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Success Story: रासायनिक खेती का खर्च घटाकर जैविक खेती की ओर बढ़े वीरेंद्र सिंह, जायडेक्स की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी से गेहूं की खेती में मिला फायदा

लखीमपुर खीरी के प्रगतिशील किसान वीरेंद्र सिंह ने रासायनिक खेती की लागत घटाने और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाया. जायडेक्स की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों के इस्तेमाल से उन्होंने डीएपी की मात्रा कम करने, मिट्टी की भुरभुराहट और जड़ों के विकास में सुधार तथा गेहूं की उपज 25 से बढ़ाकर 27 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंचने का अनुभव साझा किया.

विवेक कुमार राय
Virendra singh success story
Virendra Singh Success Story

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के रिहरिया गांव के प्रगतिशील किसान वीरेंद्र सिंह ने खेती में बदलाव की शुरुआत मिट्टी की सेहत सुधारने और खेती की लागत कम करने के उद्देश्य से की. लंबे समय तक धान-गेहूं की पारंपरिक खेती करने के बाद उन्होंने धीरे-धीरे रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल कम किया और जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाया. इसी दौरान उन्होंने जायडेक्स की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पादों का इस्तेमाल शुरू किया.

वीरेंद्र सिंह के अनुसार, जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों के इस्तेमाल से उन्हें मिट्टी की भुरभुराहट, जड़ों के विकास और फसल की मजबूती में फायदा देखने को मिला. उनका कहना है कि इन उत्पादों के इस्तेमाल के बाद उन्होंने रासायनिक उर्वरकों, खासकर डीएपी की मात्रा धीरे-धीरे कम की. इससे खेती की लागत घटाने में भी मदद मिली और गेहूं की उपज में भी बढ़ोतरी देखने को मिली.

किसान के अनुसार, पहले जहां उन्हें गेहूं से करीब 25 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन मिलता था, वहीं अब उत्पादन बढ़कर लगभग 27 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गया है. ऐसे में आइए प्रगतिशील किसान वीरेंद्र सिंह की सफलता की कहानी के बारे में विस्तार से जानते हैं-

नौकरी छोड़ी और खेती को बनाया अपना रास्ता

वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि वह वर्ष 2000 से पूरी तरह खेती से जुड़े हुए हैं. हालांकि, खेती शुरू करने से पहले वह शिक्षा और नौकरी से जुड़े थे. नौकरी में मन नहीं लगा तो उन्होंने सर्विस छोड़कर खेती को अपना मुख्य काम बना लिया.

वह कहते हैं कि खेती में आने के बाद उन्होंने अलग-अलग फसलों और खेती की तकनीकों को समझना शुरू किया. आज उनके परिवार के पास करीब 14 हेक्टेयर जमीन है, जिस पर गेहूं, धान, गन्ना, आलू, सरसों समेत कई फसलों की खेती की जाती है.                 

वर्तमान रबी सीजन में उनके खेत में करीब 12 एकड़ में गेहूं की फसल लगी हुई है. खेत में गेहूं की 303 किस्म की खेती की जा रही है, जिसे वह पिछले करीब चार वर्षों से लगा रहे हैं.           

रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर बढ़ाया कदम

वीरेंद्र सिंह का कहना है कि लंबे समय तक लगातार रासायनिक उर्वरकों और कृषि रसायनों के इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता पर असर पड़ता है. उनके अनुभव में एक समय के बाद मिट्टी की उर्वरता और उत्पादन क्षमता में कमी दिखाई देने लगी.

इसी वजह से उन्होंने धीरे-धीरे रासायनिक खेती को कम करने और जैविक खेती की तरफ बढ़ने का फैसला किया. किसान बताते हैं कि पिछले करीब तीन वर्षों से वह इस दिशा में लगातार काम कर रहे हैं.

