भारतीय कृषि परिदृश्य में रबी की फसलों का अपना एक विशिष्ट स्थान है, और इसमें भी गेहूं को 'अन्न भंडार की रीढ़' माना जाता है. देश की करोड़ों की आबादी का पेट भरने से लेकर किसानों की आर्थिक समृद्धि तक, सब कुछ गेहूं की पैदावार पर निर्भर करता है. लेकिन वर्तमान में खेती के सामने सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन है.
विशेष रूप से फरवरी के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं की फसल अपनी सबसे नाजुक अवस्था यानी 'दाना भरने' (Grain Filling Stage) में होती है, तब अचानक बढ़ता तापमान फसल के लिए काल बन जाता है. इसे वैज्ञानिक भाषा में टर्मिनल हीट स्ट्रेस (Terminal Heat Stress) कहते हैं. इसी समय कई रस चूषक कीट भी फसल को नुकसान पहुंचते हैं. इन दोनों समस्याओं से निपटने ज़ायडेक्स कंपनी के दो उत्पाद- जायटॉनिक सुरक्षा और जायटॉनिक नीम, एक क्रांतिकारी समाधान के रूप में उभरे हैं.
गेहूं की फसल और बदलता मौसम: एक गंभीर चुनौती
गेहूं मूल रूप से एक शीतोष्ण जलवायु की फसल है. इसके बेहतर विकास के लिए ठंडी रातों और मध्यम तापमान वाले दिनों की आवश्यकता होती है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से मौसम का मिजाज बदला है. मार्च के प्रारंभ मे ही उत्तर भारत के कई हिस्सों में तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है.
जब 'टर्मिनल हीट स्ट्रेस' यानी तापमान का अचानक झटका गेहूं की 'मिल्किंग स्टेज' (दूध भरने की अवस्था) पर लगता है, तो पौधे की आंतरिक कार्यप्रणाली बाधित हो जाती है. इस तनावपूर्ण स्थिति के कारण दाने अपना पूरा विकास चक्र पूरा नहीं कर पाते और समय से पहले सूख जाते हैं. फलस्वरूप, दानों का आकार छोटा और वजन कम रह जाता है. यह स्थिति न केवल अनाज की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि प्रति एकड़ पैदावार में 15 से 25 प्रतिशत की बड़ी गिरावट का कारण बनती है.
गेहूं में तनाव के प्रकार: जैविक बनाम अजैविक
खेती में होने वाले तनाव को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है:
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अजैविक (Abiotic) तनाव: यह प्रकृति जनित होता है. इसमें अत्यधिक गर्मी (Heat Stress), सिंचाई की कमी से सूखा, अचानक पाला गिरना, मिट्टी में लवणीयता (Salinity) या पोषक तत्वों का अभाव शामिल है. मार्च-अप्रैल में 'हीट स्ट्रेस' सबसे प्रमुख अजैविक तनाव है.
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जैविक (Biotic) तनाव: यह जीवित कारकों से होता है. जैसे कि कीटों का हमला (एफिड्स/चेपा), कवक रोग (जैसे रतुआ) और खरपतवार. जब पौधा अजैविक तनाव (गर्मी) के कारण कमजोर होता है, तो जैविक तनाव (कीट) उस पर ज्यादा तेजी से हमला करते हैं.
जायटॉनिक सुरक्षा: फसल का 'थर्मल इंसुलेटर'
ज़ायडेक्स का जायटॉनिक सुरक्षा एक आधुनिक बायो-फर्टिलाइज़र है जो तकनीक और प्रकृति का अद्भुत मेल है. यह पौधों के लिए एक अदृश्य कवच की तरह काम करता है.
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नमी का संरक्षण: छिड़काव के बाद यह पत्तियों पर एक सूक्ष्म परत बनाता है. रात में जो ओस गिरती है, वह आमतौर पर सूरज निकलते ही उड़ जाती है या नीचे गिर जाती है. जायटॉनिक सुरक्षा इस ओस को पकड़कर पत्तियों पर लंबे समय तक रोक कर रखता है और उनके सूक्ष्म छिद्रों (Stomata) के माध्यम से पौधे को उपलब्ध कराता है. इससे सूखे की स्थिति में भी पौधे को आवश्यक नमी मिलती रहती है.
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प्रकाश संश्लेषण में वृद्धि: ओस मे प्राकृतिक रूप से कार्बन डाइऑक्साइड घुली रहती है जो प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया को बेहतर करने मे सहायता देती है, इससे पौधा अधिक ऊर्जा और शर्करा बनाता है, जिससे दाने चमकदार और भारी बनते हैं.
4. जायटॉनिक नीम: माइक्रोएनकैप्सुलेशन तकनीक का जादू
नीम तेल एक बहु आयामी प्राकृतिक फसल संरक्षक के रूप मे जाना जाता है. इसी नीम के तेल मे ज़ायडेक्स ने विशिष्ट माइक्रोएनकैप्सुलेशन टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया है. इससे जायटॉनिक नीम बहुत अधिक प्रभावी बन गया है क्योंकि इसमें
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लंबे समय तक असर: यह तकनीक नीम की बूंदों को पत्तों पर मजबूती से चिपका देती है, जिससे यह धूप या मामूली बारिश से धुलता नहीं है.
