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Budget 2026: बजट की बही में कहां हैं किसान? खेतों की कराह और दिल्ली की चुप्पी!

Budget 2026: बजट 2026-27 से किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी, लागत घटाने, जलवायु सुरक्षा, आयात नियंत्रण और कर्ज मुक्ति की उम्मीद है. बढ़ती लागत, गिरती कीमतें, जलवायु संकट और कर्ज के दबाव से जूझता किसान नीति में सम्मान और स्थायित्व चाहता है, न कि केवल घोषणाएं.

डॉ राजाराम त्रिपाठी
Dr Rajaram Tripathi
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, भारतीय कृषि एवं ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक

"कृषि नहीं बचेगी तो अर्थव्यवस्था भी नहीं बचेगी"

इस बजट से किसानों की पांच प्रमुख अपेक्षाएं:-

  • खेती को घाटे से निकालने के लिए 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' को कानूनी गारंटी मिले.

  • खेती की बढ़ती लागत पर नियंत्रण हेतु खाद, बीज और डीजल पर सीधी राहत दी जाए.

  • जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए औ

  • 'विशेष किसान जलवायु सुरक्षा मिशन' बने.

  • आयात आधारित नीतियों के बजाय देशी उत्पादन और आत्मनिर्भर खेती को प्राथमिकता मिले.

  • किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए कर्ज मुक्ति और स्थायी आय मॉडल लागू हो.

  “हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले”

मिर्जा गालिब का यह शेर आने वाली केंद्रीय बजट से देश के किसानों की उम्मीदों और आशंकाओं का सबसे सटीक प्रतीक बन गया है. आज जब वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट दस्तक देने वाला है, तब देश का किसान किसी चमत्कार की अपेक्षा नहीं कर रहा, वह केवल यह जानना चाहता है कि क्या इस बार उसकी मेहनत, उसकी लागत और उसकी खेती को भी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की सूची में कोई स्थान मिलेगा. बढ़ती उत्पादन लागत, गिरती फसल कीमतें, कर्ज़ का बोझ, नकली खाद-दवाइयों की मार और प्राकृतिक आपदाओं से जूझता किसान बजट की ओर उसी विवश निगाह से देख रहा है, जहां उम्मीदें हज़ारों हैं, लेकिन हर उम्मीद के साथ टूटने का डर भी जुड़ा हुआ है.

भारत का केंद्रीय बजट केवल आय और व्यय का दस्तावेज नहीं होता, वह देश की प्राथमिकताओं का आईना भी होता है. दुर्भाग्य यह है कि हर वर्ष यह आईना किसानों को उनका धुंधला प्रतिबिंब ही दिखाता है. भाषणों में किसान सबसे आगे होते हैं, लेकिन बजट की पंक्तियों में वे हमेशा पीछे छूट जाते हैं. आज जब वित्तीय वर्ष 2026-27 का बजट आने वाला है, तब देश का किसान फिर उसी प्रश्न के साथ खड़ा है कि क्या इस बार खेती केवल आंकड़ों की शोभा बनेगी या वास्तव में राष्ट्रीय नीति का केंद्र बनेगी.

यह विडंबना ही है कि जिस कृषि पर देश की लगभग 46 प्रतिशत आबादी निर्भर है, वही कृषि सकल घरेलू उत्पाद में सिमटकर लगभग 16 प्रतिशत पर ठहर गई है. यह गिरावट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि नीति विफलता का स्पष्ट संकेत है. खेती आज उत्पादन का नहीं, अस्तित्व का संघर्ष बन चुकी है.

खेती की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उसकी लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन उपज के दाम स्थिर हैं. बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, मजदूरी और मशीनरी सब कुछ महंगा होता जा रहा है. वर्ष 2010 के मुकाबले खेती की लागत लगभग तीन गुना बढ़ चुकी है, जबकि फसलों के दाम डेढ़ गुना भी नहीं बढ़े. यही कारण है कि किसान की आमदनी नहीं बढ़ती, बल्कि घाटा गहराता चला जाता है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2015 से 2023 के बीच देश में ढाई लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या की. औसतन प्रतिदिन लगभग 30 किसान अपनी जीवन लीला समाप्त करने को विवश हुए. ये आंकड़े किसी प्राकृतिक आपदा के नहीं, बल्कि नीतिगत संवेदनहीनता के हैं. किसान आत्महत्या भावनात्मक नहीं, आर्थिक हत्या है.

इस संकट की जड़ में न्यूनतम समर्थन मूल्य की अधूरी व्यवस्था सबसे बड़ा कारण है. आज भी केवल 6 से 8 प्रतिशत किसानों को ही वास्तविक रूप से एमएसपी का लाभ मिल पाता है. शेष किसान खुले बाजार में लागत से नीचे फसल बेचने को मजबूर हैं. स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागत प्लस 50 प्रतिशत आज भी सरकारी फाइलों में बंद है. जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक किसान बाजार की दया पर ही जीवित रहेगा.

दूसरी ओर आयात आधारित नीतियों ने किसानों की कमर और तोड़ी है.  खाद्य तेलों की लगभग 60 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी की जा रही है, जिस पर हर साल 20 अरब डॉलर से अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होती है. दालों का 20 से 30 लाख टन आयात देशी किसानों के बाजार को सीधे चोट पहुंचाता है.

