कैक्टस की बढ़ रही है मांग, मवेशियों को भी भआ रहा है इसका स्वाद

कैक्टस को शुरुआत से ही ऐसे पौधे के रूप में देखा जाता है जो केवल सूखे और रेगिस्तानी इलाकों में उगता है। इसके साथ ही इसमें कांटे होने के वजह से मवेशी भी इसको पसंद नहीं करते हैं। लेकिन कई बार जैसा हम सोचते हैं उसका विपरित परिणाम हमारे सामने आता है और कैक्टस के साथ भी सीहोर में ऐसा ही हो रहा है। इस पौधे को अब न केवल किसान अपने खेतों में उगा रहे हैं बल्कि मवेशियों को भी इसका स्वाद भाने लगा है। सीहोर के इकार्डा सेंटर (इंटरनेशनल सेंटर फार एग्रीकल्चर रिसर्च इन द ड्राय एरिया) के वैज्ञानिक शोघ कार्य में जुटे हुए हैं। यहां के वैज्ञानिकों ने ब्राजील से वर्ष 2014 में कैक्टस की 24 प्रजातियां मंगवाई थी, जिनमें से कुछ प्रजातियां मवेशियों का

और ये ही नहीं एक तरफ खुशखबरी भी है की ये दूध उत्पादन को बढ़ाने में भी मदद मिल रही है। ये जो तैयार किया गया कैक्टस है ये लगभग दो हजार से ज्यादा किसानों तक पहुंच चुका है। केंद्र में फॉडर कैक्टस की सफल खेती होने के बाद अब इसे किसानों को दिया जा रहा है। ऐसे किसान जिनके पास पानी की कमी है, उनके लिए यह सौगात साबित हो रहा है।

कैक्टस के बारे में बात करें तो ये बिना पानी के पैदा होने वाला पौधा है और इसमें पानी भरपूर होता है। कम पानी वाले किसान फॉडर कैक्टस की खेती कर उसे पशुओं का मुख्य चारा बना सकते हैं। साथ ही इसमें भरपूर पानी होने के कारण पशुओं को चारे के साथ पानी भी मिलेगा।

किसानों को सिखाया कैसे करें उपयोग

विवेक तोमर ने बताया कि प्रदेश के पशु कैक्टस खाने के आदि नहीं हैं। उन्हें कैक्टस की आदत डालने के लिए पहले उनके पारंपरिक चारे में 10% कैक्टस मिलाया जाना चाहिए। धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ानी चाहिए। जब पशुओं को इसकी आदत हो जाती है तो वे आसानी से फाडर कैक्टस खाते हैं। नापलीखेड़ा के किसान सुनील वर्मा कहते हैं इन दिनों पशुचारे की भारी कमी हो रही है इसको देखते हुए ये कैक्टस वरदान साबित हो सकता है। चितावलिया गांव के किसान विक्रम मालवीय का कहना है अब पशु भी कैक्टस को खाने से परहेज नहीं कर रहे हैं।

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