Medicinal Crops

औषधीय फसल ईसबगोल लगाकर आमदनी बढाएं

 

 

 

 

 

 

 

 

भारतवर्ष में औषधीय पौधों से विदेशी मुद्रा अर्जित करने में ईसबगोल(प्लेंटेगो ओवाटा ) का अग्रणीय स्थान है। ईसबगोल एक वर्षीय महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इसके पौधे लगभग 30-50 सेमी. तक ऊँचे होते है तथा इनसे 20 - 25 कल्ले निकलते है। इसके बीज के ऊपर वाला छिलका जिसे भूसी कहते है इसी का ओषधीय दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसे ईसबगोल की भूसी कहा जाता है। इसकी भूसी में म्यूसीलेज होता है जिसमें जाईलेज, एरेबिनोज एवं ग्लेकटूरोनिक ऐसिड पाया जाता है। इसके बीजों में 17 - 19 प्रतिशत प्रोटीन होता हैै। इसके बीज में एक भेदावर्धक (पीला) तेल एवं एल्यूमिनस होता है।

दरअसल, ईसबगोल के छिलके में एक लसलसा पदार्थ होता है जो अपने वजन से 10 गुना पानी सोखने की विलक्षण  क्षमता रखता है ।  इसका उपयोग पेट की बीमारियों, कब्जियत, अल्सर, बवासीर, दस्त, आॅव, पेसिच - दस्त में कारगर पाया गया है।  दवा के अलावा खाद्य प्रसंस्करण जैसे - आइसक्रीम उद्योग, रंग रोगन तथा चिपकाने वाले पदार्थ बनाने में भी इसका प्रयोग होता है। इसके पौधो के अर्क का प्रयोग होठों के फटने, फोड़े - फुंसियों, शरीर  के भागों व विषाक्त घावों के उपचार में किया जाता है। भारतीय बाजार में डाॅबर इंडिया द्वारा नेचर केयर ब्रान्ड के नाम से ईसबगोल का विक्रय किया जा रहा है, जिनमें जिलेकस, सिलेकस, सोना आदि ब्राण्ड प्रमुख है। ये सभी उत्पाद पावडर रूप में प्लेन व सुगंधित रूप से गुजरात से बनकर भारतीय व अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में विक्रय हेतु प्रस्तुत किए जा रहे है। इस प्रकार इसे एक बहुपयोगी एवं निर्यातोन्मुखी फसल की संज्ञा दी जा सकती है ।

