारी खनिजों के स्थल की पहचान करने में भी यह उपयोगी है. मृदा परीक्षण द्वारा मिटटी में तुलनात्मक पोषक तत्वों के स्तर को मापा जा सकता है एवं उर्वरकों के लाभदायक एवं सन्तुलित उपयोग के लिए भी यह आधार तैयार करता है.
कृषि में टिकाऊ उत्पादन प्रणाली के लिए मिट्टी परीक्षण में कृषि निवेशों का कुशल उपयोग एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कारक है. जो किसान मिट्टी परीक्षण जैसे कार्यक्रम में शामिल होते हैं उन्हें वांछित उपज स्तर को प्राप्त करने के लिए उर्वरक को बढ़ती मात्रा में उपयोग करना होगा. हालांकि, एक ही फसल के वांछित उर्वरक का प्रकार और मात्रा मिट्टी के प्रकार के साथ बदल जाती है. इसी प्रकार एक ही प्रकार की मिट्टी वाले भिन्न-भिन्न खेतों में भी वांछित उर्वरक मात्रा बदलती जाती है.
मृदा परीक्षण के बिना खेतों में उर्वरक डालना ठीक उसी प्रकार है जिस तरह चिकित्सक की सलाह के बिना दवा लेना. मिट्टी परीक्षण के बिना उर्वरक का उपयोग करने पर पौधे को किसी पोषक तत्व की मात्रा आवश्यकता से अधिक प्राप्त हो सकती है या फिर जिस तत्व की आवश्यकता है, वह बहुत कम मात्रा में प्राप्त हो सकता है. जिसके फलस्वरूप पौधों की वृद्धि सीमित हो सकती है. यह न केवल उर्वरकों की उपव्ययता है बल्कि फसलों की पैदावार वास्तव में उर्वरक के गलत प्रकार एवं गलत मात्रा या अनुचित उपयोग के कारण कम हो सकती है.
मृदा परीक्षण क्या है?
मृदा परीक्षण आमतौर पर मिट्टी के नमूने के विश्लेषण को दर्शाता है. मृदा में विद्यमान पोषक तत्व, उसकी संरचना, तथा अम्लता या पी.एच. स्तर जैसी अन्य विशेषताओं को निर्धारित करने हेतु मृदा परीक्षण किया जाता है. मृदा परीक्षण द्वारा मिट्टी की उर्वरता या मिट्टी की अपेक्षित विकास क्षमता को निर्धारित किया जा सकता है जिसके आधार पर पोषक तत्वों की कमी, अत्यधिक संभावित विषाक्तता एवं उर्वरता संबंधी मृदा तंत्र में गैर आवश्यक खनिजों की उपस्थिति से संभावित दुष्प्रभाव का पता लगाया जा सकता है. मृदा की रासायनिक विश्लेषण द्वारा मिट्टी की प्रतिक्रिया, लवणता, ई.सी., कुल कैल्शियम कार्बोनेट मात्रा, चूने एवं जिप्सम की आवश्यकता, विद्यमान कार्बनिक पदार्थ, और मुख्य पोषक तत्व जैसे की नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, ह्यूमस, कुल गंधक की मात्रा, सूक्ष्म तत्व तथा अन्य भौतिक विशेषताओं (क्षमता, पारगम्यता, घनत्व) का निर्धारण किया जाता है.
मृदा परीक्षण क्यों जरूरी है?
एक सत्त कृषि उत्पादन प्रणाली के लिए प्रायः कृषि निवेशों के संतुलित उपयोग की आवश्यकता होती है. मृदा परीक्षण द्वारा समस्या वाली मिट्टी की संरचना, उर्वरता एवं मृदा संशोधनों की आवश्यकता का पता लगाया जा सकता है. (चित्र 1.)
