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बिजली का बिल या उपभोक्ता के सब्र की परीक्षा? स्मार्ट मीटर से लेकर मीटर किराए तक, आखिर किसके हित में है यह बिजली व्यवस्था

छत्तीसगढ़ में स्मार्ट मीटर लगने के बाद बढ़े बिजली बिल और उपभोक्ता शिकायतों ने कई सवाल खड़े किए हैं. जानिए मीटर किराया, FPPAS, बिलिंग पारदर्शिता, रिमोट डिस्कनेक्शन, बिजली कटौती, शिकायत निवारण और उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े कानूनी प्रावधानों की पूरी जानकारी.

KJ Staff
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ, राष्ट्रीय संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ, राष्ट्रीय संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ
  • बिजली का बिल वसूली की पर्ची नहीं, हर शुल्क का जवाबदेह हिसाब होना चाहिए.

  • स्मार्ट मीटर हो या पुराना मीटर, उपभोक्ता को अपनी खपत का प्रमाण मांगने का अधिकार है.

  • हर शुल्क वैध तभी है, जब उसका स्पष्ट आधार, गणना और नियामक स्वीकृति हो.

  • बकाया भुगतान पर भी कानून उपभोक्ता को कम से कम 15 दिन की लिखित सुरक्षा देता है

  • एकाधिकार की अकड़ स्थायी नहीं होती, उपभोक्ता के सामने पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है.

बिजली आज विलासिता नहीं बल्कि हवा पानी की तरह जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन गई है. घर में रोशनी, पानी, पंखा, खेती, छोटे कारोबार, अस्पताल, स्कूल और आधुनिक जीवन की लगभग हर गतिविधि बिजली पर निर्भर है. इसलिए बिजली का उपभोक्ता और बिजली वितरण कंपनी का संबंध किसी सामान्य दुकानदार और ग्राहक का संबंध नहीं है. यह एक नियंत्रित सार्वजनिक उपयोगिता सेवा (regulated public utility service) का संबंध है. यही कारण है कि बिजली के बिल पर केवल यह प्रश्न पर्याप्त नहीं है कि कुल रकम कितनी है, बल्कि यह भी पूछा जाना चाहिए कि उस पैसे को किस नाम पर, किस कानून के तहत, किस गणना के आधार पर और कितनी पारदर्शिता के साथ वसूला गया?

यही कारण है कि इस रिश्ते में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पर्याप्त नहीं है कि बिजली बिल कितना आया, बल्कि यह है कि उस पैसे को किस नाम पर, किस कानून के तहत, किस गणना के आधार पर और कितनी पारदर्शिता के साथ वसूला गया?

छत्तीसगढ़ में आज यह प्रश्न इसलिए और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि एक ओर स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं, दूसरी ओर उपभोक्ताओं के बीच अचानक बढ़े हुए बिलों को लेकर आशंकाएं बढ़ रही हैं. स्वयं छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग (CSERC) के रिकॉर्ड में 2026 में स्मार्ट मीटर के बाद अत्यधिक बिल आने और स्मार्ट मीटर की गड़बड़ी को लेकर 50 हजार से अधिक शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं. बिजली दरों (टैरिफ) में असंतुलित बढ़ोतरी और ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार (FPPAS) आदि जोड़ने के कारण उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दर्ज शिकायतों में बहुत कम मामलों का ही संतोषजनक समाधान हो पाया है, जिससे आम जनता में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है. एक मामले में स्मार्ट मीटर लगाने के बाद छह महीने तक बिल नहीं आया और फिर लगभग एक लाख रुपये का बिल आने की शिकायत दर्ज हुई. दूसरे मामले में स्मार्ट मीटर के बाद अत्यधिक बिल आने की शिकायत दर्ज हुई है.

हालांकि इन शिकायतों का दर्ज होना सीधे तौर पर यह सिद्ध नहीं करता कि स्मार्ट मीटर गलत है. लेकिन यह जरूर सिद्ध करता है कि उपभोक्ता की आशंका को “भ्रम” कहकर खारिज कर देना भी उचित नहीं है.

