कपास एक ऐसा फसल है जिसका देशभर में इस्तेमाल किया जाता हैं. कपास यानि रूई को उत्पादन संबंधी रूप में ‘स्वेत स्वर्ण’ के नाम से भी जाना जाता है. ये कई कामों में काफी उपयोगी मानी जाती है. इसकी जरूरत विदेशों में भी पड़ती है. इसीलिए इसकी खेती में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन की आवश्यकता होती है. यदि आज नई तकनीक को अपनाकर वैज्ञानिक विधि से कपास की खेती को किया जाए तो किसानों को कपास की अच्छी पैदावार मिल सकती है. तो आइये आज हम आपको बताते है कि किस तरह से खेती करने पर आपको कपास की अच्छी फसल प्राप्त हो सकती है-
कपास की खेती करें ऐसे
कपास की खेती को करने के लिए सभी तरह की जमीन ही उपयुक्त मानी जाती है, फिर भी दोमट भूमि को कपास की खेती के लिए काफी सर्वोत्तम माना जाता है. बुलाई मिट्टी, क्षारीय भूमि, और कंकड़ से भरी हुई भूमि पर कपास की खेती को नहीं किया जा सकता है. कपास की खेती के लिए भूमि की तैयारी करने से पहले खेत की जुताई को लगभग 25 सेमी गहरा करना चहिए. खेत के जरूरत के मुताबिक, दुबारा से 2 से 3 बार देशी हल को चलाकर खेत की जुताई कर दें और उसके बाद उसे भुरभुरा करकें फिर से भूमि को समतल बनाकर उस पर खेती करनी चाहिए.
जलवायु
कपास की खेती के जमाव के लिए न्यूनतम 16 डिग्री सेल्शियस तक का तापमान होना चाहिए. फसल के विकास के समय लगभग 21 से 27 डिग्री तक का तापमान और फसल तैयार होने के समय में 27 से 32 डिग्री तक के तापमान की आवश्यकता पड़ती है.
कपास की प्रजातियां के बारे में
कपास की दो तरह की प्रजातियां होती हैः
1. देशी प्रजातियां
2. अमेरिकन प्रजातियां
कपास का उत्पादन उनकी प्रजातियों पर ही निर्भर करता है. देशी प्रजातियों वाली कपास जैसे की लोहित, आर.जी 8 आदि की लगभग 15 क्विंटल पर हेक्टेयर उपज होती है तो वही अमेरिकन प्रजाति वाली कपास जैसे की एच 77 , एफ 846 की उपज लगभग 12 से 14 क्विंटल पर हेक्टेयर हो होती है.
बीज बुआई का समय
कपास की बीज की बुआई उसकी प्रजाति पर निर्भर करती है. कपास की देशी प्रजातियों की बुआई शुरूआती अप्रैल में और अमेरिकन प्रजाति की कपास की बुआई अप्रैल के दूसरे सप्ताह से लेकर मई तक की जा सकती है. बुआई के समय इनके लाइन की दूरी कम से कम 70 सेमी होनी चाहिए और पौधे से पौधे की बीच की दूरी 30 सेमी होनी चाहिए।. एक जगह पर केवल 3 से 4 बीजों को ही बोना चाहिए. इसकी खेती में बीज की मात्रा भी इसकी प्रजाति के अनुसार ही डाली जाती है जिसके सहारे आसानी से इसकी बुआई की जा सकती है.
खाद प्रबंधन
कपास की खेती में खाद व उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की जांच के आधार पर ही की जा सकती है. अगर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी पाई जाती है तो खेत की आखिरी जुताई के समय में ही मिट्टी में गोबर की सड़ी हुई खाद को मिला देना चाहिए. गोबर की खाद के साथ खेत की आखिरी जुताई करते समय 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 30 किलोग्राम फास्फेरस इस्तेमाल किया जाना चाहिए. उसके बाद दोबारा लगभग 30 किलोग्राम नाइट्रोजन की मात्रा को इस्तेमाल पौधे में फूल आने के बाद 2 बार करके करना चाहिए, चूंकि मौसम में कभी भी बदलाव आ सकता है, इसीलिए कपास के बीज को सीधे जमीन में ना बोये, इसके उलट इसके बीज को मेड़ों पर बोये ताकि कपास के पौधे को मौसम के प्रभाव से कोई भी नुकसान ना हो.
रोग व कीट नियंत्रण
शाकाणु झुलसा रोगः- इस रोग से बचने के लिए खड़ी फसल में बारिश शुरू होते ही लगभग 1.25 ग्राम कॉपरआक्सीक्लोराइड, 50 प्रतिशत सोलवल पाउडर और 50 ग्रांम एग्री मेनिस को पर हेक्टेयर की दर से लगभग 800 ली पानी में मिक्स करके फसल पर दो बार छिड़काव हर 25 दिन के अंतराल पर करना चाहिए.
कीटों के नाम:- गूलर भेदक, सफेद माहू कीट, हरा फुदका कीट, तेला कीट और थ्रिप्स कीट. इन सभी कीटों पर नियंत्रण पाने के लिए किसी भी कीटनाशक का प्रयोग किया जा सकता है. इसके अलावा कृषि वैज्ञानिकों द्वारा दी गई सलाह के अनुसार भी आप इन पर नियंत्रण पा सकते है.
फसल की बुआई व भंडारण
कपास के पौधे को पूरी तरह से बड़े होने में लगभग 150 से 160 दिन लगते है. कपास की चुनाई प्रातःकाल में ओस के हट जाने के बाद पूरी तरह से खिले हुए गुलारों से की जानी चाहिए. देसी प्रजातियों के कपास की चुनाई लगभग 10 दिन के अंतराल में की जाती है और अमेरिकन कपास की प्रजाति के कपास की चुनाई लगभग 20 दिन के अंतराल में की जाती है. कपास की चुनाई करते इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कपास के साथ उसकी पत्तियां ना रहें. इसके बाद चुनी हुई कपास को भंडारण करने से पूर्व आसानी से सूखा लेना चाहिए. कमरा पूरी तरह से शुष्क होना चाहिए.
किशन अग्रवाल, कृषि जागरण
Share your comments