उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के बी.बी. नगर ब्लॉक अंतर्गत निसुर्खा गांव के निवासी संजीव कुमार शर्मा एक साधारण किसान परिवार से आते हैं. इंटरमीडिएट के साथ-साथ आई.टी.आई. तक शिक्षित संजीव कुमार शर्मा ने अपने जीवन में खेती को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और उज्ज्वल भविष्य की संभावना के रूप में अपनाया. आज के दौर में, जब रासायनिक खेती के कारण मिट्टी की उर्वरता में लगातार गिरावट, उत्पादन लागत में अत्यधिक वृद्धि और किसानों की आर्थिक अस्थिरता एक गंभीर चुनौती बन चुकी है, ऐसे समय में उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाकर एक नई और प्रेरणादायक राह दिखाई है.
रसायन-मुक्त खेती के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया है कि खेती न केवल पर्यावरण के अनुकूल हो सकती है, बल्कि किसान को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बना सकती है. उनकी जीवन-यात्रा संघर्ष, संकल्प और सतत प्रयासों की मिसाल है, जिसमें उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बावजूद धैर्य नहीं छोड़ा और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर खेती को लाभकारी बनाया. आज संजीव कुमार शर्मा की सफलता-कहानी देश भर के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है.
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
संजीव का जीवन आरंभ से ही कृषि तक सीमित नहीं था. एक समय वे गैर-कृषि व्यवसाय से जुड़े हुए थे, किंतु समय के साथ उस व्यवसाय में आर्थिक नुकसान होने लगा. लगातार घाटे और बढ़ती पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें आत्ममंथन के लिए विवश किया. इसी कठिन दौर में उन्होंने खेती को ही अपने भविष्य का आधार बनाने का निर्णय लिया. प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने परंपरागत रासायनिक खेती अपनाई, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और बाजार-आधारित बीजों पर निर्भरता के कारण लागत बढ़ती गई, जबकि लाभ अपेक्षाकृत कम रहा. साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और फसलों की सेहत पर पड़ते दुष्प्रभावों ने उन्हें गंभीर चिंता में डाल दिया.
प्राकृतिक खेती की ओर परिवर्तन
समाधान की खोज में संजीव का परिचय प्राकृतिक खेती की अवधारणा से हुआ. विभिन्न किसान अनुभवों, ऑनलाइन वीडियो, लेखों तथा प्रशिक्षण कार्यक्रमों से प्रेरित होकर उन्होंने प्राकृतिक खेती को एक वैकल्पिक पद्धति नहीं, बल्कि स्थायी कृषि-दर्शन के रूप में अपनाने का निश्चय किया. उन्होंने चरणबद्ध रूप से रसायनों का प्रयोग बंद किया और देसी गाय आधारित प्राकृतिक खेती की शुरुआत की. जीवामृत, घनजीवामृत और बीजामृत जैसे गोबर-गोमूत्र आधारित जैविक इनपुट्स उनकी खेती की आधारशिला बने. साथ ही उन्होंने देशी बीजों के संरक्षण और सह-फसली प्रणाली को अपनाकर फसल विविधीकरण पर विशेष ध्यान दिया.
शुरुआती चुनौतियां एवं परिवर्तन
प्राकृतिक खेती की शुरुआत में कुछ समय के लिए उत्पादन में गिरावट आई और आसपास के किसान इस पद्धति को लेकर संशय में थे. बाजार में भी प्राकृतिक उत्पादों की पहचान सीमित थी. इसके बावजूद संजीव कुमार शर्मा ने धैर्य और आत्मविश्वास के साथ अपने प्रयोग जारी रखे. निरंतर प्राकृतिक तरीकों को अपनाने से उनके खेतों की मिट्टी में स्पष्ट सुधार दिखाई देने लगा. जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ी, केंचुओं की संख्या में वृद्धि हुई और मिट्टी की जल-धारण क्षमता बेहतर हुई. परिणामस्वरूप फसलों की जड़ें मजबूत हुईं और रोग-कीट प्रकोप में कमी आई. वर्तमान में वे गन्ना-हल्दी-बैंगन-मिर्च जैसी फसलों की सहफसली खेती प्राकृतिक विधियों से कर रहे हैं, जिससे जोखिम कम हुआ और आय के कई स्रोत विकसित हुए.
लागत, फसल विविधता, वैल्यू एडिशन एवं सामाजिक प्रभाव
प्राकृतिक खेती अपनाने से संजीव की खेती की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है. उनकी विशेष उपलब्धि यह है कि वे केवल खेत की कच्ची उपज बेचने तक सीमित न रहकर, फसलों की स्वयं प्रोसेसिंग कर सीधे उपभोक्ताओं तक पहुँच बना रहे हैं. गन्ने से वे विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक उप-उत्पाद तैयार करते हैं, जबकि हल्दी को चिप्स में काटकर, प्राकृतिक विधि से सुखाकर तथा कूट-पीसकर शुद्ध हल्दी पाउडर का निर्माण करते हैं.