*मीटर उपभोक्ता का है या बिजली बेचने वाली कंपनी का? यहीं से एक बड़ा सवाल शुरू होता है.*

बिजली की कनेक्शन व्यवस्था के समय उपभोक्ता से विभिन्न प्रकार के कनेक्शन शुल्क (connection charges) और सुरक्षा राशि (security deposit) लिए जाते हैं. फिर घर में बिजली की खपत मापने के लिए जो मीटर लगाया जाता है, उसके लिए अलग से मासिक मीटर किराया (meter rent) भी लिया जाता है. पहली नजर में सामान्य उपभोक्ता पूछता है कि *जिस उपकरण के माध्यम से कंपनी स्वयं अपनी बेची गई बिजली की मात्रा मापती है, उसका किराया ग्राहक क्यों दे?*

  यदि कोई दुकानदार आपको पांच किलो चावल बेचता है तो वह अपनी दुकान का तराजू इस्तेमाल करने का किराया अलग से नहीं लेता. क्योंकि तराजू उसके व्यापार की लागत है. इसी तरह बिजली वितरण कंपनी का मीटर भी बिलिंग व्यवस्था (billing infrastructure) का हिस्सा है, ऐसा तर्क स्वाभाविक रूप से उठता है. लेकिन यहां कानून एक महत्वपूर्ण पेच पैदा करता है. छत्तीसगढ़ विद्युत आपूर्ति संहिता (Chhattisgarh Electricity Supply Code) की धारा 8.7 में प्रावधान है कि उपभोक्ता से मीटर का मासिक किराया लिया जा सकता है, लेकिन केवल नियामक आयोग द्वारा स्वीकृत दर पर. साथ ही यदि लाइसेंसी मीटर को ठीक स्थिति में रखने में विफल रहता है और *जब मीटर खराब रहता है, तो उस अवधि का मीटर किराया उपभोक्ता से आखिर क्यों लिया जाना चाहिए ?*

 इसलिए कानूनी सवाल यह नहीं है कि “मीटर किराया लेना कानूनन असंभव है.” असली सवाल यह है कि क्या वर्तमान मीटर किराए की राशि का वास्तविक लागत-आधार (cost basis) स्पष्ट है, क्या वह नियामक द्वारा स्वीकृत दर के अनुरूप है, क्या उपभोक्ता को उसका आधार बताया गया है और जहां मीटर की लागत पहले ही किसी रूप में वसूल हो चुकी हो, वहां लगातार किराया लेने का आर्थिक औचित्य क्या है?

यह प्रश्न इसलिए भी गंभीर है क्योंकि CSERC के FY 2026-27 से FY 2029-30 के स्वीकृत आंकड़ों में *मीटर किराए से वर्ष 2026-27 के लिए ₹63.35 करोड़ की गैर-टैरिफ आय (non-tariff income) स्वीकार की गई है. अर्थात यह कोई काल्पनिक मद नहीं, वास्तविक राजस्व मद है.

यहां उपभोक्ता को एक और महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण प्राप्त है. बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 45 के अनुसार वितरण लाइसेंसी द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क लागू टैरिफ के अनुरूप होने चाहिए और शुल्क निर्धारण की पद्धति संबंधित राज्य नियामक आयोग द्वारा निर्धारित होती है. इसी धारा में स्थिर शुल्क (fixed charge) तथा मीटर या विद्युत संयंत्र के लिए किराया या अन्य शुल्क लेने की व्यवस्था भी है. इसलिए हर शुल्क को “अवैध” कहना कानूनी रूप से सही नहीं होगा, लेकिन हर शुल्क को बिना हिसाब और बिना स्वीकृत आधार के स्वीकार कर लेना भी उपभोक्ता की मजबूरी नहीं है.

