जुलाई का महीना शुरु हो चुका है और इस महीने की शुरुआत होते ही मानसून का आगमन हो जाता है, यानी की बरसात. साथ ही इस मौसम में सबसे बड़ी मुसीबत पशुपालकों के लिए खड़ी हो जाती है. इसका कारण है पशुओं का बार-बार बीमार पड़ना. इस मौसम में बकरियों का विशेष रुप से ख्याल रखना पड़ता है, क्योंकि बारिश में इनमें संक्रमण का अधिक खतरा रहता है और ऐसे में बचाव बेहद ही आवश्यक है.
बारिश में क्यों बढ़ता है संक्रमण का खतरा?
बरसात के मौसम में बाड़ों में नमी बनी रहती है, जिससे बैक्टीरिया, वायरस और फफूंद तेजी से पनपते हैं. इसके अलावा गीला चारा, दूषित पानी और कीचड़ में रहने के कारण बकरियां आसानी से संक्रमण की चपेट में आ जाती हैं. यदि पशुपालक नियमित सफाई और संतुलित आहार पर ध्यान न दें तो बीमारी पूरे झुंड में तेजी से फैल सकती है.
बाड़े की सफाई रखें ध्यान
अगर आप भी बकरी पालन करते हैं तो संक्रमण से बचाव का पहला और सबसे प्रभावी तरीका बकरियों के रहने की जगह को साफ और सूखा रखना है. बाड़े में पानी जमा नहीं होना चाहिए और फर्श पर सूखी भूसी या बिछावन का इस्तेमाल करना चाहिए. गीले बिछावन को समय-समय पर बदलना जरूरी है ताकि बैक्टीरिया और फफूंद विकसित न हो सकें. साथ ही बाड़े में पर्याप्त हवा और धूप का प्रवेश होना चाहिए.
साफ पानी और गुणवत्तापूर्ण चारा दें
बरसात में दूषित पानी संक्रमण का सबसे बड़ा कारण बनता है. बकरियों को हमेशा साफ और ताजा पानी ही पिलाएं. बारिश में भीगा हुआ, सड़ा-गला या फफूंद लगा चारा बिल्कुल न खिलाएं, क्योंकि इससे पाचन संबंधी बीमारियां और विषाक्तता का खतरा बढ़ जाता है. हरे चारे के साथ सूखा चारा भी संतुलित मात्रा में देना चाहिए ताकि पाचन तंत्र स्वस्थ बना रहे.
देसी पत्तियां बढ़ाती हैं रोग प्रतिरोधक क्षमता
बारिश के मौसम में कुछ प्राकृतिक पत्तियां बकरियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में मदद करती हैं. सहजन (मोरिंगा) की पत्तियां प्रोटीन और विटामिन से भरपूर होती हैं, जो शरीर को पोषण देती हैं. नीम पर उगी गिलोय की सीमित मात्रा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है. अमरूद की पत्तियां पाचन तंत्र को मजबूत रखती हैं, जबकि नीम की पत्तियों में मौजूद औषधीय गुण संक्रमण के खतरे को कम करने में मदद कर सकते हैं. हालांकि इन सभी पत्तियों को संतुलित मात्रा में ही सामान्य चारे के साथ मिलाकर खिलाना चाहिए.
समय पर डीवॉर्मिंग कराना जरूर
बरसात के मौसम में पेट के कीड़ों का खतरा सबसे अधिक रहता है. यदि बकरियों के शरीर में कृमि बढ़ जाते हैं तो वे चारे से मिलने वाले पोषक तत्वों का पूरा लाभ नहीं उठा पातीं. इससे उनका वजन कम होने लगता है और विकास रुक जाता है. इसलिए पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार नियमित अंतराल पर डीवॉर्मिंग कराना आवश्यक है. विशेष रूप से छोटे बच्चों और गर्भवती बकरियों की इस दौरान अतिरिक्त निगरानी करनी चाहिए.
टीकाकरण को नजरअंदाज न करें
संक्रमण से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण है. बकरी पालन करने वाले किसानों को अपने क्षेत्र में प्रचलित बीमारियों जैसे पीपीआर (PPR), एंटरोटॉक्सिमिया, गोट पॉक्स और एफएमडी (मुंह-खुर रोग) के खिलाफ निर्धारित समय पर टीके लगवाने चाहिए. नियमित टीकाकरण से गंभीर बीमारियों का खतरा काफी कम हो जाता है और पूरे झुंड की सुरक्षा सुनिश्चित होती है.
बीमार बकरी को तुरंत अलग करें
यदि किसी बकरी में बुखार, खांसी, दस्त, भूख कम लगना, सुस्ती या नाक से पानी आने जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे तुरंत स्वस्थ बकरियों से अलग कर देना चाहिए. इससे संक्रमण पूरे झुंड में फैलने से रोका जा सकता है. इसके बाद बिना देरी किए पशु चिकित्सक से जांच और उपचार कराना चाहिए. घरेलू उपचार पर अधिक समय तक निर्भर रहना नुकसानदायक हो सकता है.
बारिश में चराई के दौरान बरतें सावधानी
बरसात में जलभराव वाले क्षेत्रों में बकरियों को चराने से बचना चाहिए. ऐसे स्थानों पर परजीवी और संक्रमण फैलाने वाले जीवाणु अधिक मात्रा में मौजूद रहते हैं. कोशिश करें कि बकरियों को सूखी और साफ जगहों पर ही चराया जाए. चराई के बाद उनके खुरों को साफ करना भी संक्रमण से बचाव में मदद करता है.
लेखक: रवीना सिंह