मृदा परीक्षण के उद्देश्य
चित्र 1. किसान के खेतों से लेकर प्रयोगशाला तक मृदा परीक्षण प्रक्रिया का अवलोकन
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मृदा का नमूना एकत्र करने की विधियाँ
मृदा परीक्षण प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है मृदा का सही नमूना एकत्र करना. मृदा परीक्षण तभी सटीक होगा, जब खेत में से सही प्रतिनिधिक नमूना एकत्र किया जाए. एक खेत, अगर अपेक्षाकृत समान है तथा एक हैक्टेयर क्षेत्रफल से अधिक नहीं है, तो एक नमूना इकाई के रूप में माना जा सकता है. नमूना एकत्र करते समय खेत की ढलान, मिट्टी का रंग, बनावट, प्रबंधन एवं फसल प्रतिरूप को ध्यान में रखना आवश्यक है. इस प्रकार मिश्रित मिट्टी का नमूना जो पर्याप्त रूप से प्रक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हो को एकत्र किया जाना चाहिए. जाँच किए जाने वाले खेत/प्रक्षेत्र से कम से कम 10 भिन्न-भिन्न जगहों से लगभग 15 सें.मी. गहराई से सतही मिट्टी को एकत्रित किया जाना चाहिए. इन दस जगहों से एकत्रित सतही मिट्टी को भली प्रकार मिलाकर, इसमें से केवल 500 ग्राम प्रतिनिधि नमूने को प्रयोगशाला में जाँच के लिए भेजा जाना चाहिए. मृदा का एक अच्छा नमूना एकत्र करने के लिए उचित उपकरणों का उपयोग आवश्यक है. नम एवं नरम मिट्टी से नमूना एकत्र करने के लिए कुदाल या खुरपी उपयुक्त उपकरण हैं. यदि नमूना अधिक नमी वाली या गीली जगह से एकत्र करना हो तो ‘पोस्ट होल आगर‘ एवं यदि नमूना सूखी एवं ठोस जमीन से एकत्र करना हो तो ‘पेंचनुमा (स्क्रू टाइप) ऑगर‘ का प्रयोग किया जाना चाहिए.
खेत से मृदा का नमूना एकत्र करने के उपकरण
मृदा परीक्षण हेतु नमूना एकत्र करने के लिए बहुत से उपकरणों का प्रयोग किया जाता है (चित्र 2). उदाहरणतः कुदाल/खुरपी, बरमा, पॉलिथीन, बाल्टी, स्केल/पटरी, पेन/पेंसिल, मोटे कागज की शीट, पॉलिथीन शीट, नमूना एकत्र करने के लिए थैला, इत्यादि.
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खेत से मिट्टी का नमूना एकत्र करना
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सर्वप्रथम मिट्टी की इकाई (या भूखण्ड) का निर्धारण करें और चुने हुए भूखण्ड के ऊपर एक व्यास/आड़ी रेखा खींचें (चित्र 3).
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जिस स्थान से मिट्टी का नमूना एकत्र किया जाता है, उसे कुदाल से साफ कर लें.
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विपरीत दिशा में खड़े होकर मिट्टी का एक ढेला हटा लें.
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ऐसा करने से ‘वी‘ आकार का एक गड्ढा बन जाएगा. जैसा की चित्र 4 में दर्शया गया है इसकी गहराई 0-15 या 0-30 सेमी. होनी चाहिए.
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गड्ढे के दोनों ओर की बाहरी सतह से ऊपर से नीचे की ओर मिट्टी का लगभग आधा इंच मोटा टुकड़ा बाहर निकाल लें. इस टुकडे़ को ‘फरौ-स्लाइस‘ या ‘कुण्ड का टुकड़ा‘ भी कहा जाता है. मिट्टी का यह टुकड़ा उठाने के लिए कुदाल का इस्तेमाल भी किया जा सकता है.
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8-10 या कभी-कभी 20-30 स्थानों से ‘फरौ-स्लाइस‘ या ‘कुण्ड के टुकड़े‘ इक्कट्ठे कर लें.
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मिट्टी की जगह को एक रंजक (क्रिस-क्रॉस) से यादृच्छिक रूप से चुनें. संपूर्ण भूखंड को विभिन्न साइट में बाँटें. जिस मृदा में कोई स्थानीय समस्या हो उसे साइट के रूप में न चुनें.
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ऊपर बताई गई विधि से एकत्र की गई बल्क मिट्टी को 250-500 ग्राम तक तिमाही प्रक्रिया द्वारा कम करें (चित्र 5).