   आज एक सामान्य उपभोक्ता के हाथ में ऐसा  बिजली बिल आता है जिसमें स्थिर शुल्क (fixed charge), ऊर्जा शुल्क (energy charge), मीटर किराया (meter rent), ईंधन एवं विद्युत क्रय समायोजन अधिभार (FPPAS), अन्य समायोजन (adjustment), बकाया (arrear) और दूसरी तकनीकी मदें दिखाई देती हैं. सवाल यह है कि क्या प्रत्येक उपभोक्ता जानता है कि स्थिर शुल्क किस लागत के लिए है, ऊर्जा शुल्क किस गणना से आया, मीटर किराया क्यों लिया गया और FPPAS किस आधार पर लगाया गया? यदि नहीं, तो बिल तकनीकी रूप से सही होने के बावजूद उपभोक्ता के लिए पारदर्शी नहीं कहा जा सकता.

बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 62 के तहत खुदरा बिजली टैरिफ निर्धारित करने का अधिकार नियामक-आयोग के पास है. धारा 64 में टैरिफ निर्धारण की प्रक्रिया में सार्वजनिक सुझाव और आपत्तियों पर विचार का प्रावधान है, किंतु विचारणीय प्राप्त किया है कि क्या सचमुच इन प्रक्रियाओं का समुचित पालन कंपनी के द्वारा किया जा रहा है? जाहिर है कि कंपनी भी अपनी ओर से मनमाने ढंग से कोई नया शुल्क नहीं जोड़ सकती.

इस तथाकथित 'स्मार्ट-मीटर' का प्रश्न इसकी स्मार्टनेस से भी आगे जाता है. यदि पुराने मीटर में एक निश्चित खपत आती थी और नया स्मार्ट मीटर लगते ही खपत अचानक कई गुना हो जाती है, तो उपभोक्ता को केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि “मीटर सही है.” उपभोक्ता को अन्य निष्पक्ष तकनीकी विशेषज्ञ संस्थान के द्वारा मीटर परीक्षण (meter testing), खपत का इतिहास (consumption history), पुराने मीटर की अंतिम रीडिंग (final reading), नए मीटर की प्रारंभिक रीडिंग (initial reading), मीटर बदलने की तारीख, मीटर नंबर, सीलिंग विवरण और परीक्षण की स्थिति का रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए. केंद्र सरकार के बिजली उपभोक्ता के‌ उपभोक्ता अधिकार नियम 2020 ( Electricity (Rights of Consumers) Rules, 2020) के ढांचे में उपभोक्ता अधिकार, बिलिंग पारदर्शिता और शिकायतों की स्थिति में जांच की व्यवस्था को महत्व दिया गया है. 2024 के संशोधनों में शिकायत की स्थिति में चेक मीटर (check meter) की व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है. तथापि पारदर्शिता अब इससे आगे की मांग करती है.

दिल्ली जैसी व्यवस्थाओं में मीटर विवरण, स्थापना या प्रतिस्थापन के बाद रिकॉर्ड उपलब्ध कराने तथा मीटर परीक्षण और बिलिंग पारदर्शिता के प्रावधानों का उदाहरण मिलता है. प्रश्न यह नहीं कि छत्तीसगढ़ को दिल्ली की हूबहू नकल करनी चाहिए, प्रश्न यह है कि जब तकनीक जब अधिक आधुनिक हो गई है तो उपभोक्ता के अधिकार भी उतने ही आधुनिक क्यों न हों?

सबसे गंभीर प्रश्न बिजली काटने का है. बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 56 के अनुसार भुगतान में चूक होने पर आपूर्ति काटने से पहले कम से कम 15 स्पष्ट दिनों की लिखित सूचना (15 clear days written notice) देना आवश्यक है. यदि किसी रकम को लेकर विवाद है तो उपभोक्ता निर्धारित शर्तों के अनुसार राशि “आपत्ति के अधीन” (under protest) जमा करके विवाद के निपटारे तक आपूर्ति कटने से बच सकता है.

