1. खेती-बाड़ी

करेले की खेती की पूरी जानकारी

स्वाति राव
स्वाति राव

karela

करेला एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है. अपरिपक्व कंद वाले फलों के लिए  करेला की खेती की जाती है, जिनमें एक अनोखा कड़वा स्वाद होता है.  करेले को दुनिया के अन्य हिस्सों में कड़वे तरबूज के रूप में भी जाना जाता है.  वहीं यह भारत में सबसे लोकप्रिय सब्जियों में से एक है. जिसकी खेती पूरे भारत में  बड़े पैमाने पर की जाती है. इसके साथ ही इसमें अच्छे औषधीय गुण भी पाये जाते हैं. इसके फलों में विटामिन ओर खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं.

भारत में करेले की किस्में-

भारत में करेले की प्रमुख किस्में- ग्रीन लांग, फैजाबाद स्माल, जोनपुरी, झलारी, सुपर कटाई, सफ़ेद लांग, ऑल सीजन, हिरकारी, भाग्य सुरूचि ,  मेघा – एफ 1, वरून – 1 पूनम, तीजारावी, अमन नं.- 24, नन्हा क्र. – 13.

जलवायु-

करेले की अच्छी उत्पादन के लिए गर्म और आद्र जलवायु अत्याधिक उपयुक्त होती है. करेला फसल की बढाव के लिए इसका तापमान न्यूनतम 20 डिग्री सेंटीग्रेट और अधिकतम तापमान 35 से 40 डिग्री सेंटीग्रेट के बीच होना चाहिए.

मिट्टी-

करेला की खेती के लिए अच्छी जल निकासी और 6.5-7.5 पीएच रेंज के साथ कार्बनिक पदार्थों से भरपूर बलुई दोमट मिट्टी होनी चाहिए. इस फसल को मध्यम गर्म तापमान की आवश्यकता होती है. करेले के उत्पादन के लिए नदी के किनारे जलोढ़ मिट्टी भी अच्छी होती है.

खेत की तैयारी-

बुवाई से पूर्व जमीन को जोता जाता है और 1-2 क्रॉसवाइज जुताई करके समतल किया जाता है और इसके बाद 2 x 1.5 मीटर की दूरी पर 30 सेमी x 30 सेमी x 30 सेमी आकार के गड्ढे खोदें और बेसिन बनाये जाते हैं.

बुवाई का समय- 

गर्मी के मौसम की फसल के लिए जनवरी से मार्च तक  इसकी बुवाई की जाती है, मैदानी इलाकों में बारिश के मौसम की फसल के लिए इसकी बुवाई जून से  जुलाई के बीच की जाती है, और पहाड़ियों में मार्च से जून तक बीज बोया जाता है.

करेले की बुवाई की विधि -

बीज को डिब्बिंग विधि से 120x90 के फासले पर बोया जाता है, आमतौर पर 3-4 बीजों को 2.5-3.0 सेमी गहराई पर गड्ढे में बोया जाता है. बेहतर अंकुरण के लिए बुवाई से पहले बीजों को रात भर पानी में भिगोया जाता है. बता दें कि बीजों को 25-50 पीपीएम और 25 बोरान के घोल में 24 घंटे तक भिगोकर रखने से बीजों का अंकुरण बढ़ जाता है. फ्लैटबेड लेआउट में बीजों को 1 मीटर x 1 मीटर की दूरी पर डाला जाता है.

खाद एंव उर्वरक-

उर्वरकों की मात्रा, किस्म, मिट्टी की उर्वरता, जलवायु और रोपण के मौसम पर निर्भर करती है. आमतौर पर अच्छी तरह से विघटित एफवाईएम 15-20 टन/हेक्टेयर के हिसाब के अनुसार इसको जुताई के दौरान मिट्टी में मिलाया जाता है. प्रति हेक्टेयर उर्वरक की अनुशंसित मात्रा 50-100 किग्रा नाइट्रोजन, 40-60 किग्रा फास्फोरस पेंटोक्साइड और 30-60 किग्रा 25 पोटेशियम ऑक्साइड है. रोपण से पहले आधा नाइट्रोजन, फास्फोरस  और पोटैशियम डालना चाहिए. इसके बाद नाइट्रोजन फूल आने के समय दिया जाता है. उर्वरक को तने के आधार से 6-7 सेमी की दूरी पर एक छल्ले में लगाया जाता है. फल लगने से ठीक पहले सभी उर्वरक अनुप्रयोगों को पूरा करना बेहतर होता है.

सिंचाई-

बीजों को डुबाने से पहले और उसके बाद सप्ताह में एक बार घाटियों में सिंचाई की जाती है. फसल की सिंचाई वर्ष आधारित होती है.

निराई-गुड़ाई -

फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए 2-3 बार निराई-गुड़ाई करनी पड़ती है. सामान्यत: पहली निराई बुवाई के 30 दिन बाद की जाती है. बाद की निराई मासिक अंतराल पर की जाती है.

तुड़ाई -

करेले की फसल को बीज बोने से लेकर पहली फसल आने में लगभग 55-60 दिन लगते हैं. आगे की तुड़ाई 2-3 दिनों के अंतराल पर करनी चाहिए, क्योंकि करेले के फल बहुत जल्दी पक जाते हैं और लाल हो जाते हैं. सही खाद्य परिपक्वता अवस्था में फलों का चयन व्यक्तिगत प्रकार और किस्मों पर निर्भर करता है. आमतौर पर तुड़ाई मुख्य रूप से तब की जाती है जब फल अभी भी कोमल और हरे होते हैं, ताकि परिवहन के दौरान फल पीले या पीले नारंगी न हो जाएं. कटाई सुबह के समय करनी चाहिए और फलों को कटाई के बाद छाया में रखना चाहिए.

उपज-

करेले की उपज खेती की प्रणाली, किस्म, मौसम और कई अन्य कारकों के अनुसार भिन्न होती है. औसत फल उपज 8 से 10 टन / हेक्टेयर तक होती है.

खपत-

करेले की उपज खेती की प्रणाली, किस्म, मौसम और कई अन्य कारकों के अनुसार भिन्न होती है. औसत फल उपज 8 से 10 टन / हेक्टेयर तक भिन्न होती है.

English Summary: Complete information about Bitter gourd cultivation

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