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Updated on: 30 July, 2026 2:35 PM IST
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बसलीपुर गांव के प्रगतिशील किसान मनप्रीत सिंह

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के बसलीपुर गांव के प्रगतिशील किसान मनप्रीत सिंह आज उन किसानों में शामिल हैं, जिन्होंने आधुनिक खेती के साथ-साथ जैविक तकनीकों को अपनाकर अपनी खेती को नई दिशा दी है. कभी पूरी तरह रासायनिक खेती करने वाले मनप्रीत सिंह आज अपनी खेती में जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं. इसका सबसे बड़ा फायदा उन्हें यह मिला कि उनकी खेती की लागत लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो गई, मिट्टी की सेहत में सुधार आया और फसलों की पैदावार भी पहले की तुलना में काफी बढ़ गई.

मनप्रीत सिंह बताते हैं कि पहले वे खेती में पूरी तरह रासायनिक उर्वरकों और दवाइयों पर निर्भर थे. हर साल खेती की लागत बढ़ती जा रही थी और फसल को स्वस्थ रखने के लिए बार-बार रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल करना पड़ता था. लेकिन जब उन्होंने जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पादों का उपयोग शुरू किया, तब धीरे-धीरे उन्हें खेती में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगे. मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर हुई, पानी को रोकने की क्षमता बढ़ी और फसल पहले की तुलना में अधिक स्वस्थ रहने लगी. यही वजह है कि आज वे अन्य किसानों को भी जैविक उत्पादों को अपनाने की सलाह देते हैं. ऐसे में आइए उनकी सफलता की कहानी के बारे में विस्तार से जानते हैं-

पिता से मिली खेती की सीख

प्रगतिशील किसान मनप्रीत सिंह बताते हैं कि पहले वे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देते थे और खेती की पूरी जिम्मेदारी उनके पिता संभालते थे. वर्ष 2016-17 के बाद उन्होंने खुद खेती की कमान संभाली. शुरुआत में उन्होंने पारंपरिक तरीके से खेती की, लेकिन समय के साथ नई तकनीकों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाना शुरू किया.

आज उनके पास लगभग 30 एकड़ कृषि भूमि है. इस जमीन पर वे मुख्य रूप से गेहूं, धान, गन्ना और मटर की खेती करते हैं. रबी सीजन में गेहूं उनकी सबसे प्रमुख फसल होती है.

मिट्टी की तैयारी में अपनाई जैविक तकनीक

मनप्रीत सिंह का मानना है कि अच्छी फसल की शुरुआत स्वस्थ मिट्टी से होती है. यही कारण है कि वे खेत की तैयारी के समय ही मिट्टी को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान देते हैं.

वे बताते हैं कि खेत तैयार करते समय मिट्टी में जायडेक्स कंपनी की जायटॉनिक टेक्नोलॉजी आधारित जैविक उत्पाद 'जायटॉनिक-एम' को मिलाते हैं. इसके साथ ट्राइकोडर्मा का भी उपयोग करते हैं, जिससे मिट्टी में फंगस का खतरा कम हो जाता है और पौधों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है.

उनका कहना है कि यह उत्पाद पूरी तरह जैविक हैं और मिट्टी की प्राकृतिक शक्ति को बढ़ाने का काम करते हैं. इससे फसल की मजबूत नींव तैयार होती है.

रासायनिक और जैविक खेती का संतुलन

मनप्रीत सिंह पूरी तरह जैविक खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने रासायनिक और जैविक खेती के बीच संतुलन बनाया है. वर्तमान में उनकी खेती में लगभग 60 प्रतिशत रासायनिक और 40 प्रतिशत जैविक उत्पादों का उपयोग होता है.

उनका मानना है कि अचानक पूरी तरह जैविक खेती अपनाने के बजाय धीरे-धीरे जैविक उत्पादों का अनुपात बढ़ाना अधिक व्यावहारिक और लाभदायक तरीका है. इससे किसानों को जोखिम भी कम रहता है और बेहतर परिणाम भी मिलते हैं.

जायटॉनिक-एम देने के बाद खत्म हुई बड़ी समस्या

मनप्रीत सिंह बताते हैं कि पहले उनके क्षेत्र में गेहूं की फसल में एक बड़ी समस्या आती थी. पहला पानी लगाने के बाद फसल पीली पड़ जाती थी. इस समस्या को दूर करने के लिए उन्हें बार-बार एनपीके, टॉनिक और अन्य रासायनिक स्प्रे करने पड़ते थे. इससे खेती की लागत लगातार बढ़ती जाती थी.

लेकिन जब उन्होंने जायटॉनिक-एम का उपयोग शुरू किया तो यह समस्या काफी हद तक समाप्त हो गई. अब पहला पानी देने के बाद भी गेहूं की फसल पहले की तरह पीली नहीं पड़ती. पौधे लगातार बढ़ते रहते हैं और उन्हें अतिरिक्त रासायनिक स्प्रे की जरूरत भी काफी कम पड़ती है.

