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Updated on: 27 May, 2018 12:00 AM IST

खून सस्ता है मगर यूं न पिया जाये मुझे

खून सस्ता है मगर यूं न पिया जाये मुझे
जहर जब फैले तो फ़ासिद न कहा जाये मुझे

पेश है चाय जो चाहे पिये गर-ए-दिल-ए-सब्ज़
जो नहीं चाहता वह ज़हर पिला जाये मुझे

कार में इतनी जगह थी मैं समा सकता था
क्यों यह साहब को लगा छोड़ दिया जाये मुझे

फ़ील-ए-बदमस्त की मानिन्द गुज़रने वाले!
कहीं चियूंटी तेरी मय्यत न दिखा जाये मुझे

तख्त के गिर्द मैं करता रहा जिस तरह तवाफ़
उन मनासिक पे ही हाजी न कहा जाये मुझे

सब चराग़ों की हिफ़ाज़त के लिए जलता हूँ
नहीं मन्ज़र अँधेरों में रखा जाये मुझे

यूँ ही हिजयान में बकता हूं मैं इन्साफ! इन्साफ!
कुछ कहा जाये न मुझ से न सुना जाये मुझे.

अनीस अंसारी

स्त्रोत : कविता कोष 

English Summary: anees Ansari
Published on: 27 May 2018, 01:26 IST

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