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'राज्य के पूंजी खर्च के लिए हानिकारक है कृषि कर्ज माफी'

पिछले कुछ समय में कई राज्य सरकारों ने किसानों के कर्ज माफ करने का फैसला किया है. कृषि ऋण छूट की इन योजनाओं से उन राज्यों की सयुंक्त पूँजीगत संपत्ति के खर्च पर बुरा असर पड़ेगा और राज्यों में आर्थिक असंतुलन के हालत पैदा हो सकते है. 'इंडिया रेटिंग्स' द्वारा जारी किए गए एक नए अध्ययन में यह बात कही गई है. यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब भारत के कृषि उपज संकट के ताजा दौर में कृषि ऋण माफी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरा है.

इंडिया रेटिंग्स ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र और राज्य सरकारों की आर्थिक और निवेश नीति संबंधी जानकारी भी दी है. उसने कहा है कि आम धारणा के विपरीत, क्षमता विस्तार पर राज्य सरकार का खर्च, अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ोतरी का एक प्रमुख चालक है. यह केंद्र द्वारा किए गए क्षमता विस्तार से भी अधिक है.

राजकोषीय व्यवस्था के दौरान आने वाले घाटे के नियंत्रण के लिए कैपेक्स आसान लक्ष्य बनता है. वित्त वर्ष 2018 के दौरान महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक में इसी तरीके को अपनाया गया था जब इन राज्य सरकारों ने बजट से अलग कृषि ऋण  घोषणा की थी. दरअसल, प्रत्येक राज्य सरकार हर साल अपने राज्य के लिए बजट जारी करती है. इसमें पूरे साल के लिए राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की मद में कितना खर्च किया जाना है इसीके मुताबिक बजट निर्धारण किया जाता है. इसमें राजकोषीय घाटे का भी ध्यान रखा जाता है. साथ ही सभी स्रोतों से प्राप्त होने वाले राजस्व के अनुसार ही सालाना खर्च तय किया जाता है. ऐसे में चुनावी गणित को ध्यान में रखकर की जाने वाली कर्ज माफी की घोषणाएं राजकीय बजट को असंतुलित कर देती हैं और सरकार इसके लिए बजट से अलग राशि जारी करती है जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ जाता है.

इंडिया रेटिंग्स ने कहा कि बजट की तुलना में अधिक राजस्व जुटाने के बावजूद, ये राज्य बजट-स्तर पर राजस्व घाटे को नियंत्रित नहीं रख सकते हैं, क्योंकि कृषि-ऋण माफी के चलते राजस्व खर्च में बढ़ोतरी होती है. राजस्थान और कर्नाटक ने बढ़े हुए राजस्व खर्च की भरपाई करने के लिए क्षमता विस्तार पर होने वाले अपने खर्च में क्रमशः 12.0% और 2.5% की कमी है लेकिन इसके बावजूद भी वे बजटीय स्तर पर राजकोषीय घाटे को बनाए रखने में विफल रहे हैं. इंडिया रेटिंग्स की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया गया है कि कर्ज माफी के वक्त महाराष्ट्र का राजकोषीय घाटा निर्धारित बजट से कम था, फिर भी कैपेक्स में कमी हुई.

आम तौर पर राज्य सरकारों द्वारा निभाई गई भूमिका मानव संसाधनों के कैपेक्स और बंदोबस्ती दोनों के दृष्टिकोण से अधिक महत्वपूर्ण है, जो स्थायी विका प्राप्त करने के लिए जरुरी हैं. इंडियन रेटिंग्स का मानना ​​है कि नीति निर्माताओं और कंपनियों को राज्य सरकार के बजट पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

बजट में खर्च किए गए कैपेक्स को विकासात्मक और गैर-विकासात्मक मदों के बीच विभाजित किया गया है. वित्त वर्ष 2018 के अपवाद को छोड़ दें तो केंद्र और राज्यों के कुल कैपेक्स में राज्यों के विकास संबंधी पूंजी का हिस्सा वित्त वर्ष 2001-17 के दौरान 70 फीसदी से अधिक था. यह साल 2009 में 81.6% पर पहुंच गया जबकि 2001 से 2017 के दौरान इसका औसत 75.7% रहा.

वित्त वर्ष -2017 (बीई) के दौरान राज्य कैपेक्स का हिस्सा 90% से ऊपर था, जिसमें परिवार कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शिक्षा और कला, कृषि, बिजली और सिंचाई प्रमुख हैं. उपरोक्त सभी विभाग राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं.

इंडिया रेटिंग्स के रिपोर्ट का निष्कर्ष निकालें तो इससे जाहिर होता है कि कृषि कर्ज माफी किसी भी नजरिये से व्यावहारिक नहीं है. इससे किसानों को फौरी राहत तो दी जा सकती है लेकिन उनकी समस्याओं का स्थाई समाधान नहीं हो सकता. साथ ही इससे कुल बजट के खर्च पर भी असर पड़ने की संभावना है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि संकट चुनावों का एक लोकलुभावना मुद्दा बन गया है जो राज्य के समग्र विकास के लिए घातक बनता दिख रहा है.



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