जब भी किसान बेहतर उत्पादन करता है, आयात खोल दिया जाता है और कीमतें गिरा दी जाती हैं. यह नीति किसान के परिश्रम को दंडित करने जैसी है.

रासायनिक खेती ने एक और गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. लगातार रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से देश की लगभग 30 प्रतिशत कृषि भूमि की जैविक उत्पादकता घट चुकी है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मिट्टी में कार्बन की मात्रा चिंताजनक स्तर तक गिर गई है. यही कारण है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए अब पहले से अधिक खाद डालनी पड़ती है, जिससे लागत और बढ़ जाती है. यह दुष्चक्र खेती को आर्थिक ही नहीं, पर्यावरणीय रूप से भी अस्थिर बना रहा है.

जलवायु परिवर्तन किसानों के लिए सबसे बड़ा अदृश्य संकट बन चुका है. देश का लगभग 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र अब चरम मौसम जोखिम की जद में है. कभी असमय वर्षा, कभी सूखा, कभी ओलावृष्टि और कभी हीट वेव पूरी फसल तबाह कर देती है. वर्ष 2023 और 2024 में मौसम जनित आपदाओं से किसानों को लाखों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन राहत राशि हमेशा ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुई.

आज स्थिति यह है कि खेती जोखिम का व्यवसाय बन चुकी है, जबकि किसान के पास जोखिम उठाने की क्षमता ही नहीं बची. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का कवरेज आज भी केवल 30 से 35 प्रतिशत क्षेत्र तक सीमित है और दावा भुगतान में वर्षों लग जाते हैं. बीमा कंपनियां लाभ में हैं, किसान प्रतीक्षा और घाटे में.

कृषि ऋण की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है. लगभग 85 प्रतिशत किसान आज भी साहूकारों पर निर्भर हैं, जहां 24 से 60 प्रतिशत तक ब्याज देना पड़ता है. किसान क्रेडिट कार्ड योजना के बावजूद किरायेदार किसान और छोटे पशुपालक इससे बाहर हैं. कर्ज किसान की जरूरत नहीं, उसकी मजबूरी बन चुका है.

इन सबके बीच सरकार कृषि अनुसंधान पर कृषि जीडीपी का मात्र 0.4 प्रतिशत ही खर्च कर रही है, जबकि वैश्विक औसत 1%एक प्रतिशत है. चीन और ब्राजील जैसे देश इससे कहीं अधिक निवेश कर रहे हैं. यदि भारत को जलवायु संकट, मिट्टी क्षरण और घटती उत्पादकता से निपटना है तो अनुसंधान में निवेश दोगुना करना अनिवार्य होगा.

पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी आज किसानों के लिए आशा की किरण हैं. पशुधन कृषि सकल मूल्य वर्धन का लगभग 28 प्रतिशत योगदान देता है और सात करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देता है, फिर भी चारा, पशु चिकित्सा और प्रसंस्करण ढांचे की भारी कमी है. मत्स्य पालन में 20 से 25 प्रतिशत तक कटाई उपरांत नुकसान आज भी हो रहा है. बागवानी उत्पादन में एक तिहाई योगदान देने के बावजूद कोल्ड स्टोरेज कवरेज 10 प्रतिशत से कम है.

बजट 2026-27 में सरकार के पास अवसर है कि वह खेती को राहत की नहीं, सम्मान की नीति दे. कृषि नीति निर्माण तथा कार्यान्वयन दोनों में किसानों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है.

एमएसपी पर कानूनी गारंटी, किसानोन्मुख स्थिर आयात नीति, जलवायु अनुकूल खेती को प्रोत्साहन, प्राकृतिक और जैविक कृषि के लिए अलग समुचित बजट प्रावधान और किसानों की सीधी आय सुरक्षा योजना आज समय की मांग है.

अर्थशास्त्री एडम स्मिथ ने कहा था कि "कोई भी राष्ट्र तब तक समृद्ध नहीं हो सकता जब तक उसका किसान गरीब है." महात्मा गांधी ने भी चेताया था कि "भारत की आत्मा गांवों में बसती है. यदि गांव कमजोर होंगे तो राष्ट्र का शरीर भी दुर्बल होगा."

आज आवश्यकता इस बात की है कि बजट किसानों को अनुदान नहीं, अधिकार दे. राहत नहीं, स्थायित्व दे. और घोषणाओं नहीं, भरोसे की खेती करे. यदि इस बार भी किसान केवल भाषणों तक सीमित रहा तो यह केवल कृषि संकट नहीं, राष्ट्रीय संकट बन जाएगा.

कृषि और किसानों को बोझ नहीं, देश का भविष्य मानकर यदि यह बजट बने, तभी वास्तव में कहा जा सकेगा कि भारत का विकास जमीन से जुड़ा है, केवल फाइलों से नहीं.

लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी,
भारतीय कृषि एवं ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक हैं.

English Summary: budget 2026 farmers expectations MSP legal guarantee agriculture crisis income support India Published on: 29 January 2026, 04:16 PM IST

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