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प्राकृतिक खेती से ही संभव है सुरक्षित भविष्य और आर्थिक समृद्धि

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में “प्राकृतिक खेती की स्थिति एवं संभावनाएं” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ. वैज्ञानिकों ने रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव, उर्वरक निर्भरता और वैश्विक संकटों पर चिंता जताई. वक्ताओं ने प्राकृतिक खेती को आत्मनिर्भरता, मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी समाधान बताया तथा शोध व नीतिगत सुधारों पर जोर दिया.

KJ Staff
Rajendra Prasad Central Agricultural University

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के विद्यापति सभागार में रविवार को “प्राकृतिक खेती की स्थिति एवं संभावनाएं” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ. इस संगोष्ठी में देश के जाने-माने कृषि वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और नीति निर्धारकों ने शिरकत की. कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को कम करना और प्राकृतिक खेती के वैज्ञानिक व आर्थिक पहलुओं पर गहन मंथन करना था.

युद्ध और वैश्विक संकट में आत्मनिर्भरता का मंत्र

विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए वैश्विक परिदृश्य पर गंभीर चर्चा की. उन्होंने वर्तमान समय में चल रहे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और युद्ध की स्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा, "आज दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं, जिसका सीधा असर उर्वरकों की आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है. रासायनिक खादों के लिए हम काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं. ऐसी अस्थिर स्थितियों में प्राकृतिक खेती ही वह एकमात्र मार्ग है जो हमें रासायनिक उर्वरकों की निर्भरता से मुक्ति दिला सकती है."

डॉ. पाण्डेय ने आगे कहा कि प्राकृतिक खेती न केवल पर्यावरण को संतुलित रखती है, बल्कि किसानों की लागत को शून्य के करीब लाकर उनकी शुद्ध आय में वृद्धि करती है. यह आधुनिक कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा है, जिससे हम खाद्यान्न सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सकते हैं.

मिट्टी की उर्वरता और जैव विविधता का संरक्षण

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि और कृषि महाविद्यालय, खंडवा (मध्य प्रदेश) के पूर्व डीन डॉ. पी. पी. शास्त्री ने अपने संबोधन में मिट्टी के घटते स्वास्थ्य पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा, "मिट्टी एक जीवित इकाई है, लेकिन रसायनों के अत्यधिक प्रयोग ने इसे निर्जीव बना दिया है. प्राकृतिक खेती की अवधारणा को अपनाकर हम न केवल मिट्टी की उर्वरता को वापस ला सकते हैं, बल्कि जैव विविधता को भी संरक्षित कर सकते हैं." उन्होंने जोर दिया कि यह संगोष्ठी किसानों और वैज्ञानिकों के बीच एक सेतु का कार्य करेगी, जिससे खेती की नई और सुरक्षित पद्धतियों का प्रसार होगा.

शोध और नीतिगत बदलावों पर जोर

स्नातकोत्तर कृषि महाविद्यालय (PGCA) के डीन डॉ. मयनक राय ने छात्रों और शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भविष्य की कृषि नीतियों को आकार देने में मील का पत्थर साबित होगी. उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती के तकनीकी और आर्थिक पक्षों को समझना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है.

इससे पूर्व, कार्यक्रम की शुरुआत में प्रसार शिक्षा निदेशक डॉ. आर. के. झा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया. संगोष्ठी की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए आयोजन सचिव डॉ. सत्य प्रकाश ने बताया कि किस प्रकार यह आयोजन प्राकृतिक खेती के प्रति भ्रांतियों को दूर करने और इसके वैज्ञानिक आधार को मजबूत करने में सहायक होगा.

महत्वपूर्ण तकनीकी सत्र

संगोष्ठी के दौरान मुख्य वक्ता डॉ. पी. पी. शास्त्री ने एक घंटे के 'लीड टॉक' में प्राकृतिक खेती के वैश्विक मॉडल्स पर चर्चा की. वहीं, डॉ. आर. के. झा ने अपने 'थीम टॉक' में इस बात पर प्रकाश डाला कि किस प्रकार विस्तार शिक्षा के माध्यम से प्राकृतिक खेती को प्रयोगशाला से निकालकर सीधे किसान के खेत तक पहुँचाया जा सकता है.

संगोष्ठी के अंत में विशेषज्ञों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया कि रासायनिक खेती से होने वाले स्वास्थ्य और पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई केवल प्राकृतिक खेती से ही संभव है. कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक, विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष और भारी संख्या में कृषि छात्र मौजूद रहे. अंत में विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय के डॉ विनीता सत्पथी ने धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ.

रिपोर्ट: रामजी कुमार, एफटीजे, समस्तीपुर, बिहार

English Summary: natural farming status and opportunities national seminar pusa dr Rajendra Prasad Central Agricultural University Published on: 30 March 2026, 06:02 PM IST

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