1. सम्पादकीय

बासमती चावल केवल भारत का ही है - क्या पाकिस्तान को भी कभी जी आई टैग मिलेगा ?

चन्दर मोहन
चन्दर मोहन
Basmati

चावल कहीं किसी घर में पक रहा हो तो उसकी खुशबू से ही मन और मस्तिष्क दोनों ही एक अलग तरह का सुकून महसूस करते हैं. हम बात कर रहे हैं बासमती चावल की. यह बासमती चावल की एक अपनी पहचान है और इसकी लम्बाई और खुशबू का कोई मुकाबला नहीं. दुनिया के अधिकतर देश खाने में चावल का इस्तेमाल करते हैं.  जाहिर है, 80 प्रतिशत से अधिक का  चावल का निर्यात भारत से ही होता है . दो से ढाई लाख टन चावल यूरोपीय संघ के देशों में भेजा जाता है .

पाकिस्तान यह दावा करता रहा है  कि विश्व में बासमती चावल का निर्यात 5 से 7 लाख टन है और इस उपमहाद्वीप में पाकिस्तान भी ऐसा ही चावल पैदा करता है तो फिर उसका चावल यूरोपीय संघ के देश केवल जी आई टैग न होने से पाकिस्तान के चावल को कोई मान्यता नहीं मिली हुई.

चलिए जानते हैं की इसकी वजह क्या हैं?

भारत ने 2018-19 में 44,14,562 मिट्रिक टन बासमती चावल एक्सपोर्ट (Basmati Rice Export) किया था, जिससे 32,804.19 करोड़ रुपये मिले थे. असली लड़ाई इसी एक्सपोर्ट की है. जिससे राज्य को पैसा मिलता है. भारत से ईरान, सऊदी अरब, इराक, यूएई, यमन, कुवैत, यूएसए, यूके, ओमान और कतर आदि में यह चावल एक्सपोर्ट होता है.

भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है.

राइस एक्सपोर्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष बी वी कृष्ण राव कहते हैं कि 2020 में भारत से चावल का निर्यात 1.4 करोड़ टन हो सकता है, जो पिछले साल 99 लाख टन था. उन्होंने कहा कि सूखे कारण थाईलैंड में चावल का उत्पादन घटा है, जिससे निर्यात भी कम होने का अनुमान है. इसके अलावा वियतनाम कम फसल के कारण निर्यात में कटौती कर रहा है. ऐसी स्थिति में भारत ही चावल की आपूर्ति करेगा.

अच्छे मानसून और खरीफ सीजन में बुआई का रकबा बढ़ने से उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर हुआ है.  रॉयटर्स के मुताबिक इस साल चावल का निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है. इसकी दो वजह हैं- पहली कि भारत के अन्य देशों से कम कीमत पर चावल का निर्यात करता है. दूसरी कि इस बार थाईलैंड में सूखे के कारण चावल का उत्पादन प्रभावित हुआ है.

गौरतलब है कि भारत मुख्य रूप से बांग्लादेश, नेपाल, बेनिन और सेनेगल को गैर-बासमती चावल का निर्यात करता है. जबकि बासमती चावल मुख्य रूप से मिडिल ईस्ट के देशों जैसे ईरान, सऊदी अरब और इराक को निर्यात करता है.

क्या है जीआई टैग?

जीआई टैग, वस्तुओं का भौगोलिक सूचक (पंजीकरण और सरंक्षण) अधिनियम, 1999 (Geograph.cal .nd.cat.ons of goods ‘Reg.strat.on and Protect.on’ act, 1999) के तहत दिया जाता है, जो सितंबर 2003 से लागू हुआ था. जो चीजें एक खास मौसम, पर्यावरण या मिट्टी में पैदा होती हैं उनके लिए जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग दिया जाता है. यह एक प्रकार के बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत आता है.

दूसरे शब्दों में कहें तो किसी वस्तु, फल या मिठाई को किसी स्थान विशेष का जीआई टैग मिल जाने से इन सभी को उस जगह की स्पेशलिटी मान लिया जाता है. जिससे देशभर में उसे उस जगह के नाम से पहचान मिलती है. जीआई टैग मिलने से उस उत्पादित उत्पाद के साथ क्वालिटी का पैमाना भी जुड़ जाता है. किसानों को इससे फसल के अच्छे दाम मिलते हैं.

अब तक 350 से ज्यादा चीजों को जीआई टैग (G. Tag) मिल चुका है. वर्ष 2004 में ‘दार्जिलिंग टी’ जीआई टैग प्राप्त करने वाला पहला भारतीय उत्पाद है. भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण 10 वर्ष के लिए मान्य होता है.

दुनिया भर में बासमती की बहुत मांग है. ऐसे में जिस इलाके के बासमती को जीआई टैग मिला हुआ है वहां के चावल को असली माना जाता है. इससे उत्पाद का बाजार सुरक्षित हो जाता है. भारत में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के 77 जिलों को बासमती चावल की अलग-अलग किस्मों का जीआई टैग मिला हुआ है.

एपीडा का कहना है कि यदि मध्य प्रदेश को बासमती उत्पादक राज्य माना गया तो यह फैसला उत्तरी राज्यों में बासमती पैदा करने वाले अन्य किसानों को नुकसान पहुंचा सकता है. यदि एमपी भी बासमती उत्पादक राज्यों में शामिल हुआ तो न सिर्फ आपूर्ति बढ़ जाएगी बल्कि बासमती चावल की कीमतें भी गिर जाएंगी और गुणवत्ता पर असर पड़ेगा.

बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड चेन्नई ने मध्य प्रदेश के दावे को पेंडिंग रखते हुए फरवरी 2016 में आदेश दिया था कि वर्तमान में जिन सात राज्यों को बासमती चावल उत्पादक माना गया है, उन्हें मिलने वाली सुविधाएं दी जाएं. जबकि, दिसंबर 2013 में भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्रार (चेन्नई) ने एमपी के पक्ष में निर्णय दिया था.

तब मध्य प्रदेश सरकार ने 1908 व 1913 के ब्रिटिश गजेटियर पेश किए थे, जिसमें बताया था कि गंगा और यमुना के इलाकों के अलावा मध्य प्रदेश के भी कुछ जगहों में भी बासमती पैदा होता रहा है.

एपीडा ने इसके खिलाफ आईपीएबी में अपील कर दी थी. तब एपीडा ने कहा था कि जम्मू एंड कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, यूपी, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के अलावा कहीं भी बासमती चावल का उत्पादन नहीं होता.

पाकिस्तान में जी आई नियमों का कोई प्रावधान ही नहीं हैं. पाकिस्तान का चावल निर्यातक संघ जी आई कानूनों को बनाने के लिए अभी तक गुहार लगा रहा है. पाकिस्तान जी आई टैगिंग के साथ दुनिया में कहीं भी पंजीकृत नहीं किया जा सकता.

अब देखा जाये तो दुनिया को केवल भारत ही बासमती चावल निर्यात कर सकता है.

English Summary: Basmati rice belongs to India only - will Pakistan ever get a GI tag?

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