राज्य सरकारों को टीम की तरह काम करवाना सबसे बड़ी चुनौती - विजय पॉल शर्मा

किसानों को खेती की जानकारी के साथ-साथ उसमें आने वाली लागत से लेकर लाभ तक की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि अगर किसानों के पास कृषि से संबंधित सारी जानकारियां होंगी तो वे इन सभी जानकारियों की मदद से अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में सक्षम होंगे। कृषि लागत और मूल्य आयोग, भारत सरकार द्वारा किसी भी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य कैसे निर्धारित किया जाता है इसकी जानकारी किसानों तक पहुँचाने के लिए कृषि जागरण टीम ने कृषि लागत और मूल्य आयोग के अध्यक्ष विजय पॉल शर्मा से बात की और न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की प्रक्रिया के बारे में जाना।

न्यूनतम समर्थन मूल्य कैसे निर्धारित किया जाता है?

सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित करने का मुख्य कारण किसानों के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना है ताकि उच्च निवेश एवं फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा सके। प्रत्येक वर्ष प्रमुख कृषि उत्पादों के लिए एमएसपी की घोषणा की जाती है जिन्हें कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करते समय सीएसीपी अन्य बातों के साथ-साथ कृषि उत्पादन, निविष्टि के मूल्यों में परिवर्तन, मांग एवं आपूर्ति, बाजार मूल्य प्रवृत्ति तथा जीवन लागत जैसे कारकों को ध्या्न में रखता है।

सरकार भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), भारतीय कपास निगम लिमिटेड (सीसीआई), भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारिता विपणन संघ लिमिटेड (नाफेड) जिसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित किए जाते हैं। जैसे विभिन्न सार्वजनिक एवं सहकारी एजेंसियों के माध्यम से मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के रूप में न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करते हैं। पीएसएस के अंतर्गत ना आने वाली फसलों के लिए सरकार आपस में सहमत मूल्य पर विशिष्ट यात्रा के लिए राज्यों से विशेष अनुरोध पर बाजार हस्तक्षेप की व्यवस्था करता है।

खेती में आने वाली लागत के आधार पर अभी तक जो मूल्य घोषित किया गया है, उससे किसानों को कम मुनाफा मिलता है। क्या किसान इस लाभ पर खेती कर पाएगा?

ये गलत धारणा है कि मुनाफा कम मिलता है। अमूमन देखने में आता है कि कृषि में कभी किसी फसल से ज्यादा लाभ मिलता है तो कभी कम लाभ मिलता है। पिछले कुछ वर्षों में फसलों की पैदावार ज्यादा नहीं बढ़ी है बल्कि खर्चे बढ़ते रहते हैं और उत्पादन की लागत प्रति क्विंटल बढ़ जाती है। हम इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं कि कैसे किसान को कम लागत में ज्यादा पैदावार मिल सके और पैदावार अच्छी होगी तो लाभ भी अधिक मिलेगा।

गन्ने की कीमतों का निर्धारण आपके द्वारा क्यों नहीं किया जाता है?

गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य निर्धारण भारत सरकार द्वारा ही किया जाता है। अगर राज्य सरकार चाहें तो न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर जाकर मूल्य तय कर सकती हैं। उसी तरह गन्ने का समर्थन मूल्य सीएसीपी ही तय करता है लेकिन कुछ राज्य सरकार हैं जो एफआरपी को आधार मानकर बोनस मूल्य किसानों को देती हैं। कुछ राज्य ऐसे भी हैं जो कुल लाभ का बंटवारा किसानों से करते हैं। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने ऐसा किया है। अगर वहां चीनी का भाव ज्यादा है तो किसानों को ज्यादा पैसा मिलेगा।

जिस हिसाब से खेती की लागत बढ़ रही है उस हिसाब से एमएसपी क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा है?

किसी भी फसल की उत्पादन लागत बहुत महत्वपूर्ण कारक होता है। जैसे-जैसे लागत बढ़ती है उसी प्रकार न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ता है। ये बहुत गलत धारणा है कि उत्पादन लागत बढ़ रही है लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं बढ़ रहा है। मेरे हिसाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाना किसी के लिए फायदेमंद नहीं होता बल्कि हमें ये देखना चाहिए कि किसान की जेब में कितना पैसा जाता है। सही मायनों में किसानों को सही मूल्य मिलना चाहिए।

जो मूल्य हम निर्धारित करते हैं क्या किसान उसे मंडी में सही भाव में बेच पाता है या नहीं?

कुछ राज्यों में गेहूँ और चावल में खरीद अच्छी है लेकिन कुछ राज्यों में स्थिति इसके उलट है। ऐसे में हमें यह देखना होता है कि वे राज्य कैसे आगे आएं जिनमें फसलों की खरीद में लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसके लिए हमें किसान की लागत कम करनी पड़ेगी और उत्पादन को बढ़ाना होगा। जैसा प्रधानमंत्री ने कहा है कि किसानों की आय दोगुनी होनी चाहिए, इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि हमने उत्पादन और लागत से हटकर बात की है। उनका कहना है कि आप मूल्य तो बढ़ा देते हैं लेकिन मूल्य के साथ-साथ उसकी लागत भी बढ़ती रहेगी तो उससे किसानों को ज्यादा फायदा नहीं होने वाला है। इसके लिए हम कुछ मुख्य क्षेत्रों पर कार्य कर रहे हैं। किसानों को नई तकनीकी से परिचित कराना और किसानों के लिए बनाए गए संस्थानों को प्रभावशाली बनाना जिससे किसान वहां जाकर नई सीख ले सकें। ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनके न होने से किसानों को फायदा नहीं होने वाला है।

सीएसीपी किसानों की मदद कैसे करता है?