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कीट चक्र पर प्रहार: इसमें मौजूद एजाडिरेक्टिन (300 ppm) पत्तों को कड़वा बना देता है. इससे हानिकारक कीट उन पर अंडे नहीं दे पाते और उनका जीवन चक्र टूट जाता है.
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सुरक्षित समाधान: यह केवल शत्रु कीटों को मारता है, जबकि मधुमक्खियों और अन्य मित्र कीटों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है.
सुरक्षा और नीम का संगम: एक साथ उपयोग क्यों है जरूरी?
किसानों के मन में यह सवाल आ सकता है कि इन दोनों का एक साथ उपयोग क्यों करें? इसका कारण बहुत सरल है- दोहरी मार का मुकाबला दोहरी सुरक्षा से.
मार्च के महीने में गर्मी पौधे को भीतर से कमजोर करती है और कीट बाहर से. यदि आप केवल कीटनाशक डालते हैं, तो गर्मी दाने को सुखा देगी. यदि केवल गर्मी का उपाय करते हैं, तो कीट फसल उजाड़ देंगे. जायटॉनिक सुरक्षा और जायटॉनिक नीम का 'टैंक मिक्स' पौधे को वह शक्ति देता है कि वह उच्च तापमान को भी सह सके और कीटों से भी बचा रहे. यह 'वन-स्टॉप सोल्यूशन' है जो खेती की लागत घटाता है और लाभ बढ़ाता है.
उपयोग की सही विधि और मात्रा
सही परिणाम प्राप्त करने के लिए सही तकनीक का होना अनिवार्य है:
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जायटॉनिक सुरक्षा: 500 ग्राम से 1 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से उपयोग करें.
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जायटॉनिक नीम: 500 मिली प्रति एकड़ की मात्रा पर्याप्त है.
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घोल तैयार करना: सबसे पहले 15-20 लीटर पानी लें. इसमे जायटॉनिक सुरक्षा मिलाकर अच्छी तरह घोल तैयार करें. यदि आप किसी अन्य रासायनिक कीटनाशक का प्रयोग कर रहे हैं, तो पहले नीम और उस दवा को मिलाएं, फिर सुरक्षा के घोल मे मिल दें . अंत में इस घोल मे आवश्यकतानुसार पानी मिलकर छिड़काव करें.
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छिड़काव का समय: सर्वोत्तम परिणामों के लिए सुबह जल्दी या सूर्यास्त से ठीक पहले छिड़काव करें. इससे पत्तियों को ओस सोखने का पूरा समय मिलता है.
कब करें छिड़काव? (सटीक समय)
गेहूं की फसल में छिड़काव के दो महत्वपूर्ण चरण हैं:-
1. बालियां निकलने की अवस्था (Booting Stage): जब फसल में बालियां बन रही हों, तब पहला स्प्रे करें ताकि पौधा आने वाली गर्मी के लिए तैयार हो जाए.
2. दाना भरने की अवस्था (Milking/Grain Filling Stage): मार्च के दूसरे या तीसरे सप्ताह में जब तापमान 30 डिग्री पार करने लगे, तब दूसरा स्प्रे करें. यह दानों के वजन और चमक को सुनिश्चित करेगा.
किसानों के लिए आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
इस तकनीक को अपनाने के कई दूरगामी फायदे हैं:
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पैदावार में बढ़ोतरी: दानों का 1000-बीज भार (Test Weight) बढ़ जाता है, जिससे कुल वजन में वृद्धि होती है.
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कम लागत: यह जैविक समाधान बार-बार महंगे और जहरीले रसायनों के छिड़काव की जरूरत को कम करता है.
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मिट्टी की सेहत: यह पूरी तरह से बायो-डिग्रेडेबल है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनी रहती है.
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बेहतर बाजार मूल्य: चमकदार और पुष्ट दानों के कारण बाजार में किसानों को अपनी फसल का बेहतर भाव मिलता है.
अन्य फसलों के लिए उपयोगिता
यह अद्भुत जोड़ी केवल गेहूं के लिए ही लाभकरी नहीं है. इसका उपयोग चना, मक्का, मूंगफली, मूंग, उरद की फसलों मे बेहतरीन परिणाम देता है. खरीफ के समय जब बारिश का बीच बीच मे अंतराल पड़ जाता है और सिंचाई की सुविधा नहीं होती है तब इसके प्रयोग से फसल को होने वाले अजैविक तनाव से बचाकर बेहतर गुणवत्ता युक्त उतपादन लिया जा सकता है. यह विशेष रूप से सोयाबीन, कपास, धान, मक्का मे अत्यंत लाभकारी है, इसके अतिरिक्त मिर्च, टमाटर और बागवानी फसलों (जैसे आम, नींबू) में भी किया जा सकता है. हर वह फसल जो गर्मी और चूसक कीटों (Sucking Pests) से प्रभावित होती है, उसके लिए यह वरदान है.
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