यही प्रावधान 2026 में स्मार्ट मीटर से होने वाले दूरस्थ विच्छेदन (remote disconnection) के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाता है. 17 मार्च 2026 की CSERC कार्यवाही में स्वयं CSPDCL ने स्वीकार किया कि स्मार्ट मीटर उपभोक्ताओं का विच्छेदन परीक्षण के आधार पर बिना पूर्व सूचना शुरू हुआ था और बाद में तीन संदेश भेजे जाने की बात कही गई. आयोग ने उस समय स्मार्ट मीटर के माध्यम से विच्छेदन तत्काल रोकने का निर्देश दिया और बहाली में 24 घंटे से अधिक लगने की स्थिति पर भी गंभीर प्रश्न उठाए हैं.

यह केवल तकनीकी प्रक्रिया का मामला नहीं है. गरीब परिवार के लिए 15 दिन कोई छोटी अवधि नहीं, बल्कि जरूरी वैधानिक सुरक्षा का अल्पकालिक कवच (statutory safeguard) है. एक छोटे दुकानदार, किसान या मजदूर परिवार के लिए बिजली कटना उसके व्यवसाय, सिंचाई, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा प्रहार हो सकता है. इसलिए कोई भी स्मार्ट तकनीक कानून से ऊपर, कानून से आगे और कानून से तेज नहीं चल सकती.

         शायद यह विद्युत कंपनियों के एकाधिकार (monopoly) का अतिआत्मविश्वास है कि एक दिन की देरी पर भी  50 साल  तक नियमित बिल पटाने वाले अपने पुराने वफादार उपभोक्ता की बिजली काटने में इन्हें एक घंटे की मोहलत देने की जरूरत महसूस नहीं होती. लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता. सौर, पवन, बैटरी स्टोरेज और हरित ऊर्जा के साथ अब निजी क्षेत्र परमाणु ऊर्जा तक पहुंच रहा है. आज जो सरकारी ‘दामाद’ कंपनियां उपभोक्ता को विकल्पहीन समझकर बेवजह अकड़ रही हैं, कल जब बाजार की प्रतिस्पर्धा के मैदान में ये पहाड़ के शीर्ष से नीचे जमीनी धरातल पर उतरेगी, तब जनता तय करेगी कि उसे किसकी बिजली चाहिए और किन शर्तों पर चाहिए.  सरकारी कंपनी बिजली के असामान्य बिल के साथ साथ उनकी हर तरह की मनमानी झेलने की मजबूरी के युग का भी अंत निश्चित रूप से होगा.

 वैसे वर्तमान में उपभोक्ता की समस्या निवारण के लिए भी कुछेक रास्ते है. जैसे कि विद्युत अधिनियम की धारा 42(5) के तहत वितरण लाइसेंसी को उपभोक्ता शिकायत निवारण मंच (Consumer Grievance Redressal Forum, CGRF) स्थापित करना अनिवार्य है और धारा 42(6) के तहत असंतुष्ट उपभोक्ता विद्युत लोकपाल (Electricity Ombudsman) के समक्ष जा सकता है. छत्तीसगढ़ में 2023 के उपभोक्ता शिकायत निवारण विनियम लागू हैं और CSERC की वेबसाइट पर विभिन्न क्षेत्रों के CGRF उपलब्ध हैं.

इसके अतिरिक्त उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 में बिजली की आपूर्ति को “सेवा” (service) के अंतर्गत स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है. कानून में “अनुचित संविदा” (unfair contract) की अवधारणा भी है, जिसमें उपभोक्ता पर अनुचित शुल्क, दायित्व या शर्त डालकर उसे महत्वपूर्ण नुकसान पहुंचाने वाली स्थितियां शामिल हो सकती हैं. हालांकि बिजली के ऐसे विवाद जो विद्युत अधिनियम की धारा 126 के तहत अनधिकृत उपयोग या धारा 135 आदि के तहत बिजली चोरी के विशेष मामलों में आते हैं, उनके लिए अलग वैधानिक व्यवस्था लागू होती है. इसलिए प्रत्येक मामले का कानूनी स्वरूप देखकर उचित मंच चुना जाना चाहिए. पर नून तेल लकड़ी के चक्कर में उलझा गरीब उपभोक्ता इन दरवाजों तक पहुंच कर उन्हें कितनी देर तक खटखटा सकता है जबकि यह भी तय नहीं है कि ये दरवाजे खुलेंगे भी या नहीं और दरवाजा खुलेगा की तो उसे वहां राहत मिलेगी अथवा नहीं.