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जाँच से पूर्व नमूना तैयार करने की विधि
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(क) मृदा नमूना एकत्र करना; (ख) मिट्टी को लकड़ी के फर्श पर मोटी परत के रूप में फैलाना, (ग से ङ) एक चैथाई नमूना लेने की विधि (नमूने के चार भाग करें एवं विपरीत भागों को हटा दें), (च से छ) बचे हुए दो चैथाई भागों को मिलाएँ एवं इस विधि को मृदा का लगभग 500 ग्राम नमूना बचने तक दोहराएं, (ज से ञ) एक प्लास्टिक की थैली के अंदर एवं बाहर लेबल पर बताई गई जानकारी लिखकर चस्पा दें तथा नमूने को इस थैली में डाल दें. थैली को प्रयोगशाला में जाँच के लिए भेंजें. (ट) मृदा परीक्षण से पूर्व 2 मिमी आकार की स्टील की छन्नी से मृदा प्रसंस्करण.
लेबल पर लिखी जानी वाली महत्वपूर्ण जानकारी
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कृषक का नाम, पता एवं दूरभाष नं.
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प्रक्षेत्र संख्या एवं भौगोलिक आंकडे़/जी पी एस संख्या निर्देशांक
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मृदा की बनावट (बलुआ/क्ले/लोम)
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सिंचाई व्यवस्था एवं जल निकासी प्रणाली की उपलब्धता
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उच्च/मध्यम/निम्न ऊँचाई क्षेत्र
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मिट्टी के नमूने की गहराई (0-15/15-30/30-45 से.मी.)
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पिछली फसल की जानकारी- फसल का नाम एवं प्रजाति
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उपयोग किए गए जैविक खाद एवं उर्वरकों के नाम एवं मात्रा यदि लागू हो एवं प्राप्त उपज
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आगामी उगाए जाने वाली फसल की जानकारी- नाम, प्रजाति, मौसम (खरीफ/रबी)
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समस्या, यदि कोई हो तो,
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नमूना एकत्र करने की तिथि
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किसान के हस्ताक्षर
नमूना लेते समय बरतें यह सावधानियाँ
नमूना खेत का सच्चा प्रतिनिधि होना चाहिए. रंग, ढलान, उपजाऊ क्षमता की दृष्टि से भिन्न लगने वाले भागों से अलग-अलग नमूने लें. प्रयोग में लाये जाने वाले औजार, थैलियाँ, आदि बिल्कुल साफ होनी चाहिए. नमूनों को खाद, उर्वरक, दवाइयों, आदि के सम्पर्क में न आने दें. नमूना लेते समय सतह पर पड़ा हुआ कूड़ा, खरपतवार, गोबर, आदि पहले ही हटा दें. पेड़ों के नीचे, खाद के गड्ढ़ों के आस-पास तथा खेत की मेड़ों से लगभग 2 मीटर दूरी तक नमूने न लें.
मृदा परीक्षण का सही समय
फसल बोने या रोपाई करने के एक माह पूर्व, खाद व उर्वरकों के प्रयोग से पहले ही मिट्टी परीक्षण करायें. आवश्यकता हो तो खड़ी फसल में से भी कतारों के बीच से नमूना लेकर परीक्षण के लिए भेज सकते हैं ताकि खड़ी फसल में पोषण सुधार किया जा सके.
मृदा परीक्षण प्रयोगशालायें
देश के लगभग प्रत्येक जिले में मृदा परीक्षण प्रयोगषालायें है. इसके लिए अपने निकटतम कृषि विकास अधिकारी या खण्ड विकास अधिकारी से सम्पर्क कर सकते हैं. वर्तमान में देश में लगभग 3887 जिला स्तरीय एवं क्षेत्रीय स्तर की मृदा परीक्षण प्रयोगशाला और मोबाइल लैब स्थापित की गई हैं. वर्तमान में उत्तराखंड में कुल 44 मृदा परीक्षण प्रयोगशालायें सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं.
रासायनिक जाँच
मृदा विश्लेषण विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं का एक संग्रह है जो न केवल मिट्टी में उपलब्ध पौधों के पोषक तत्वों की मात्रा निर्धारित करते हैं, साथ ही पौधे के पोषण एवं मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए मृदा की रासायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों का भी निर्धारण करता है. मृदा की रासायनिक विश्लेषण द्वारा मिट्टी की प्रतिक्रिया (पी.एच.), लवणता (ई.सी.), कुल कैल्शियम कार्बोनेट मात्रा, चूने की आवश्यकता, जिप्सम की आवश्यकता, विद्यमान कार्बनिक पदार्थ, और मूल पौध पोषक तत्व, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, ह्यूमस, कुल गंधक की मात्रा, सूक्ष्म तत्व तथा अन्य भौतिक विशेषताओं (क्षमता, पारगम्यता, घनत्व) का निर्धारण किया जाता है.
