1. बागवानी

फल वृक्षों मे कैनॉपी (छत्र) प्रबंधन

विगत वर्षों में फलों के उत्पादन पद्धति में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला है। परंपरागत पद्धति से की जाने वाली फलों की बागवानी में वृहत् आकार की कैनॉपी के कारण प्रायः उत्पादकता की वांछित लक्ष्य की प्राप्ति में समस्या उत्पन्न होती रही है। इस कारण फलों की उत्पादन तथा उत्पादकता में वृद्धि लाने के लिए आरंम्भिक चरण में उचांई को नियंत्रित करना तथा छत्र (कैनॉपी) प्रबंधन महत्वपूर्ण तकनीक है। फल उत्पादकों की उच्च आय की प्राप्ति के लिये इसका इस्तेमाल फल वृक्षों तथा श्रृंखला फसलों  में करना चाहिये।

फल उत्पादन हेतु वृक्ष का कैनॉपी (छत्र) प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण घटक है। अधिक अच्छे गुणवत्ता वाले फलों की प्राप्ति के लिए वृक्ष के कैनॉपी में परिवर्तन करना ही कैनॉपी-प्रबंधन है। ज्यादातर फलदार वृक्षें में छत्र-प्रबंधन में हेरफेर द्वारा छोटे आकार के वृक्षों के सृजन से अच्छे गुणों वाले फलों का अधिकतम उत्पादन लिया जा सकता हैं। बड़े वृक्ष की तुलना में छोटा वृक्ष धूप को अधिक मात्रा में ग्रहण करते हैं। सूर्य के प्रकाश को अधिक मात्रा में ग्रहण करने तथा उसके रूपांतरण से फल उत्पादन में वृद्धि होती है। सूर्य से प्राप्त विकिरण और वृक्ष के छत्र द्वारा इस विकिरण का उपयोग फलों को निर्धारित करने वाले मुख्य घटक हैं।

यह प्रश्न हमेशा ही उठता है कि क्यों न वृक्षों को उनके प्राकृतिक रूप से फैलने पर छोड़ दिया जाये। इसका साधारण सा उत्तर हो सकता है कि प्रकृति का और हमारा उद्देश्य हमेशा एक समान नहीं होता। प्रकृति चाहती हैं कि पौधा अपने वंश बेल के संवर्द्धन हेतू जीवित रहे। प्रकृति इस बात की परवाह नहीं करती है वृक्ष से अच्छे आकार, उच्च गुणवत्ता वाले फलों का कितनी मात्रा में उत्पादन हेतू अच्छे फलों के साथ-साथ अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिये फल वृक्षों के प्राकृतिक रूप् और बनावट को वृक्ष की कटाई-छंटाई द्वारा संवारा जाता है। फल उत्पादक, अपने फल वृक्षों की वृद्धि और विकास को वैज्ञानिक विधि से नियंत्रित करने के इच्छुक रहते हैं। हमेशा प्राकृतिक रूप से वृक्षों को बढ़ने देना विवेकपूर्ण नहीं होता क्योंकि वृक्ष का अवांछनीय विकास फल उत्पादन की दृष्टि से लाभदायक नहीं होता। वृक्ष के इन अनावश्यक भाग को हटाना ही कांट-छांट (पु्रनिंग) कहलाता है। सही तरीके से वृक्ष की कटाई - छटाई से पौधे को एक विशेष आकार देकर अच्छी गुणवत्ता वाले फल प्राप्त किये जा सकते है।

कटाई -छंटाई में जलवायु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शीतोष्ण, उपोष्ण तथा उष्ण - कंटिबंधी जलवायु में उगाये जाने वाले वृक्षों के आकार प्रकार तथा बागवानों के विशिष्ट उद्देश्यों के अनुसार वृक्षों की सधाई तथा कटाई -छंटाई करने की जरूरत होती है। छत्र प्रबंधन वृक्ष की प्रकृति तथा बढ़वार क्रम, प्रति हेक्टेयर वृक्षों की संख्या तथा कटाई - छंटाई की तकनीक पर निर्भर करता है।

