डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा में आयोजित सोसाइटी फॉर प्लांट बायोकेमिस्ट्री एंड बायोटेक्नोलॉजी कॉन्फ्रेंस 2026 के दूसरे दिन जलवायु सहनशीलता, पोषण सुरक्षा और सतत कृषि-खाद्य प्रणालियों पर केंद्रित समानांतर तकनीकी सत्रों में देशभर से आए वैज्ञानिकों ने अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए। सम्मेलन में आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी, मेटाबोलोमिक्स, सूक्ष्मजीव विज्ञान और जीनोमिक रणनीतियों के माध्यम से कृषि को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने पर विशेष जोर दिया गया।
उच्च CO₂ स्तर और फसलों की अनुकूलन क्षमता पर चर्चा
प्लांट मेटाबोलोमिक्स एवं सिस्टम्स बायोलॉजी” सत्र में Dr. B. C. Tripathi (Sharda University) ने बताया कि बढ़ते CO₂ स्तर के बीच फसलें किस प्रकार जैव-रासायनिक बदलावों के माध्यम से स्वयं को अनुकूलित करती हैं।
Dr. Monika Garg (National Agri-Food Biotechnology Institute) ने गेहूं में पोषक तत्वों की कमी के शारीरिक एवं आणविक पहलुओं को रेखांकित किया। वहीं Dr. P. K. Mandal (ICAR-National Institute for Plant Biotechnology) ने धान में प्रिसिजन नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने की रणनीतियों पर प्रकाश डाला। सत्र में युवा शोधकर्ताओं द्वारा मौखिक प्रस्तुतियाँ भी दी गईं।
पौधा–मृदा–सूक्ष्मजीव संबंध बदलती जलवायु में नई उम्मीद
“Plant–Soil–Microbe Interactions” सत्र में Dr. Gopal Ji Jha (National Institute of Plant Genome Research) ने सतत कृषि में पौधों से जुड़े लाभकारी जीवाणुओं की भूमिका को रेखांकित किया।
Dr. Hillol Chakdar (ICAR-National Bureau of Agriculturally Important Microorganisms) ने जल-तनाव प्रबंधन में सूक्ष्मजीव आधारित समाधानों पर चर्चा की।
मृदा स्वास्थ्य, रोग नियंत्रण और लाभकारी सूक्ष्मजीवों पर आधारित प्रस्तुतियों ने किसानों के लिए टिकाऊ विकल्पों की संभावनाओं को सामने रखा।
पोषण सुरक्षा, जैव-संवर्धित
और कटाई-उपरांत गुणवत्ता पर भी मंथन
एडवांसेज इन न्यूट्रिशनल बायोकेमिस्ट्री एंड पोस्ट-हार्वेस्ट फिजियोलॉजी सत्र में डॉ. उषा सिंह ने जलवायु परिवर्तन के खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के बीच कुपोषण की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त की, खासकर उन समुदायों में जहां बौनापन (स्टंटिंग), दुबलापन (वेस्टिंग) और एनीमिया जैसी समस्याएं गंभीर रूप से व्याप्त हैं।
सत्र के दौरान बदलती जलवायु परिस्थितियों में कुपोषण से निपटने के संभावित उपायों जैसे आहार विविधता को बढ़ावा देना, फसल परिवर्तन (क्रॉप शिफ्टिंग) अपनाना, तथा जैव-संवर्धित (बायो-फोर्टिफाइड) फसलों की खेती पर विस्तार से चर्चा की गई।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों को सीधे पोषण परिणामों से जोड़ा जाना आवश्यक है, ताकि कृषि उत्पादन केवल मात्रा तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों को बेहतर और संतुलित पोषण भी सुनिश्चित कर सके।
Dr. Wrichia Tyagi (Central Agricultural University) ने अनाज गुणवत्ता सुधार हेतु जीनोमिक एवं जैव-प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेपों की जानकारी दी।
विशेषज्ञों ने कहा कि बदलती जलवायु के बीच पोषक तत्वों से भरपूर और सुरक्षित खाद्य उत्पादन समय की आवश्यकता है।
मत्स्य एवं पशु-आधारित खाद्य में जीनोमिक नवाचार
“High-Quality Animal and Fish-Based Foods” सत्र में डॉ पी पी श्रीवास्तव
अधिष्ठाता, मत्स्यिकी ने फिश न्यूट्रिजीनोमिक्स और माइक्रोएरे विश्लेषण के माध्यम से मछली पोषण गुणवत्ता सुधार की दिशा पर अनुसंधान पर ध्यान देने की बात बताई। उन्होंने अपने न्यूट्रिजनॉमिक्स के शोध के प्रपत्रों के माध्यम से सभी को, विशेष कर छात्रों को शोध हेतु प्रोत्साहित किया।
Dr. K. Krishnani (ICAR-Indian Institute of Agricultural Biotechnology) ने जलवायु-जनित तनावों से निपटने के लिए मल्टी-ओमिक्स अप्रोच की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
इस सत्र में प्रस्तुत शोधों ने पशु एवं मत्स्य-आधारित खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता और पोषण बढ़ाने के नए आयाम खोले।
66 पोस्टर प्रस्तुतियों ने खींचा ध्यान
सम्मेलन में तीन प्रमुख विषयों के अंतर्गत कुल लगभग 66 पोस्टर प्रस्तुत किए गए। इनमें जलवायु सहनशीलता, जैव विविधता, पोषण एवं नवाचारी प्रसंस्करण से जुड़े शोध शामिल रहे। पोस्टर सत्र के दौरान वैज्ञानिकों और शोधार्थियों के बीच गहन संवाद देखने को मिला।
जलवायु-स्मार्ट कृषि की दिशा में वैज्ञानिक संकल्प
सम्मेलन के दूसरे दिन यह स्पष्ट संदेश उभरकर सामने आया कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए मेटाबोलोमिक्स, जीनोमिक्स और माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी जैसे उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों का उपयोग अनिवार्य है।
पूसा की धरती पर हुआ यह वैज्ञानिक मंथन न केवल शोध की नई दिशा तय कर रहा है, बल्कि किसानों के लिए जलवायु-स्मार्ट, पोषण-सुरक्षित और टिकाऊ कृषि मॉडल की मजबूत नींव भी रख रहा है।
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