इसी प्रकार सब्जियों एवं मसालों को भी स्वदेशी और रसायन-मुक्त उत्पाद के रूप में तैयार कर वे घर से ही उनका मार्केटिंग करते हैं. प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी खेती की कुल लागत में लगभग 40-60 प्रतिशत तक की कमी आई है, क्योंकि रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं बाहरी इनपुट्स पर होने वाला खर्च लगभग समाप्त हो गया है.
परंपरागत रासायनिक खेती की तुलना में, जहां प्रति एकड़ लागत अधिक होती है और लाभ सीमित रहता है, वहीं प्राकृतिक खेती में शुद्ध लाभ (नेट रिटर्न) में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है. प्राकृतिक विधियों से उत्पादित फसलों की गुणवत्ता बेहतर होने के कारण उन्हें बाजार में सामान्य उपज की तुलना में 30-40 प्रतिशत तक अधिक मूल्य प्राप्त होता है, जिससे उनकी आय में स्थिरता आई है और जोखिम में भी कमी हुई है.
संजीव कुमार शर्मा केवल अपने खेत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे प्राकृतिक खेती के प्रेरक एवं मार्गदर्शक के रूप में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. उनके प्रयासों से अब तक लगभग 50 हजार से अधिक किसान प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, तथा उनकी प्रेरणा से 500 से अधिक किसान परिवार प्राकृतिक खेती को अपनाने की दिशा में अग्रसर हुए हैं.
वे किसानों को प्राकृतिक खेती, सहफसली प्रणाली एवं कम-लागत कृषि मॉडल के व्यावहारिक पहलुओं से निरंतर अवगत कराते रहते हैं. प्राकृतिक खेती में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा है. इसके अतिरिक्त, वर्ष 2019 में वर्ल्ड एनर्जी फाउंडेशन द्वारा उन्हें “ऊर्जा रत्न पुरस्कार” से सम्मानित किया गया. वर्तमान में वे उत्तर भारत के इंडो-गैंगेटिक प्लेन जोन में प्राकृतिक खेती के एक प्रमुख संसाधन व्यक्ति के रूप में कार्य कर रहे हैं. उनकी यात्रा यह प्रमाणित करती है कि प्राकृतिक खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम ही नहीं, बल्कि किसानों के लिए आर्थिक रूप से टिकाऊ और आत्मनिर्भर मॉडल भी है.
इसके साथ ही, उनके द्वारा कई मानव-चालित कृषि यंत्रों का भी निर्माण किया गया है, जो कृषि कार्यों को अधिक सुगम, समय-साध्य और श्रम-सक्षम बनाते हैं. समय-समय पर उनके खेत पर प्राकृतिक खेती एवं उनके द्वारा विकसित कृषि यंत्रों को देखने के लिए प्रदेश और देश के अनेक विशिष्ट जनों का आगमन हुआ है. वर्ष 2021 में कणेरी मठ के महाराज पूज्य कांड सिद्धेश्वर जी महाराज, भारत सरकार के नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार, पद्मश्री डॉ. सुभाष पालेकर तथा 21 दिसंबर 2024 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा उनके खेत पर आकर उनके प्रयासों एवं नवाचारों की सराहना कर चुके हैं.
यह तकनीक उन्हें उनके गुरु पद्मश्री डॉ. सुभाष पालेकर से प्राप्त हुई. इसके अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश के उप कृषि निदेशक (प्रसार) आर. के. सिंह, लखनऊ से नाबार्ड के महाप्रबंधक सहित अनेक अधिकारी उनके कार्यों का अवलोकन कर चुके हैं. देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों के छात्र एवं वैज्ञानिक भी निरंतर उनके खेत पर आकर प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करते रहते हैं. संजीव कुमार शर्मा प्राकृतिक खेती के अंतर्गत फसलों की स्वयं प्रोसेसिंग और प्रत्यक्ष विपणन के माध्यम से बेहतर मूल्य प्राप्त कर रहे हैं. उनका मॉडल प्राकृतिक खेती को कम-लागत, लाभकारी और किसानों के लिए आत्मनिर्भर विकल्प के रूप में प्रस्तुत करता है.
लेखक: आलोक कुमार सिंह1 दिग्विजय सिंह2
1राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली- 110012
2डॉ० राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, बिहार- 848125
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