उनके मुताबिक, जैविक खेती की ओर बढ़ने से मिट्टी की सेहत को बनाए रखने में मदद मिल रही है. साथ ही, वह ऐसी तकनीकों और उत्पादों को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सके.

जायडेक्स की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों का इस्तेमाल

जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ते हुए वीरेंद्र सिंह करीब दो-तीन साल से जायडेक्स के उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं. किसान के अनुसार, बाजार में कई कंपनियों के उत्पाद उपलब्ध हैं, लेकिन उन्हें जायडेक्स के उत्पादों से बेहतर परिणाम मिले.

वह खास तौर पर जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित किट का उल्लेख करते हैं. उनके अनुसार, इस किट में एनपीके, माइकोराइजा और जिंक जैसे पोषक तत्व शामिल हैं, जिसे वह फसल की शुरुआती अवस्था में बेसल डोज के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.

वीरेंद्र सिंह बताते हैं कि इसके इस्तेमाल के बाद उन्हें खेत में डीएपी की मात्रा कम करने में मदद मिली. पहले जहां वह अधिक मात्रा में डीएपी का इस्तेमाल करते थे, अब धीरे-धीरे इसकी मात्रा कम कर रहे हैं.

उनका लक्ष्य रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल और कम करके जैविक उत्पादों पर अपनी निर्भरता बढ़ाना है.

मिट्टी की भुरभुराहट और जड़ों के विकास पर जोर

वीरेंद्र सिंह के अनुसार, धान और गेहूं की लगातार खेती और खेतों में ट्रैक्टरों के अधिक इस्तेमाल से मिट्टी कई बार काफी सख्त हो जाती है. इससे मिट्टी में हवा का आवागमन और जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है.

किसान का कहना है कि जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित उत्पादों के इस्तेमाल के बाद उन्हें मिट्टी की संरचना में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला. उनके अनुसार, मिट्टी पहले की तुलना में अधिक भुरभुरी महसूस होती है.

जब मिट्टी भुरभुरी होती है तो जड़ों को फैलने के लिए बेहतर जगह मिलती है. किसान के मुताबिक, जड़ों का विकास अच्छा होने से पौधे मजबूत होते हैं और फसल को खड़ा रखने में भी मदद मिलती है.

वीरेंद्र सिंह का यह भी कहना है कि मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार दिखाई देता है. इससे फसल को पानी उपलब्ध कराने में मदद मिलती है और पौधों की वृद्धि बेहतर रहती है.

खेती की लागत में आई कमी

खेती में किसानों के लिए लागत हमेशा एक बड़ी चुनौती रहती है. बीज, खाद, दवाइयां, सिंचाई, मजदूरी और मशीनरी का खर्च लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में वीरेंद्र सिंह ने अपनी खेती में लागत कम करने पर भी ध्यान दिया.

किसान के अनुसार, पहले उनकी खेती की लागत करीब 20 से 35 हजार रुपये प्रति एकड़ तक आती थी. अब उन्होंने कुछ कृषि इनपुट कम किए हैं और जैविक उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ाया है.

उनका कहना है कि इससे लागत को करीब 25-26 हजार रुपये प्रति एकड़ के स्तर तक लाने में मदद मिली है. साथ ही, उनका दावा है कि फसल में रोगों की समस्या भी पहले की तुलना में कम दिखाई देती है, जिससे अतिरिक्त खर्च में कमी आती है.

हालांकि, वास्तविक लागत फसल, क्षेत्र, इनपुट की कीमत, मजदूरी और खेती की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.

गेहूं की पैदावार में भी हुआ सुधार

वीरेंद्र सिंह के लिए खेती में बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू उत्पादन भी है. उनका कहना है कि जब वह पूरी तरह रासायनिक तरीके से खेती करते थे, तब गेहूं की उपज करीब 25 क्विंटल प्रति एकड़ रहती थी.

