Best dairy cow breed: साहिवाल नस्ल की गाय भारत की सबसे बेहतरीन और लोकप्रिय दूध देने वाली गायों में से एक मानी जाती है. यह गाय की नस्ल मुख्य रूप से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के साहिवाल क्षेत्र से संबंध रखती है, लेकिन भारत में भी इसकी काफी मांग है. अपनी उच्च दुग्ध उत्पादन क्षमता, गर्मी सहनशीलता और बेहतर स्वास्थ्य के कारण यह किसानों की पहली पसंद बनी हुई है.
आइए कृषि जागरण के इस आर्टिकल में साहिवाल गाय की पहचान, खासियत और कीमत जानें.
साहिवाल गाय की पहचान
साहिवाल गाय को अन्य नस्लों से अलग पहचानना आसान है. इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
- रंग: यह हल्के भूरे से लेकर गहरे लाल-भूरे रंग की होती है. कुछ गायों में शरीर पर सफेद धब्बे भी पाए जाते हैं.
- आकार और शरीर: इसका शरीर मजबूत, चौड़ा और लंबा होता है. इसका कद मध्यम होता है, लेकिन शरीर सुडौल और अच्छी मांसपेशियों वाला होता है.
- कान और आंखें: इसके कान लंबे और लटके हुए होते हैं, जबकि आंखें चमकदार और बड़ी होती हैं.
- कूबड़ और त्वचा: पीठ पर हल्का कूबड़ पाया जाता है और इसकी त्वचा ढीली व चिकनी होती है, जिससे यह गर्मी को सहन कर पाती है.
साहिवाल गाय की खासियत
- उत्तम दुग्ध उत्पादन: साहिवाल गाय औसतन 10-15 लीटर तक दूध प्रतिदिन देती है, जबकि कुछ उन्नत गायें 20 लीटर तक भी दूध दे सकती हैं.
- बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता: यह गाय कई प्रकार की सामान्य बीमारियों और संक्रमणों से बची रहती है.
- गर्मी सहनशीलता: यह अत्यधिक गर्मी वाले इलाकों में भी आसानी से जीवित रह सकती है, इसलिए इसे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और अफ्रीका जैसे गर्म देशों में पाला जाता है.
- खाद्य में कम खर्च: अन्य विदेशी नस्लों की तुलना में यह कम चारे में भी अच्छा उत्पादन देती है.
- प्रजनन क्षमता: साहिवाल गाय की प्रजनन दर बेहतर होती है और यह कई वर्षों तक दूध देती है.
साहिवाल गाय की कीमत
साहिवाल गाय की कीमत कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे उम्र, दूध देने की क्षमता, स्वास्थ्य और प्रजनन इतिहास. आमतौर पर इसकी कीमत 50,000 से लेकर 2,00,000 रुपए तक हो सकती है. उच्च गुणवत्ता वाली गायें, जो ज्यादा दूध देती हैं, उनकी कीमत और भी अधिक हो सकती है.
भारत में साहिवाल नस्ल की स्थिति
भारत में साहिवाल गाय को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ कार्य कर रही हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और विभिन्न राज्य सरकारें इस नस्ल के संवर्धन के लिए प्रयासरत हैं. साथ ही, डेयरी उद्योग में बढ़ती मांग के कारण किसान भी इस नस्ल को पालने की ओर आकर्षित हो रहे हैं.