आदर्श जलवायु
ईसबगोल की खेती रबी फसल के रूप में की जाती है। इसके लिए शीतोष्ण जलवायु  की आवश्यकता होती है। बीजों के अंकुरण के लिए 20 डिग्री से 25 डिग्री सेंटीग्रेड तथा पकने के समय 30 डिग्री से 35  डिग्री सेंटीग्रेड  तापमान की आवश्यकता पड़ती है। इसकी बढ़वार व अच्छी उपज के लिए ठंडा एवं सूखा मौसम  अनुकुल रहता है। ईसबगोल की खेती के लिए 50 से 125 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्र उपयुक्त रहते है। पकने के समय वर्षा या आर्द्रता फसल पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
भूमिका चयन 
ईसबगोल की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है जिनमें जल निकास की अच्छी सुविधा है। हल्की बलुई दोमट मिट्टी  से उर्वर दोमट भूमि जिसका पी. एच. मान 7.2 - 7.9 आदर्श माना  जाता  है। जल निकास की उचित सुविधा होने पर चिकनी दोमट मिट्टी में भी इसकी खेती की जा सकती है।
खेत की तैयारी
खरीफ फसल काटने के बाद खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल  से करते हैं, फिर 2 - 3 जुताइयाँ देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर मिट्टी भुरभुरी और खेत समतल कर लेना चाहिए। इसके बाद खेत को 6 मी. लम्बी तथा 3 मी. चैड़ी क्यारियों में बाँट लेना चाहिए तथा सिंचाई के लिए नालियाँ भी बना लेनी चाहिए। क्यारियों का आकार खेत के ढाल के अनुसार कम या अधिक भी किया जा सकता है।
उन्नत किस्में
ईसबगोल की फसल से अधिक उपज के लिए उन्नत किस्मों का प्रयोग करना चाहिए।जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय, जबलपुर द्वारा विकसित जवाहर ईसबगोल - 4  ईसबगोल की एक उन्नत किस्में  है जो कि 116 - 120 दिन में पक कर तैयार हो जाती है। इसके पौधों की ऊँचाई 30 - 32 सेमी. होती है। इसमें सँकरी घनी एवं गहरी पत्तियाँ होती है, बीज हल्का गुलाबी रंग, कड़ा नथा नाव के आकार का होता है। बीजों का छिलका गुलाबी झिल्ली से ढँका होता है। इससे औसतन 18 - 19 क्विंटल  प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।
इसके अलावा गुजरात ईसबगोल - 1, गुजरात ईसबगोल - 2, ट्रांबे सेलेक्शन 1 - 10, निहारिका, मयूरी आदि उन्नत किस्में प्रयोग में लाई जा सकती है।
बोआई तकनीक 
ईसबगोल  का प्रसारण  बीज द्वारा किया जाता है ।  इसके बीज 6 माह तक सुषुप्तावस्था में रहते है और  2 वर्ष में वे अंकुरण क्षमता खो  देते है । अतः अधिक पुराना बीज बुआई  हेतु उपयोग में नहीं लेना  चाहिए । बीज फफूँदनाशक दवा  बाविस्टीन द्वारा उपचारित कर बोना चाहिए। इसकी बोनी छिड़कवाँ व कतार विधि  से करते है। ईसबगोल का बीज बहुत छोटा होता है अतः बीज को बालू के साथ मिलाकर क्यारियों में छिटक देते हैं। फिर रेक की सहायता से मिट्टी में मिला देते है। पंक्तियों में बुआई करने हेतु कतार - से - कतार की दूरी 25 - 30 से. मी. रखी जाती है। बीज बोने की गहराई 1 सेमी. से अधिक नहीं होना चाहिए। प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किलोग्राम बीज  पर्याप्त रहता है। खेत में नमी के अभाव में बुआई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। बुआई के 6 - 10 दिन बाद अंकुरण प्रारम्भ हो जाता है।
खाद एवं उर्वरक
ईसबगोल की अच्छी फसल के लिए खेत में जीवांश पदार्थ  का होना आवश्यक है। अतः खेत की अंतिम जुताई के समय 8 - 10 टन गोबर खाद अथवा कम्प¨स्ट मिलाना चाहिए। उर्वरकों की सही मात्रा का निर्धारण मृदा जाँच   के आधार पर करना चाहिए। यदि मृदा परीक्षण की सुविधा न हो तो नत्रजन 50 कि.ग्रा., स्फुर 40 कि.ग्रा. तथा पोटाश 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर  देना लाभकारी रहता है। नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय देना चाहिए तथा शेष 25 किलोग्राम नत्रजन खड़ी फसल में बुआई के एक माह बाद सिंचाई के समय देना चाहिए।
कब और कितनीसिंचाई
ईसबगोल की फसल से अच्छे उत्पादन के लिए 4 से 5 सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई अंकुरण हेतु तथा इसके बाद 15 - 20 दिन के अन्तर पर आवश्यकतानुसार सिंचाइयाँ करनी चाहिए। इसके बीजों का अंकुरण 8 से 10 दिन में प्रारम्भ हो जाता है। फसल में बाली आते समय,दूध बनने की अवस्था में तथा बीज भरने की अवस्था  में सिंचाई करना आवश्यकता रहता है। फूल खिलते समय खेत में अधिक पानी नही देना चहिए। खेत में पानी रूकने से फसल को हानी पहुँचती है, अतः सिंचाई के साथ - साथ खेत से जल निकासी का उचित प्रबन्ध करना आवश्यक है।