अब उनके अनुसार, उत्पादन बढ़कर लगभग 27 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच गया है. यानी किसान के अनुभव के मुताबिक, प्रति एकड़ करीब दो क्विंटल तक की बढ़ोतरी देखने को मिली है. वीरेंद्र सिंह इस बदलाव का एक कारण मिट्टी की बेहतर स्थिति और जड़ों के अच्छे विकास को मानते हैं.

उनके मुताबिक, मजबूत जड़ों वाली फसल हवा और बारिश जैसी परिस्थितियों में भी अपेक्षाकृत मजबूत रहती है.

मौसम में बदलाव के बीच फसल सुरक्षा पर ध्यान

आज किसानों के सामने मौसम में बदलाव भी एक बड़ी चुनौती है. कभी तापमान अचानक बढ़ जाता है, तो कभी बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि जैसी स्थिति पैदा हो जाती है. गेहूं की फसल में तापमान का सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है.

ऐसी परिस्थितियों में वीरेंद्र सिंह फसल की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देते हैं. वह जायडेक्स के जायटॉनिक सुरक्षा उत्पाद का भी इस्तेमाल करते हैं.

किसान के अनुसार, वह इसका इस्तेमाल गेहूं की बालियां निकलने के बाद स्प्रे के रूप में करते हैं. उनके मुताबिक, वह इसे सामान्य तौर पर एक बार इस्तेमाल करते हैं और प्रति एकड़ करीब एक किलोग्राम की मात्रा का उपयोग करते हैं.

वीरेंद्र सिंह का कहना है कि उन्हें इसके इस्तेमाल से गेहूं के दाने के भराव में फायदा देखने को मिला है. हालांकि, किसी भी कृषि उत्पाद का इस्तेमाल करते समय किसानों को उत्पाद के लेबल, अनुशंसित मात्रा और विशेषज्ञ की सलाह का पालन करना चाहिए.

जैविक खेती के लिए पशुपालन ही एकमात्र रास्ता नहीं

बड़े किसानों के लिए जैविक खेती को लेकर एक बड़ी चुनौती पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद उपलब्ध कराना भी है. हर किसान के पास इतने पशु नहीं होते कि वह अपनी पूरी जमीन के लिए आवश्यक मात्रा में गोबर की खाद तैयार कर सके.

वीरेंद्र सिंह भी मानते हैं कि बड़े रकबे पर खेती करने वाले किसानों के लिए यह चुनौती हो सकती है. इसलिए उनका मानना है कि जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ने के लिए उपलब्ध जैविक तकनीकों और उत्पादों का सही तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है.

उनके खेत का अनुभव बताता है कि धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों की मात्रा कम करते हुए जैविक उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ाया जा सकता है.

किसानों को वीरेंद्र सिंह की सलाह

कई वर्षों से खेती कर रहे वीरेंद्र सिंह अब दूसरे किसानों को भी खेती में बदलाव की सलाह देते हैं. उनका कहना है कि रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर अचानक पूरी तरह बदलाव करना आसान नहीं होता. शुरुआत में किसानों को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

लेकिन उनके अनुसार, किसानों को धीरे-धीरे रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल कम करते हुए मिट्टी की सेहत पर ध्यान देना चाहिए.

वीरेंद्र सिंह का मानना है कि स्वस्थ मिट्टी खेती की बुनियाद है. अगर मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो फसल का विकास भी बेहतर होगा और लंबे समय में खेती को टिकाऊ बनाने में मदद मिलेगी.

वह कहते हैं कि किसान केवल उत्पादन पर ध्यान न दें, बल्कि मिट्टी, पानी और पर्यावरण को भी ध्यान में रखें. उनके अनुसार, खेती में रासायनिक इनपुट को कम करने और जैविक तरीकों को अपनाने से किसान, उपभोक्ता और पर्यावरण तीनों को फायदा हो सकता है.

English Summary: Virendra singh success story Zytonic technology wheat farming Lakhimpur kheri Published on: 29 August 2026, 11:48 AM IST

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