उनके अनुसार इसका मुख्य कारण यह है कि जैविक उत्पादों के उपयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ गई है. अब मिट्टी लंबे समय तक नमी बनाए रखती है, जिससे पौधों को पर्याप्त पोषण मिलता रहता है.

लागत में आई 50 प्रतिशत तक की कमी

खेती में सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती लागत होती है. मनप्रीत सिंह बताते हैं कि पहले उन्हें रासायनिक खाद, दवाइयों और स्प्रे पर काफी अधिक खर्च करना पड़ता था. लेकिन जब से उन्होंने जैविक उत्पादों को अपनी खेती का हिस्सा बनाया है, तब से उनकी लागत में उल्लेखनीय कमी आई है.

उनका कहना है कि आज प्रति एकड़ खेती की लागत लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो गई है. पहले जहां अतिरिक्त स्प्रे और रासायनिक पोषक तत्वों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता था, वहीं अब उनकी आवश्यकता काफी कम हो गई है.

कम लागत के साथ बेहतर उत्पादन मिलने से खेती पहले की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक बन गई है.

पैदावार में भी हुआ शानदार इजाफा

लागत कम होने के साथ-साथ उत्पादन में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है.

मनप्रीत सिंह बताते हैं कि पहले जब वे केवल रासायनिक खेती करते थे, तब गेहूं की पैदावार अधिकतम 18 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ तक ही पहुंचती थी. उनके अनुसार यदि कोई किसान 20 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन ले लेता था तो उसे बहुत अच्छी पैदावार माना जाता था.

लेकिन पिछले दो वर्षों से स्थिति पूरी तरह बदल गई है.

वे बताते हैं कि पिछले वर्ष उन्होंने पंजाब की 827 किस्म के गेहूं से लगभग 27 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन प्राप्त किया. यह उनके लिए बड़ी उपलब्धि रही. इस बार भी उन्हें उम्मीद है कि यदि मौसम ने साथ दिया तो प्रति एकड़ 25 क्विंटल से अधिक उत्पादन आसानी से मिलेगा.

उनका मानना है कि मिट्टी की बेहतर सेहत और संतुलित पोषण के कारण ही उत्पादन में यह बढ़ोतरी संभव हुई है.

मिट्टी की सेहत में आया बड़ा सुधार

मनप्रीत सिंह कहते हैं कि खेती में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी सुरक्षित रखना जरूरी है.

वे बताते हैं कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी धीरे-धीरे सख्त होती जाती है. ऐसी मिट्टी में पानी देने के बाद और अधिक कठोरता आ जाती है. इससे पौधों की जड़ों का विकास प्रभावित होता है और टिलरिंग भी कम होती है.

लेकिन जैविक उत्पादों के उपयोग के बाद उन्होंने मिट्टी में बड़ा बदलाव महसूस किया. अब मिट्टी पहले की तुलना में अधिक भुरभुरी हो गई है. मिट्टी में हवा और पानी का आवागमन बेहतर होता है, जिससे पौधों की जड़ें अच्छी तरह विकसित होती हैं.

वे बताते हैं कि गेहूं में टिलरिंग भी पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है, जिसका सीधा असर उत्पादन पर दिखाई देता है.

दूसरे किसानों के लिए संदेश

मनप्रीत सिंह का मानना है कि आने वाले समय में खेती को टिकाऊ बनाने के लिए किसानों को धीरे-धीरे जैविक उत्पादों की ओर बढ़ना होगा.

वे कहते हैं कि रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी को कमजोर बना रहा है. यदि किसान समय रहते मिट्टी की सेहत पर ध्यान नहीं देंगे तो भविष्य में उत्पादन प्रभावित हो सकता है.

वे सभी किसानों को सलाह देते हैं कि वे जैविक उत्पादों को अपनी खेती का हिस्सा बनाएं. इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरेगी, पानी को रोकने की क्षमता बढ़ेगी, पौधों का विकास बेहतर होगा और खेती की लागत भी कम होगी.

खेती में संतुलन ही सफलता की कुंजी

मनप्रीत सिंह की सफलता यह बताती है कि आधुनिक खेती का मतलब केवल अधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं है. यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से रासायनिक और जैविक उत्पादों के बीच संतुलन बनाकर खेती करें तो कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

आज मनप्रीत सिंह न केवल बेहतर पैदावार हासिल कर रहे हैं, बल्कि अपनी मिट्टी को भी भविष्य के लिए सुरक्षित बना रहे हैं.

English Summary: success story Manpreet Singh reduced farming cost by 50 percent with Zydex organic products
Published on: 30 July 2026, 02:43 PM IST

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