खरपतवार नियंत्रण
ईसबगोल की बुआई छिटकवाँ विधि से करने पर पौधे घने होते हैं जिससे खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। बुआई के 20 - 25 दिन बाद पहली निराई करके खरपतवार उन्मूलन  करना चाहिए। फसल अवधि में 2 - 3 निराइयों की आवश्यकता होती है। खरपतवार नियंत्रण हेतु शाकनाशी दवाओं  का  प्रयोग भी किया जा सकता है । बुवाई से पहले  आइसोप्रोटयूरान 0.50 किग्रा. प्रति हेक्टेयर का  650 लीटर पानी में घ¨लकर छिड़काव करना चाहिए या फिर अंकुरण पूर्व भी यह छिड़काव किया जा सकता है ।
फसल चक्र
ईसबगोल की फसल 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। इसकी खेती सोयाबीन, मक्का, ज्वार, मूँगफली, धान, बाजरा आदि के बाद एक वर्षिय फसल चक्रों में की जा सकती  है।
पौध संरक्षण
ईसबगोल की फसल में व्हाइट ग्रब, एफिड्स, दीमक आदि कीटों का प्रकोप हो सकता है। इन कीटों से  फसल सुरक्षा हेतु क्लोरपारीफास दवा 20 - 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की बुआई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए। इस फसल में विल्ट, डेम्पिंग आॅफ, पाउडरी मिल्डयू रोगों का प्रकोप हो सकता है।  विल्ट और पाउडरी मिल्डयू से बचाव के लिए डाइथेन एम-45 दवा  2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर रोग के लक्षण दिखाई देते ही  छिड़काव करना चाहिए। डाउनी मिल्डयु रोग की रोकथाम के लिए बाविस्टीन 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़कना चाहिए ।
फसल कटाई एवं गहाई
ईसबगोल मे बोआई के लगभग 60 दिन बाद बालियां  निकलने का क्रम  शुरू हो जाता है तथा इसकी फसल मार्च - अप्रैल में (बुआई के 120-130  दिन में ) कटाई हेतु तैयार हो  जाती है। जब फसल की पत्तियाँ पीली पड़ने लगे व बाली का रंग मटमैला - लाल होने लगे तथा बालियाँ अंगुलियों के बीच में मसलने पर उनके दाने सुगमता से निकलने लगे तब फसल कटाई  हेतु परिपक्व  समझना चाहिए। कटाई सुबह के समय करना चाहिए क्योंकि इस समय ओस के कारण बीजों के झड़ने का भय नहीं रहता है। कटाई के समय अधिक तेज धूप होने से बीज झड़ने की संभावना रहती है जिससे उपज घट सकती है। कटाई के बाद फसल को खलिहान में रख देते है। गहाई के पूर्व फसल की ढेरियों पर थोड़ा पानी छिड़क देने से दाने आसानी से अलग हो जाते है। अच्छी तरह सुखाने के बाद बैलों द्वारा दाँय चलाकर गहाई की जाती है। ओसाई करके दानों से भूसे  को अलग कर लेते हैं। भूसे का प्रयोग चारे के रूप में किया जा सकता है।
कैसे निकाले इसबगोल की  भूसी (प्रसंस्करण)
मिलों में पेषण मशीनों द्वारा ईसबगोल की भूसी को बीज से पृथक करते है। यह कार्य एक क्रम में रखी 6 - 7 मशीनों द्वारा किया जाता है। शुरू की मशीनों से भूसी की अधिक मात्रा बीज से अलग होती है तथा बाद वाली मशीनों से कम भूसी निकलती है। प्रथम मशीन से निकली भूसी में कई प्रकार की मिलावट होती है। अतः इसे बाद में साफ किया जाता है। दूसरी व तीसर मशीन से निकली भूसी पूर्णतया शुद्ध तथा उच्च श्रेणी की होती है। इसके बाद भूसी की विभिन्न ग्रेड में छानकर छँटाई की जाती है। निर्यात हेतु भूसी का ग्रेड 70 मेस माना जाता है।
भूसी निकालने के पश्चात् बचे दानों को तीन श्रेणियों - लाली, गोला और खाको में बाँटा जाता है। लाली में भ्रूण  व बीज के छोटे - छोटे टुकड़ें होते है। गोला भूसी निकलने के बाद सम्पूर्ण बीज होता है और खाको भूसी के महीन चूरे एवं रेत या मिट्टी आदि की मिलावट युक्त होता है। इन सबको छलनियों से छानकर अलग कर लिया जाता है। लाली का बाजार भाव गोला से कुछ अधिक होता है। ये तीनों अवशेष पशुओं को दाने के रूप में खिलाए जाते है।
उपज एवं भंडारण
ईसबगोल की उन्नत सस्य विधियों से खेती करने पर प्रति हेक्टेयर 10 - 12 क्विंटल  बीज प्राप्त होता है। इसके बीजो में भूसी की प्राप्ति 20 - 30 प्रतिशत तक होती है।  फसल का बाजार भाव उचित न होने पर इसके बीज व भूसी को नमी सोखने से बचाने के लिए शुष्क स्थान में भंडारण करना चाहिए। नमी के प्रभाव में आने पर भूसी की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिससे बाजार भाव भी कम हो जाता है।
डॉ. गजेन्द्र सिंह तोमर 
प्रोफेसर (एग्रोनॉमी ),कृषि महाविद्यालय,
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय,कृषकनगर, रायपुर (छत्तीसगढ़)


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