जिस समय वृक्ष अपनी युवा अवस्था में हो तथा अपनी मूल बनावट और आकार ले रहा हो उस समय कटाई - छंटाई उपयुक्त होती है, जिस वृक्ष के परिपक्व होने तक जारी रखा जाना चाहिये ।

व्यावसायिक उद्यानों में कटाई -छंटाई कार्य रोजमर्रा के कार्य को सरल बनाते हैं। जहां वृक्ष अपने निर्धारित जगह से अधिक बढ़ जाते है, वहां कटाई -छंटाई से फल सतह में वृद्धि हो सकती है। जहां वृक्ष घने होते है, वहां निचले क्षेत्र छत्र में छाया रहने के कारण फल बनने में कमी आती है। कटाई-छंटाई द्वारा वृक्ष के ऊपरी और निचले हिस्से में धूप आसानी से पहुंचती है और फल सतह में वृद्धि होने के फलस्वरूप ज्यादा फल बनते है। मूलवृंत (अर्थात कलम संयोजन से नीचे) से निकलने वाले अंकुरण को हटा देना चाहिये। तरूण वृक्ष की कलम (सायन) की छंटाई करने से सिर्फ वृद्धि में विलम्ब होता है और वृक्ष की किशोरवस्था बढ़ती है। कटाई -छंटाई या तो वृक्ष की वृद्धि के विरलीकरण (थिनिंग) को प्रोत्साहित करने या वृक्ष के आकार को कम करने के लिये की जाती है। फलने वाले वृक्षों में विरलीकरण से वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है, भीतरी टहनियां कम होती है। फलने वाले वृक्ष को बढ़ने और फैलने के लिये अनुकूल पर्यावरण मिलता है। टापिंग व हैजिंग द्वारा ऊपर से काटने से बाहर की ओर फैलने वाली टहनियां घटती है।

देश में बढ़ती जनसंख्या के पोषण तथा अंतराष्ट्रीय बाजार में वैश्विक चुनौती का सामना करने के लिये प्रति इकाई क्षेत्र में लगभग 10 गुणा ज्यादा पौधे लगाने की अत्यंत आवश्यकता है। यह तभी संभव है जब छत्र - प्रबंधन को अपनाया जाये ताकि वृक्ष की भीतरी हिस्सों में सूर्य की किरण आसानी से पहुंच सके और वृक्षों से अधिक संख्या में फल की प्राप्ति हो। छत्र -प्रबंधन का सीधा संबंध शुष्क पदार्थ उत्पादन, कलिकायन तथा फल की गुणवत्ता से होता है।

इस मैनुअल में कटाई -छंटाई पर गहराई से प्रकाश डाला गया है तथा प्रत्येक फल वृक्ष की आवश्यकता के अनुसार इसे स्पष्ट किया गया है। विभिन्न फलदार वृक्षों की छंटाई पर गहराई से प्रकाश डाला गया है तथा प्रत्येक फल वृक्ष की आवश्यकता के अनुसार इसे स्पष्ट किया गया है। विभिन्न फलदार वृक्षों की छंटाई के उद्देश्य सिद्धांत तथा आर्थिक पक्ष को व्यावहारिक उदाहरणों के द्वारा व्यापक रूप से स्पष्ट किया गया है, और फल उत्पादन में लगे हुये विभिन्न वर्गों के किसानों की जरूरतों के अनुसार सुझाव भी दिये गये है।

सघन बागवानी

कम उत्पादकता से निपटने के लिये सर्वाधिक उपर्युक्त विकल्प :-

1. पादप, वृक्ष की शक्ति, ओज एवं जलवायु

2. जलवायु घटक

3. मृदा उर्वरता

4. जल उपलब्धता

5. फसल प्रबंधन

क्या पौधे कैनॉपी प्रबंधन आवश्यक है : -

1. वांछित वृक्ष के आकार को प्रारम्भ में ही नियंत्रित करता है।

2. प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक वृक्ष लगाये जा सकते है।

