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समस्तीपुर बिहार में वृद्धजन ज्ञान, अनुभव और जीवन की समझ का अमूल्य भंडार हैं। समाज के विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है।
समस्तीपुर डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय के मानव विकास एवं परिवार अध्ययन विभाग द्वारा वृद्ध आबादी महत्वपूर्ण मुद्दे चुनौतियाँ और समाधान विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ मंगलवार को हुआ। 17–18 मार्च तक चलने वाले इस सम्मेलन में देशभर के विशेषज्ञ, वैज्ञानिक और शोधार्थी वृद्धजन से जुड़े सामाजिक, स्वास्थ्य और नीतिगत पहलुओं पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पांडेय ने कहा कि पारंपरिक सामाजिक संरचनाएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं और परिवार छोटे होते जा रहे हैं। इसके कारण आज की युवा पीढ़ी व्यस्त जीवनशैली के चलते कई बार अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल नहीं कर पा रही है। उन्होंने आगाह किया कि आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।
कुलपति ने कहा कि वर्ष 2030 तक देश में वृद्धजनों की संख्या लगभग 18 करोड़ होने की संभावना है, जो एक बड़ी सामाजिक चुनौती के रूप में सामने आएगी। उन्होंने कहा कि “वृद्धजन ज्ञान, अनुभव और जीवन की समझ का अमूल्य भंडार हैं। समाज के विकास में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है, इसलिए उनके सम्मान, सुरक्षा और देखभाल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील रहें और जिम्मेदारी निभाएं। साथ ही यह भी बताया कि सरकार वृद्धजनों के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही है, जिनमें वृद्धाश्रमों का निर्माण और सामाजिक सुरक्षा उपाय शामिल हैं।
सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए डॉ. तान्या सेन गुप्ता ने कहा कि वृद्धजनों की देखभाल केवल परिवार की नहीं, बल्कि समाज और सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि बुजुर्गों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और सहयोगात्मक वातावरण तैयार करना अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की डीन डॉ. उषा सिंह, निदेशक अनुसंधान डॉ. ए. के. सिंह, मानव विकास विशेषज्ञ प्रो. विशाला पटनम, तथा राष्ट्रीय एसोसिएशन ऑफ पेलिएटिव केयर फॉर आयुष एंड इंटीग्रेटिव मेडिसिन के अध्यक्ष डॉ. अभिजीत के. डैम सहित कई गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
सम्मेलन के दौरान विभिन्न तकनीकी सत्रों में वृद्धावस्था से जुड़ी प्रमुख समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की गई। इसमें जनसंख्या में हो रहे बदलाव, स्वस्थ वृद्धावस्था, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक अलगाव, कानूनी एवं वित्तीय सुरक्षा, पोषण, आयुर्वेद, योग एवं ध्यान जैसे विषय शामिल रहे। विशेषज्ञों ने बुजुर्गों में बढ़ती अकेलेपन और अवसाद की समस्या को गंभीर बताते हुए सामुदायिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया।
पहले दिन आठ विषयगत ट्रैकों पर कुल 17 सहकर्मी-समीक्षित पोस्टर प्रस्तुत किए गए। इनमें वृद्धजन जनसंख्या, जनसांख्यिकीय परिवर्तन, वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007, सामाजिक-भावनात्मक कल्याण, पोषण प्रबंधन और आध्यात्मिकता जैसे विषय प्रमुख रहे।
सम्मेलन में आमंत्रित वक्ताओं के रूप में डॉ. ए. के. आदित्य, डॉ. शुभांगी सिंह और डॉ. अभिजीत के. डैम ने भी अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए और वृद्धजन स्वास्थ्य व देखभाल के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. पी. के. प्रणव, पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. राकेश मणि शर्मा, डॉ. शिवपूजन सिंह सहित कई शिक्षक, वैज्ञानिक और शोधार्थी मौजूद रहे।
आयोजकों के अनुसार, इस सम्मेलन का उद्देश्य वृद्ध आबादी से जुड़ी चुनौतियों पर गंभीर मंथन कर ठोस समाधान निकालना है, ताकि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके और बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझा जा सके। सम्मेलन के दूसरे दिन कानूनी प्रावधानों, पोषण, योग और ध्यान जैसे विषयों पर भी विस्तृत चर्चा होगी।
रिपोर्ट : रामजी कुमार FTJ बिहार।
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