सीएसीपी न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करता है। सरकार हमारी सिफारिश के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। बाकी जो खरीद की प्रणाली है वो अलग-अलग मंत्रालय के अंतर्गत आती है लेकिन ये किसी मंत्रालय से तब तक नहीं होने वाला है जब तक कि इसमें राज्य सरकार की हिस्सेदारी नहीं मिलती है। हम तो राज्य सरकार से यही निवेदन करते हैं कि आप खरीद में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें।

सीएसीपी कौन-कौन सी चुनौतियों का सामना कर रहा है?

हमारे द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना एक बात है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने यह है कि किस तरह से राज्य सरकारों को एक टीम की तरह काम करवाया जाए। हालांकि यह सीएसीपी का अधिकार नहीं है। हम सिर्फ यही चाहते हैं कि राज्य सरकारें खाद्यान्नों की खरीदारी और भंडारण में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। इससे  हमारी भंडारण क्षमता बढ़ेगी। उदाहरण के तौर पर यदि देखा जाए तो भारतीय खाद्य निगम यदि 25-30 मिलियन टन खाद्यान्नों की खरीद कर उनका निर्यात करता है तो यह कार्य थोड़ा मुश्किल होता है। वहीं अगर प्रत्येक राज्य 2-3 मिलियन टन खाद्यान्नों की खरीद कर उनका भंडारण करे तो खाद्यान्नों का भंडारण करना आसान होगा। इससे भंडारण क्षमता तो बढ़ेगी साथ ही लागत में भी कमी आएगी। यदि राज्य सरकारें एक साथ टीम की तरह कार्य करें तो भंडारण क्षमता सुदृढ़ होने के साथ लागत में कमी लाई जा सकती है।

डॉ. स्वामीनाथन के सूत्र से आप कहाँ तक सहमत हैं?

उनका विचार था कि किसानों को बाजार भाव के साथ-साथ एक अच्छी आय मिलनी चाहिए। मैं उनके विचारों से पूरी तरह से सहमत हूं। वहीं उन्होंने यह भी कहा था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को 50 प्रतिशत बढ़ा दिया जाए लेकिन मैं उनके इस विचार से सहमति नहीं रखता क्योंकि अगर हम न्यूनतम समर्थन मूल्य को 50 प्रतिशत बढ़ाते हैं तो लागत भी 15-20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में 50 प्रतिशत वृद्धि कर लागत को 15-20 प्रतिशत बढ़ाने पर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। मेरा मानना है कि सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य को कम करके समस्या का निदान नहीं मिलने वाला। लागत कम करने व पैदावार बढ़ाने के लिए भी कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। वहीं यह भी देखना होगा कि किसानों को नुकसान न हो। यदि किसानों को फायदा दिलवाना है तो हमें इन तीनों बिंदुओं पर गहन विचार कर कार्य करना होगा।

क्या आप कृषि विपणन प्रणाली से सहमत हैं?

सबसे पहले तो हमें ये देखना चाहिए कि हम कहां से चले और कहां तक पहुंचे हैं। इस सफर में हमने जो मुकाम हासिल किया है वही हमारी प्रगति दर्शाता है लेकिन मैं आज भी पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हूं। इस क्षेत्र में बहुत कार्य करना अभी बाकी है। हमारे सामने यहां सबसे बड़ी समस्या है कि उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाए। एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी (एपीएमसी) के तहत कार्यरत मंडियों में क्रेता और विक्रेता सीमित होते थे। यही सबसे बड़ी समस्या थी जिससे हमें आज भी दो-दो हाथ होना पड़ रहा है। हालांकि तकनीकी से जुड़ने के बाद से मंडियों का ई-बाजारीकरण होना एक अच्छी पहल है। इस पहल ही वजह से मंडियां सुचारू रूप से काम करने लगी हैं। कुछ राज्यों ने इसे अपना लिया है और आने वाले समय में ज्यादातर राज्य इसमें अपनी हिस्सेदारी देंगे।

किसानों के लिए कोई सन्देश?

मैं सभी किसानों से यही कहना चाहता हूं कि कृषि में आधुनिक तकनीकी के साथ काम करने की आवश्यकता है जिसे अपनाकर आप आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ सर्वांगीण विकास की ओर अग्रसर होंगे। क्षेत्रीय स्तर पर सरकार द्वारा अधिमान्यता प्राप्त कृषि संस्थान मौजूद हैं जहां जाकर किसान आसानी से किसी भी विषय पर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

प्रस्तुति: रूबी जैन, समीर तिवारी

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