    हमारा स्पष्ट रूप से यह भी मानना है कि बिजली कंपनी की वित्तीय मजबूती भी उतनी ही आवश्यक है. वितरण व्यवस्था में तकनीकी नुकसान (technical loss), वाणिज्यिक नुकसान (commercial loss) और चोरी को नियंत्रित करना जरूरी है. लेकिन किसी भी नुकसान की कीमत किस उपभोक्ता वर्ग से वसूली जा रही है, इसकी पारदर्शी जानकारी भी उतनी ही जरूरी है. बड़े तथा औद्योगिक उपभोक्ताओं को अनुचित लाभ मिले और उसका बोझ छोटे घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़े, तो यह केवल बिजली नीति का प्रश्न नहीं, सामाजिक न्याय का प्रश्न भी है.

इसलिए सरकार, CSERC और CSPDCL को उपभोक्ताओं के सामने कुछ सीधे जवाब रखने चाहिए. हर बिलिंग मद का सरल हिंदी में अर्थ क्या है? मीटर किराए की वर्तमान दर किस गणना से तय हुई? जिस मीटर की लागत उपभोक्ता से किसी रूप में वसूल की जा चुकी है, उस पर लगातार मीटर किराए का आर्थिक औचित्य क्या है? स्मार्ट मीटर बदलते समय पुराने और नए मीटर की रीडिंग का प्रमाणित रिकॉर्ड उपभोक्ता को क्यों नहीं दिया जाता? असामान्य खपत पर स्वतः जांच क्यों नहीं होती? विवादित बिल पर आपूर्ति काटने से पहले वैधानिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है? और गलत बिलिंग सिद्ध होने पर उपभोक्ता को क्षतिपूर्ति क्यों न मिले?

CSERC स्वयं अपने उद्देश्य में उपभोक्ताओं को उचित दर पर दक्ष बिजली आपूर्ति तथा पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करने की बात करता है. Electricity Act की धारा 57 मानक सेवा (standards of performance) तय करने और उनका पालन न होने पर प्रभावित व्यक्ति के लिए क्षतिपूर्ति का आधार देती है.

यह लेख बिजली विभाग को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए है जिस पर करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर है. हर बढ़े हुए बिल को गलत कहना उतना ही अनुचित है, जितना हर शिकायत को उपभोक्ता का भ्रम कहकर खारिज कर देना. स्मार्ट मीटर स्मार्ट तभी कहलाएगा, जब उसकी तकनीक के साथ व्यवस्था भी पारदर्शी हो और उपभोक्ता के अधिकार भी उतने ही स्मार्ट हों.

आखिर बिजली का बिल केवल कंपनी के राजस्व का दस्तावेज नहीं है. वह कंपनी और नागरिक के बीच विश्वास की मासिक रसीद है. यदि उस रसीद में हिसाब साफ है तो रोशनी केवल घर में नहीं, व्यवस्था में भी रहती है. लेकिन यदि हिसाब अंधेरे में रखा गया, तो यह पक्का मान लीजिए कि बिजली भले जाए या न जाए पर उससे पहले ही उपभोक्ता का कंपनी से विश्वास चला जाता है. और किसी भी सार्वजनिक व्यवस्था के लिए विश्वास से बड़ा कोई राजस्व नहीं होता.

लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ, राष्ट्रीय संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ

English Summary: Chhattisgarh smart meter electricity bill consumer rights billing transparency fppas remote disconnection Published on: 03 September 2026, 05:07 PM IST

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