विश्लेषण की विवेचना
मृदा परीक्षण प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती परीक्षणों की विवेचना करना है. यह आवश्यक है कि पौधों के पोषक तत्वों के अनुप्रयोगों के प्रति फसल की प्रतिक्रियाओं के आंकड़ों का मृदा परीक्षण के परिणामों से अंशशोधन अवश्य किया जाना चाहिए (चित्र 6), तभी प्रयोग किए गए पोषक तत्वों की दर से प्राप्त हुई उपज को मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा से संबधित किया जा सकता है. दीर्घकालिक प्रक्षेत्र प्रयोगों के आधार पर विभिन्न प्रकार की मृदा पर किए गए परीक्षण अंशांकन अध्ययनों का उपयोग एक निश्चित फसल के लिए एक निश्चित मृदा परीक्षण स्तर पर पोषक तत्वों की मात्रा अनुशंसित करने के लिए किया जाता है.
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फसलवार उर्वरक संस्तुति
दीर्घकालिक प्रक्षेत्र परीक्षण के परिणामों के आधार पर उर्वरकों की अनुशंसा या निर्धारण में संशोधन किए जाने की आवश्कता है. तालिका 1 में विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकियों के लिए दीर्घकालिक प्रक्षेत्र प्रयोगों के आधार पर विभिन्न फसलों के लिए उर्वरक की संस्तुत मात्रा प्रदर्शित की गई है.
मृदा परीक्षण के परिणमों का मूल्यांकन/रेटिंग
मृदा परीक्षण के परिणामों के आधार पर मिट्टी को विभिन्न श्रेणियों में बाँटा गया है (तालिका 2 एवं 3).
मृदा परीक्षण के लाभ
मृदा परीक्षण रिर्पोट प्रायः नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, जिप्सन तथा चूने के लिए उचित उर्वरक प्रयोग की संस्तुति प्रदान करने में सहायक है. साथ ही मृदा परीक्षण फसल की सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता को निर्धारित भी करता है. यदि कृषक संस्तुत मात्रा से बहुत कम उर्वरक का प्रयोग करते हैं, तो फसल कम पैदा होगी तथा मुनाफा भी कम होगा. वहीं, अगर संस्तुत मात्रा से अधिक उर्वरक का प्रयोग करेंगे, तो समय एवं पैसे का अनावश्यक व्यय तो होगा ही, साथ ही पोषक तत्वों के अपवाह के कारण पर्यावरण को भी क्षति होगी. इसका आशय यह है कि मृदा परीक्षण फार्म प्रबंधन का एक साधन है जिसके द्वारा कम निवेश से अधिक पैदावार प्राप्त की जा सकती है तथा पर्यावरणीय जोखिम को भी कम किया जा सकता है. इसके अलावा फसल की परिपक्वता एवं गुणवत्ता में सुधार, रोग और कीट क्षति के प्रति सहिष्णुता एवं फसल में अधिक वृद्धि भी मृदा परीक्षण के अतिरिक्त लाभ हैं.
निष्कर्ष
फसलों में उर्वरक की संस्तुत मात्रा निर्धारण के लिए मृदा परीक्षण एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. मृदा परीक्षण से किसानों को अपने खेत की मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की वास्तविक मात्रा एवं भावी सस्य स्वरूप के बारे में पता चलता है. वे फसल के बेहतर विकास के लिए रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग किए बिना सावधानीपूर्वक योजना बना सकते हैं. मृदा परीक्षण के आधार पर कृषकों को प्रति 3 वर्ष के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड भी दिए जा रहे हैं ताकि वह खेत में उपलब्ध पोषक तत्वों का कुशल प्रबंधन कर अधिक पैदावार प्राप्त कर सकें. किसानों को 725 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड वितरित किये जा चुके हैं.
लेखक: महिपाल चैधरी, कुशाग्रा जोशी, विजय सिंह मीणा, मनोज परिहार, एस सी पांडे, आर पी यादव, जे के बिष्ट और लक्ष्मीकांत
भाकृअप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा-263601, उत्तराखण्ड
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