3. सूर्य विकिरण में सुधार होता है

4. कृषि संचालन क्रियाओं को सुविधाजनक बनाता है।

5. अच्छे फलों की उपज को बढ़ाता है।

बौंने आकार वाले पेड़ो का लाभ : -

1. इसमें फल तुड़ाई में आसानी होने के साथ - साथ इसमें लागत भी कम आती है।

2. इसके फल देने वाली शाखाओं की संख्या अनुत्पादक शाखाओं की तुलना में अधिक होती है।

3. कीट व रोगो के नियंत्रण के लिये दवा का छिड़काव में आसानी होती है।

4. उच्च आर्थिक लाभ की प्राप्ति के लिये सीमित क्षेत्र में अधिक पौध रोपण संभव होता है।

5. प्रकाश मा अधिकत्तम उपयोग ।

6. रोग और नाशीजीव संक्रमण से बचने के लिये अनुकूल सूक्ष्म जलवायु को बनने से रोकना।

7. संवर्धन कार्य करने में सुविधाजनक स्थिति ।

8. गुणयुक्त फल उत्पादन के साथ अधिकतम उत्पादकता ।

9. आपेक्षित छत्र बनावट प्राप्त करने में किफायत ।

कैनॉपी (छत्र) प्रबंधन के मूलभूत सिद्धांत : -

अधिक संख्या तथा गुणवत्ता वाले फलों की प्राप्ति के लिये वृक्ष के छत्र (कैनॉपी) में परिवर्तन करना ही छत्र - प्रबंधन है। छत्र - प्रबंधन में विशेष रूप से पौधे की सधाई एवं कटाई -छंटाई से वृक्ष के भीतरी हिस्सों में धूप की मात्रा पहुंचने का प्रभाव पड़ता है, क्योंकि वृक्ष की बनावट के अनुसार पत्तियां फैलती हैं तथा पेड़ को प्राप्त सूर्य की रोशनी के विकिरण की मात्रा का निर्धारण करती है। वृक्ष के विभिन्न अंगो को एक व्यवस्थित क्रम देना एक आदर्श सधाई नीति होती है जिसमें विशेष रूप से पेड़ के लिये एक बेहतर संरचनात्मक आकार विकसित करना शामिल है, जिससे धूप का अनुकूलतम उपयोग हो और उत्पादकता को भी बढ़ावा मिले।

वृक्षों तथा फलों की वृद्धि व विकास के लिये धूप बहुत आवश्यक है। हरी पत्तियां कार्बोहाइड्रेट तथा शर्करा बनाने के लिये धूप को ग्रहण करती है जिसे वृक्ष के अन्य जरूरतमंद  भागों जैसे - कली, पूष्प तथा फलों तथा पहुंचाया जाता है। वृक्ष के छत्र में धूप की मात्रा बढ़ने से वृक्ष की वृद्धि, उत्पादकता, पैदावार तथा फल की गुणवत्ता में बढ़ोत्तरी होती है। उद्यान में आने वाली धूप पर पौधो की सघनता तथा अभिविन्यास का भी असर पड़ता है। सामान्यतः पास - पास लगे वृक्षों में जल्दी छाया आना एक समस्या है। वृक्ष के पश्चिमी तथा दक्षिणमुखी होने की तुलना में पूर्व - पश्चिम दिशा में पंक्ति रोपण से ज्यादा छाया आती है। सशक्त फलदायक टहनियों में ज्यादा मात्रा में फल उगते हैं। वृक्ष को उसके प्रारम्भिक काल में एक मजबूत तथा संतुलित आकार देना बागवानों की पहली समस्या होती है ताकि उनसे समान फलन लिया जा सके । प्रारम्भिक वर्षों में कटाई-छंटाई का उद्देश्य वृक्ष की सधाई से ही होता है ताकि पेड़ को मजबूत आकार और ढांचा दिया जा सके जिसमें सभी टहनियों को वांछित जगह तथा मनमाफिक आकार दिया जा सके।

1. प्रकाश मा अधिकत्तम उपयोग ।

2. रोग और नाशीजीव संक्रमण से बचने के लिये अनुकूल सूक्ष्म जलवायु को बनने से रोकना।

3. संवर्धन कार्य करने में सुविधाजनक स्थिति ।

4. गुणयुक्त फल उत्पादन के साथ अधिकतम उत्पादकता ।

5. आपेक्षित छत्र बनावट प्राप्त करने में किफायत ।

कैनॉपी छंटाई के उद्देश्य : -

कटाई - छंटाई के मुख्य उद्देश्य होते है, प्रथम पौधे की बनावट और वृद्धि को नियंत्रित करना तथा द्वितीय फल के उत्पादन और गुणवत्ता को बढ़ाना । संवर्धन क्रियाओं की सहायता से पौधे को बागवान इच्छा के अनुसार उगाया और बड़ा किया जाता है। इन व्यापक उद्देश्यों के तहत पौध की कटाई - छंटाई कार्य को निम्नालिखित में से एक या अधिक उद्देश्यों के लिये उपयोग में लाया जाता है। जिसमें सम्मिलित है -

1. प्ररोह को पुनः स्थापित करना - तरूमूल अनुपात।

2. कमजोर द्विशाखाओं को बनने से रोकना।

3. मुख्य संरचनात्मक शाखा की संख्या और स्थान को नियंत्रित करना।

4. टहनियों को आपस में एक दूसरे के ऊपर चढ़ने और अवरोध को हटाना।

5. जल प्ररोह / अंत भूस्तारी (संकर) को हटाना।

6. प्ररोह की वृ़द्ध, पुष्टता तथा दिशा को नियंत्रित करना।

7. पौध के छत्र को खुला रखना।

8. वृद्धि और फलन को नियंत्रित करना।

9. नियमित फलन को नियंत्रित करना।

10. सघन बागवानी के लिये पौधे के आकार को नियंत्रित करना।

11. पौधे को आंतरिक हिस्सों में धूप पहुंचने को नियंत्रित करना ।

12. फल के आकार को बढ़ाना ।

13. बागवानी कार्यो को सरल बनाना ।

14. पौधे की आयु बढ़ाना ।

15. पुराने और घने बागों का जीर्णोद्वार करना ।

16. रोग और नाशीजीव नियंत्रण

17. पौध को वांछनीय आकार देना ।

 

कं.          फल वृक्ष           दूरी मी.                  पौध की संख्या

1. अमरूद 1.5X3                   2222

                              3 X3                    1111

                              3 X3                    555

                              1 X2                    5000

2. आम 3 X4                    833

                              3 X6                    555

                              4 X6                    416

                              5 X5                    400

3. आंवला 4 X5                    500

4. काजू 4.4 X4.4                 516

                              5.5 X5.5                 330

5. नींबू वर्गीय फल

            1 लाईम और लेमन   3 X3                    1111

            2 माल्टा/संतरा             4 X4.5                   555

                              4 X5                    500

                              5 X5                    400

                              4.5 X4.5                 494

                              5 X4.5                   444

6. लीची 4.5 X4.5                 494

                              6 X6                    278

7. केला 1.8 X1.8                 3086

                              1.5 X1.5                 4444

8. बेर               6 X6                    278

9. बेल 8 X8                    156

10. शरीफा सीताफल 25 X25                        1600

11. कटहल 10 X10                        100

12. जामुन 10 X10                        100

13. करौन्दा 3 X2                    1600

14. चीकू              5 X5                    400

15. अनार 4 X3                    833

                              5 X3                    666

16. महुआ 10 X10                  100

 

सोनू दिवाकर, हेमन्त कुमार ,ललित कुमार वर्मा

पंडित किशोरि लाल शुक्ला उद्दानकी महाविद्दालय एवं अनुसंधान केन्द्र राजनांदगांव,  (छ.ग.)

English Summary: Canopy management of fruit trees

Like this article?

Hey! I am . Did you liked this article and have suggestions to improve this article? Mail me your suggestions and feedback.

Share your comments

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें. कृषि से संबंधित देशभर की सभी लेटेस्ट ख़बरें मेल पर पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें.

Subscribe Newsletters

Latest feeds

More News